केंद्र सरकार की राज्यों को दो टूक- धान और गेहूं पर बोनस बंद करें, दालों और तिलहन पर दें जोर

केंद्र सरकार की राज्यों को दो टूक- धान और गेहूं पर बोनस बंद करें, दालों और तिलहन पर दें जोर

केंद्र सरकार ने केरल सहित सभी राज्यों को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे धान और गेहूं पर एमएसपी के ऊपर अतिरिक्त बोनस देना बंद करें. अतिरिक्त बोनस पर केंद्र की आपत्ति और आर्थिक बोझ को आधार बनाते हुए केंद्र ने राज्यों से इस नीति की तुरंत समीक्षा करने को कहा है, क्योंकि इससे न केवल सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता है, बल्कि बाजार में फसलों की कीमतों का संतुलन भी बिगड़ता है.

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केंद्र सरकार की राज्यों को दो टूक- धान और गेहूं पर  बोनस बंद करें, दालों और तिलहन पर दें जोरधान-गेहूं के बोनस पर केंद्र का अलग रुख (सांकेतिक तस्‍वीर)

भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने हाल ही में केरल को पत्र लिखकर धान पर दिए जाने वाले अतिरिक्त बोनस को बंद करने का आग्रह किया है. व्यय विभाग के सचिव वी. वुलनाम द्वारा लिखे गए इस पत्र में स्पष्ट किया गया है कि केंद्र सरकार हर साल किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने और उन्हें संकट से बचाने के लिए 'न्यूनतम समर्थन मूल्य'  एमएसपी  की घोषणा करती है. हालांकि, कुछ राज्य सरकारें इस एमएसपी के ऊपर अपनी ओर से अलग से बोनस देती हैं.

केंद्र का मानना है कि इस अतिरिक्त बोनस की वजह से किसान केवल गेहूं और धान उगाने की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे सरकारी गोदामों में इनका स्टॉक जरूरत से कहीं ज्यादा हो गया है. यह बढ़ा हुआ स्टॉक न केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस और बफर स्टॉक की जरूरतों से अधिक है, बल्कि इसे संभालने और रखरखाव में सरकारी खजाने पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ रहा है.​

धान-गेहूं पर बोनस बंद करें राज्य

​पत्र में खेती के पारंपरिक तरीकों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान पर भी गहरी चिंता जताई गई है. पत्र में कहा गया है कि धान और गेहूं ऐसी फसलें हैं, जिन्हें उगाने में बहुत अधिक पानी, उर्वरक और मेहनत लगती है. इन फसलों की अंधाधुंध खेती के कारण देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है, जिससे भविष्य में पानी का संकट पैदा हो सकता है.

इसके अलावा, मिट्टी की उर्वरता कम होना, जैव विविधता का नुकसान और फसल कटाई के बाद पराली जलानेकी समस्या ने पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. केंद्र सरकार का तर्क है कि यदि राज्य सरकारें बोनस देना बंद नहीं करती हैं तो किसान इन्हीं फसलों पर टिके रहेंगे, जिससे जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव और बढ़ते जाएंगे.

दालों-तिलहन पर फोकस बढ़ाए सरकारें

इस नीतिगत बदलाव का मुख्य उद्देश्य किसानों को फसल विविधीकरण  के लिए प्रोत्साहित करना है. वर्तमान में भारत को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में दालों  और तिलहनका आयात करना पड़ता है, जिससे देश का पैसा बाहर जाता है. केंद्र सरकार चाहती है कि राज्य सरकारें अपना ध्यान धान और गेहूं से हटाकर दालों, तिलहन और मोटे अनाजों को बढ़ावा देने पर केंद्रित करें.

पत्र में जोर दिया गया है कि यह कदम न केवल देश को खाद्य तेलों और दालों के मामले में 'आत्मनिर्भर' बनाएगा, बल्कि पोषण सुरक्षा  की नजरिये से भी अहम  होगा. मोटे अनाज और दालें स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं और इन्हें उगाने में कम पानी की आवश्यकता होती है, जो टिकाऊ कृषि के लिए बेहद जरूरी है.

बोनस नीति की करे समीक्षा राज्य सरकार

अंत में, केंद्र ने केरल सरकार और अन्य राज्यों से अनुरोध किया है कि वे अपनी वर्तमान बोनस नीति की समीक्षा करें. सुझाव दिया गया है कि जो पैसा अभी धान और गेहूं के बोनस पर खर्च किया जा रहा है, उसे उन फसलों के प्रोत्साहन में लगाया जाए जो राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुकूल हैं.

इससे न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी, बल्कि किसानों की आय में भी स्थिरता आएगी क्योंकि वे बाजार की मांग के अनुसार विविधता वाली फसलें उगाएंगे. यह कदम देश के कृषि ढांचे को आधुनिक और लचीला बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. सरकार का लक्ष्य एक ऐसी कृषि प्रणाली विकसित करना है जो न केवल किसानों के लिए मुनाफे वाली हो, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को भी सुरक्षित रख सके.

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