नई संसद के लिए नागपुर से आई सागौन की लकड़ी.भारत की नई संसद के लिए सागौन की लकड़ी महाराष्ट्र के नागपुर से मंगाई गई है. इसे टीक वुड भी कहते हैं. इसके साथ ही संसद भवन के निर्माण में महाराष्ट्र की भागीदारी भी हो गई है. दूसरी ओर त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से बांस की लकड़ी की फ्लोरिंग मंगवाई गई है. ये दोनों अपने आप में खास हैं. दुनिया भर में मशहूर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के कालीन को भी संसद भवन में जगह मिली है. बहरहाल, हम बात करते हैं संसद भवन के लिए महाराष्ट्र से आई सागौन की लकड़ी की, जो अपनी विशेषता की वजह से महंगी बिकती है.
बताया गया है कि वर्तमान में बाजार में सागौन की लकड़ी का दाम 60 हजार रुपए प्रति घनमीटर तक है..बाजार में इसकी मांग को देखते हुए इसके दाम भी अच्छे मिलते हैं. इसकी मांग इसकी टिकाऊ गुणवत्ता की वजह से है और इसीलिए नई संसद में इसे जगह दी गई है. पर्यावरणविद एन. शिवकुमार ने 'किसान तक' को इसकी खासियत बताई.
शिवकुमार ने कहा कि नागपुर का जंगल काफी पुराना है, इसलिए यहां की सागौन की लकड़ी भी खास होगी. इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है इसलिए उसमें दीमक नहीं लगता. इसे तैयार होने में कम से कम 20 साल लग जाता है. इसलिए यह मूल्यवान लकड़ी है. इसकी मजबूती की वजह से ज्यादातर लोग इसका फर्नीचर पसंद करते हैं. इसकी खेती करने वाले किसानों को रिस्क कम और मुनाफा अच्छा होता है.
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नई संसद के लिए अगरतला का बांस यूं ही नहीं मंगाया गया है. इसकी मजबूती भी मशहूर है. बताया जाता है कि दक्षिणी त्रिपुरा में बांस की कुछ ऐसी किस्में होती हैं जिसकी लकड़ी बहुत मजबूत यानी टिकाऊ होती है. लंबे समय तक बारिश और विपरीत मौसम की मार के बावजूद भी इसकी लकड़ी खराब नहीं होती. ऐसी ही बांस की एक किस्म का इस्तेमाल नई संसद में फर्श बनाने के लिए किया गया है.
सरकार नेशनल बैंबू मिशन के तहत बांस का फर्नीचर बनाने के लिए पहले से ही लोगों को प्रोत्साहित कर रही है. बांस के उत्पादन में पूर्वोत्तर काफी आगे है. भारत मे बांस की 136 किस्में हैं. अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग बांस की किस्में मौजूद हैं, लेकिन दस किस्मों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है.
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