El Nino Impact: कम बारिश से बढ़ा संकट, देश के 166 बड़े बांधों में घटा पानी, जानिए कैसे बिगड़े हालात

El Nino Impact: कम बारिश से बढ़ा संकट, देश के 166 बड़े बांधों में घटा पानी, जानिए कैसे बिगड़े हालात

कमजोर मॉनसून और जून में सामान्य से करीब एक-तिहाई कम बारिश के कारण देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण घट गया है. 25 जून तक इनमें कुल क्षमता का केवल 26.4% पानी बचा था. 14 राज्यों में जलस्तर 10 वर्षीय औसत से नीचे है और देश का करीब 37% हिस्सा किसी न किसी स्तर के सूखे की चपेट में है.

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कम बारिश से बढ़ा संकट, देश के 166 बड़े बांधों में घटा पानी, जानिए कैसे बिगड़े हालातमॉनसून और जलसंकट

देश में इस साल कमजोर मॉनसून की शुरुआत ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है. जून महीने में सामान्य से करीब एक-तिहाई कम बारिश होने के कारण देश के कई बड़े जलाशयों का जलस्तर तेजी से घटा है. 14 राज्यों में जलाशय सामान्य स्थित‍ि से ज्‍यादा खाली हैं और 37% इलाका सूखे की चपेट में है. सबसे ज्‍यादा असर पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में दिखाई दे रहा है. एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि भारत की चुनौती केवल इस साल की कम बारिश नहीं है, बल्कि जल संसाधनों के कमजोर प्रबंधन और लंबे समय से चली आ रही नीतिगत समस्याएं भी जल संकट को लगातार गहरा रही हैं. 

166 बड़े जलाशयों में क्षमता का सिर्फ 26.4% पानी

केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी), जो हर सप्ताह देश के 166 प्रमुख जलाशयों की निगरानी करता है, के अनुसार 25 जून तक इन जलाशयों में उनकी कुल जीवित जल भंडारण क्षमता का केवल 26.4 प्रतिशत पानी मौजूद था. यह स्तर जून के अंतिम हफ्ते के 10 वर्षीय औसत के आसपास है, लेकिन पिछले वर्ष इसी समय की तुलना में करीब 10 प्रतिशत अंक कम है. इसका मतलब है कि इस बार देश ने मॉनसून सीजन की शुरुआत पिछले साल की तुलना में काफी कम जल भंडारण के साथ की है.

मुंबई और पुणे में पहले से दिखने लगा असर

कम जल भंडारण का असर बड़े शहरों तक पहुंच चुका है. मुंबई में गर्मियों के दौरान कम दबाव से पानी की आपूर्ति अब नियमित व्यवस्था बन चुकी है. वहीं, पुणे में बांधों का जलस्तर कम होने के कारण एक दिन छोड़कर पानी की सप्लाई की जा रही है. यह संकेत है कि अगर आने वाले महीनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो कई अन्य शहरों पर भी इसका असर पड़ सकता है.

राज्यों की स्थिति ज्यादा चिंता की वजह

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल राष्ट्रीय औसत देखकर स्थिति का सही आकलन नहीं किया जा सकता. जून के अंत तक जलाशयों का स्तर सामान्य के आसपास रहना कैलेंडर के हिसाब से अपेक्षित माना जाता है. असली चिंता यह है कि अलग-अलग राज्यों में जलाशयों का जलस्तर उनके अपने 10 वर्षीय औसत से कितना नीचे पहुंच गया है. जिन 24 राज्यों में ये 166 प्रमुख जलाशय स्थित हैं, उनमें से 14 राज्यों में जल भंडारण अपने सामान्य स्तर से कम दर्ज किया गया है.

पश्चिम बंगाल, मिजोरम और कर्नाटक सबसे ज्यादा प्रभावित

सीडब्ल्यूसी के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में जलाशयों का जल भंडारण सामान्य से 60 प्रतिशत कम रहा. मिजोरम में यह कमी 54 प्रतिशत दर्ज की गई. कर्नाटक में जलाशयों का स्तर सामान्य से 40 प्रतिशत नीचे पहुंच गया. जल संकट का सबसे बड़ा असर पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में दिखाई दे रहा है, जबकि उत्तर और पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में जलाशयों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है.

जून में सामान्य से करीब एक-तिहाई कम हुई बारिश

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के ग्रिड आधारित आंकड़ों के अनुसार, जून महीने में देशभर में 1971-2020 के औसत की तुलना में लगभग एक-तिहाई कम वर्षा दर्ज की गई. सबसे अधिक वर्षा की कमी मध्य भारत, पूर्वी भारत और प्रायद्वीपीय भारत में रही. यही वे क्षेत्र हैं जहां जलाशयों में भी सबसे अधिक कमी देखने को मिल रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश की कमी और जलाशयों के घटते स्तर का नक्शा लगभग एक जैसा है, क्योंकि दोनों के पीछे एक ही मौसम प्रणाली जिम्मेदार है.

अल नीनो ने कमजोर किया मॉनसून

रिपोर्ट के अनुसार, इस बार प्रशांत महासागर का तापमान तेजी से बढ़ा है. एनओएए ओआईएसएसटी के आंकड़ों के अनुसार, 29 जून तक नीनो 3.4 समुद्री सतह तापमान विचलन लगभग +1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि साल की शुरुआत में यह शून्य से नीचे था.

वैज्ञानिकों के अनुसार, +2 डिग्री सेल्सियस से ऊपर की स्थिति मजबूत या सुपर अल नीनो के करीब मानी जाती है. अल नीनो वाले वर्षों में भारत का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून अक्सर कमजोर पड़ता है और इस वर्ष जून की कम बारिश भी उसी पैटर्न के अनुरूप मानी जा रही है. इसका असर यह हुआ कि मॉनसून सीजन के शुरुआती चरण में ही जलाशयों में अपेक्षित मात्रा में पानी जमा नहीं हो सका.

भारत पहले से ही जल तनाव वाले देशों में शामिल

सरकारी अनुमानों के अनुसार, दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, लेकिन देश के पास विश्व के कुल मीठे पानी का केवल करीब 4 प्रतिशत हिस्सा है. वर्ष 2011 से ही भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,700 घन मीटर से नीचे बनी हुई है. फाल्केनमार्क इंडेक्स के अनुसार, यह सीमा किसी देश को जल तनावग्रस्त श्रेणी में रखने का मानक मानी जाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका अर्थ यह है कि भारत में जल संकट केवल सूखे की वजह से नहीं बल्कि संरचनात्मक स्तर पर भी मौजूद है.

देश का 37 प्रतिशत हिस्सा सूखे की चपेट में

कम बारिश का असर अब सूखे के रूप में भी साफ दिखाई देने लगा है. इंडिया ड्रॉट मॉनिटर के संयुक्त सूखा सूचकांक, जिसमें वर्षा, सतही बहाव और मिट्टी की नमी को शामिल किया जाता है, के अनुसार 24 जून तक देश का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी स्तर के सूखे की चपेट में था. सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर भारत रहे. हालात को देखते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने 12 सबसे अधिक प्रभावित राज्यों और 326 जिलों के लिए आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की है.

क्या अच्छी बारिश से खत्म हो जाएगी समस्या

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जुलाई और अगस्त में सामान्य या अच्छी बारिश होती है तो इस वर्ष जलाशयों का जलस्तर सुधर सकता है. हालांकि, इससे केवल इस वर्ष की स्थिति में सुधार होगा. रिपोर्ट के अनुसार, भारत की वास्तविक समस्या केवल एक कमजोर मॉनसून नहीं, बल्कि जल संसाधनों का उपयोग और प्रबंधन भी है.

नीतिगत फैसले भी बढ़ा रहे हैं जल संकट

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के कई शुष्क इलाकों में अधिक पानी वाली फसलों की खेती की जाती है. लिफ्ट सिंचाई को सब्सिडी वाली बिजली से बढ़ावा मिलता है. पानी की मांग को नियंत्रित करने के लिए मूल्य निर्धारण का सीमित उपयोग किया जाता है. जहां जल पुनर्चक्रण संभव है वहां भी उसे अनिवार्य नहीं बनाया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, ये सभी नीतिगत फैसले मिलकर सीमित जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पैदा करते हैं और हर कुछ वर्षों में जल संकट को गंभीर रूप दे देते हैं.

'डे जीरो' जैसी स्थिति का खतरा

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर जल प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ तो कई शहर 'डे जीरो' जैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं. इसका मतलब है कि जलाशय पूरी तरह खाली हो जाएं, पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति रोकनी पड़े और लोगों को वितरण केंद्रों से पानी लेना पड़े. वर्ष 2018 में दक्षिण अफ्रीका का केप टाउन ऐसे संकट के बेहद करीब पहुंच गया था. 

वहीं, वर्ष 2019 में चेन्नई को भी गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा था, जबकि वहां वर्षा जल संचयन के कानूनी प्रावधान पहले से लागू थे. रिपोर्ट के अनुसार 'डे जीरो' अचानक आने वाली घटना नहीं होती, बल्कि अनियोजित शहरीकरण, भूजल के अत्यधिक दोहन और कमजोर जल प्रबंधन का परिणाम होती है.

पानी की मात्रा ही नहीं, गुणवत्ता भी चुनौती

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का जल संकट केवल पानी की उपलब्धता का नहीं बल्कि उपयोग योग्य और सुरक्षित पानी का भी है. इंदौर और अहमदाबाद जैसे देश के सबसे स्वच्छ शहरों में हाल में सामने आए जल प्रदूषण के मामलों को गंभीर चेतावनी माना गया है. 

इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित अपने लेख में शहरी नियोजन विशेषज्ञ रवि भूषण और पूर्वा बरुआ ने कहा है कि शहरों में साफ-सफाई के दिखाई देने वाले पहलुओं पर तो ध्यान दिया जाता है, लेकिन जल निकासी और पेयजल व्यवस्था जैसे अदृश्य बुनियादी ढांचे की अनदेखी की जाती है.

'वाटर बैंकरप्सी' की चेतावनी

जल विशेषज्ञ कावेह मदानी ने इस स्थिति को "वाटर बैंकरप्सी" यानी जल दिवालियापन की संज्ञा दी है. उनका कहना है कि जब किसी क्षेत्र में प्राकृतिक स्रोत जितना पानी दोबारा उपलब्ध करा सकते हैं, उससे अधिक पानी लगातार निकाला और उपयोग किया जाता है, तो नदियां, झीलें और अन्य जल स्रोत धीरे-धीरे अपनी पुनर्भरण क्षमता खो देते हैं.

'एवरग्रीन रिवोल्यूशन' से मिल सकता है समाधान

रिपोर्ट में जल संकट से निपटने के कई उपाय भी सुझाए गए हैं. इसमें कहा गया है कि अर्थव्यवस्था को कम पानी खपत वाले क्षेत्रों की ओर अधिक विविध बनाना होगा ताकि सूखे के समय जोखिम कम हो. कृषि क्षेत्र में कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन द्वारा प्रस्तावित "एवरग्रीन रिवोल्यूशन" की अवधारणा अपनाने पर जोर दिया गया है. इसका उद्देश्य प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने के बजाय प्रति बूंद पानी से अधिक उत्पादन हासिल करना है. इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ पानी और अन्य संसाधनों की बचत भी की जा सकती है.

AI डेटा सेंटर भी बढ़ा सकते हैं दबाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या भविष्य में पानी और ऊर्जा की मांग बढ़ा सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे प्रोजेक्ट पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और सार्वजनिक लागत-लाभ विश्लेषण के बिना विकसित किए जाते हैं तो जल संसाधनों को लेकर लोगों की चिंताएं और बढ़ सकती हैं.

जल संकट नीति का भी सवाल

रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि इस वर्ष का मॉनसून यह तय करेगा कि मौजूदा सीजन कैसा रहेगा, लेकिन जलाशयों का घटता स्तर, कम बारिश और बढ़ता सूखा यह संकेत दे रहे हैं कि भारत हर वर्ष अपनी जल उपलब्धता की सीमा के बेहद करीब पहुंच रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती का समाधान केवल अच्छी बारिश से नहीं होगा. बेहतर जल प्रबंधन, टिकाऊ कृषि, प्रभावी नीतिगत सुधार और संसाधनों के संतुलित उपयोग से ही देश लंबे समय तक जल संकट से राहत पा सकता है. (दीपू राय की रिपोर्ट)

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