
लोहट और रैयाम चीनी मिलें बंद पड़ी हैंबिहार में मधुबनी जिले की लोहट चीनी मिल पिछले करीब 30 सालों से बंद पड़ी है, जिससे यहां के कामगार जहां रोजी रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं. वहीं मिल बंद होने के चलते इस इलाके में गन्ना की मांग बिल्कुल खत्म हो चुकी है. ऐसे में किसान मजबूरन गन्ना की खेती बंद कर चुके हैं.
इससे किसानों की हालत भी दयनीय हो चुकी है. इतना ही नहीं, मिल बंद होने के बाद यहां काम करने वाले मजदूरों और कामगारों को उनका बकाया वेतन और पेंशन का भुगतान अभी तक नहीं हुआ है. इसके लिए सैकड़ों लोग करीब 3 दशक से दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं.
इस इलाके के बुजुर्ग समाजसेवी और कभी लोहट चीनी मिल मजदूर यूनियन के अध्यक्ष रह चुके प्रफुल्ल चंद्र झा का कहना है कि आजादी से पहले ही साल 1913 में दरभंगा महाराज ने लोहट चीनी मिल की स्थापना करवाई थी. ये मिल मिथिलांचल खासकर मधुबनी जिले के लिए वरदान साबित हुई.
लोहट चीनी मिल के चलते गन्ना की काफी डिमांड थी. लिहाजा आसपास के किसान बड़े पैमाने पर गन्ना उपजा कर मिल में बेचते थे. किसानों को नकद आमदनी होती थी. गांवों में खुशहाली थी, लेकिन मिल बंद होने के बाद किसानों को गन्ना का सही दाम मिलना बंद हो गया. मजबूरन किसानों को गन्ना जैसी नकदी फसल की खेती बंद करनी पड़ी. किसान पाई-पाई को मोहताज रहने लगे.
आज हालत ये है कि बच्चों की पढ़ाई लिखाई और शादी ब्याह के लिए किसानों को जमीन बेचनी पड़ती है. वहीं यहां के नौजवान भी अब रोजगार की तलाश में पलायन को मजबूर हैं. खास बात ये है कि इस इलाके में हर चुनाव के दौरान लोहट चीनी मिल को फिर से शुरू करवाने का आश्वासन मिलता है. लेकिन चुनाव खत्म होते ही यहां के जनप्रतिनिधि इस मुद्दे से मुंह फेर लेते हैं.

प्रफुल्ल चंद्र झा का कहना है कि 3 दशक पहले तक लोहट चीनी मिल परिसर में हर ओर रौनक छाई रहती थी, लेकिन मिल बंद होने के बाद खंडहर में तब्दील हो चुकी मिल की बिल्डिंग और मशीनों को भी धीरे-धीरे औने-पौने दाम में बेच दिया गया. मिल जब चालू हालत में थी, उस वक्त यहां प्रतिदिन एक हजार क्विंटल चीनी का उत्पादन होता था. वहीं एक हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ था. तीन शिफ्ट में काम होता था, लेकिन मिल परिसर में अब वीरानी पसरी है.
इसी तरह, मधुबनी जिले से सटे रैयाम में स्थित चीनी मिल भी करीब 3 दशक से बंद पड़ी है. करीब 70 एकड़ में फैला रैयाम चीनी मिल का परिसर खंडहर में तब्दील हो चुका है. बताया जाता है कि साल 1914 में शुरू हुई रैयाम चीनी मिल में करीब 8 सौ कामगारों को प्रत्यक्ष रूप से रोजी रोजगार मिला हुआ था, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से हजारों किसान परिवारों के साथ ही स्थानीय दुकानदारों को भी अच्छी आमदनी होती थी.
रैयाम चीनी मिल में काम करने वाले बुजुर्ग जीवन मिश्र का कहना है कि रैयाम मिल में बनी चीनी कभी देशभर में सबसे अच्छी क्वालिटी की मानी जाती थी. लेकिन साल 1995 से ये चीनी मिल बंद पड़ी है. इस दौरान कई सरकारें आई और गईं, लेकिन सालों तक लोगों की जिंदगी में मिठास घोलने का काम करने वाली रैयाम चीनी मिल फिर से चालू नहीं हो सकी.
मिल का पूरा परिसर खंडहर बन चुका है. हवा में गन्ने के रस की खूशबू की जगह अब जंगल-झाड़ और कचरे के सड़ांध की महक है. मिल परिसर में बना स्टाफ क्वार्टर और ऑफिस की बिल्डिंगें अब खंडहर बन चुकी हैं.
बिहार सरकार ने एक बार फिर से चीनी मिलों को चालू करवाने का भरोसा दिया है. अब देखना है कि लोहटवासियों और रैयामवासियों की उम्मीदें कब तक पूरी होती हैं. बहरहाल, यहां के लोगों को अभी भी इंतजार है उस सुबह का जब उनकी नींद लोहट चीनी मिल से निकलने वाली सायरन की तेज आवाज से टूटे और यहां की फिजां में गन्ने के रस की खूशबू इस कदर फैले कि सालों से खोई खुशियां फिर से लौट आएं.(अमित रंजन का इनपुट)
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