बिहार में किसानों को नहीं मिल रहा मक्के का सही रेटबिहार के कोसी क्षेत्र में मक्के की खेती बड़े पैमाने पर होती है. यहां मक्के की उपज राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है. शानदार उपज को देखते हुए मक्के को यहां पीला सोना कहा जाता है. यहां का मक्का कई राज्यों के अलावा विदेशों में नेपाल, बांग्लादेश और भूटान तक जाता है. इसके बावजूद किसानों को मक्के का एमएसपी (MSP) नहीं मिलता. वजह है मक्का आधारित किसी उद्योग का नहीं होना. किसान बताते हैं कि बिहार के उद्योग विभाग का टालू रवैया अब भारी पड़ रहा है. खरीफ हो या रबी, दोनों सीजन में मक्के की खेती गेहूं और धान से अधिक लाभ देती है, इसके बावजूद एमएसपी नहीं मिलने से किसान मक्के की खेती से भाग रहे हैं.
कोसी का इलाका, खासकर खगड़िया, सुपौल, मधेपुरा मक्के की खेती का हब बनता जा रहा है. इन क्षेत्रों में मक्का उगाने वाले किसानों की संख्या बहुत अधिक है. लेकिन सरकार की निष्क्रियता के चलते किसान लगातार निराश हो रहे हैं. अब तक जितनी भी सरकारें बनीं, इस इलाके में एक भी मक्का आधारित उद्योग नहीं लगा पाईं. उद्योग नहीं लगने से किसानों को मक्के का समर्थन मूल्य नहीं मिल पा रहा है. किसान की खेती लगातार घाटे में जा रही है. किसान बताते हैं कि सरकार अगर कोई मक्का उद्योग या कोई प्रोसेसिंग यूनिट लगा दे तो उनकी कमाई बढ़ जाएगी. पलायन रुकेगा और रोजगार की संभावनाएं बढ़ जाएंगी.
कोसी में मक्का आधारित किसी उद्योग के नहीं होने से यहां के बिचौलियों और व्यापारियों को फायदा हो रहा है जबकि किसान घाटे में जा रहे हैं. यहां के लोकल व्यापारी सस्ते में मक्का खरीद कर दूसरे राज्यों के व्यापारियों के महंगे रेट पर बेच देते हैं. वहां से कोसी का मक्का नेपाल, भूटान और बांग्लादेश तक जाता है. लेकिन यहां के किसानों की हालत में कोई तब्दीली नहीं है.
मधेपुरा के किसान शंभू भाई कहते हैं, हमारे यहां कोई मंडी नहीं है और व्यापारी ही उपज खरीदते हैं. सरकारी खरीद का कोई सिस्टम नहीं है. पिछले साल शुरू में कुछ अच्छा रेट मिला, मगर अभी मक्के का भाव 1600-1700 रुपये क्विंटल से अधिक नहीं है. चार एकड़ में मक्के की खेती करने वाले शंभू भाई कहते हैं कि मक्के में 30,000 रुपये प्रति एकड़ का खर्च है, लेकिन कमाई 50,000 रुपये भी नहीं होती. इसमें ढुलाई से लेकर लेबर का खर्च भी शामिल है. इस तरह मक्के की खेती में अब कुछ नहीं बचा है.
उन्होंने कहा कि कोसी में कोई उद्योग नहीं है, इसलिए उनकी तरह सैकड़ों किसान मक्के की खेती में पिछड़ रहे हैं. हालत ये है कि किसान को देखने वाला कोई नहीं है. यहां के किसानों ने मक्का आधारित फैक्ट्री खोलने के लिए दो साल पहले धरना-प्रदर्शन भी किया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.
कुछ ऐसी ही राय मक्का के बड़े किसान उमाशंकर भी रखते हैं. उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के पिछले टर्म में तत्कालीन कृषि मंत्री विजय कुमार चौधरी के साथ मुजफ्फरपुर में किसानों की एक बड़ी बैठक हुई. उद्योग को लेकर चर्चा भी हुई, लेकिन अभी तक उसका कोई रिजल्ट नहीं मिला. उमाशंकर ने मांग उठाते हुए कहा कि सरकार को हर ब्लॉक में कोल्ड चेन बनानी चाहिए ताकि किसान बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न को सुरक्षित रख सकें. इससे किसानों को विपरीत समय में अपनी उपज को औने-पौने दाम में नहीं बेचना पड़ेगा.
उमाशंकर ने कहा, कहीं-कहीं कोल्ड चेन है तो वहां छोटे किसानों की उपज नहीं रखी जाती. वहां बड़े व्यापारियों का स्टॉक रखा जाता है क्योंकि छोटा किसान 20 क्विंटल माल ले जाएगा तो कोल्ड स्टोरेज की क्या कमाई होगी. किसानों को कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं मिल पाती और व्यापारी वहां भी मौका बना लेते हैं.
डुमरिया के किसान रमन सिंह ने कहा कि अभी मक्के का 1800 से 2400 रुपये रेट मिल रहा है, लेकिन नई फसल कटने के बाद भाव 1500-1600 रुपये पर आ जाएगा. भाव में गिरावट इसलिए है क्योंकि मक्के की मांग में बड़ी गिरावट है. रमन सिंह ने कहा कि सरकार की निष्क्रियता के चलते अभी तक कोई उद्योग नहीं लगा. इसके लिए तीन साल पहले धरना प्रदर्शन भी हुआ, मामला हाई कोर्ट तक गया. किसानों ने कोर्ट में पीआईएल दाखिल की. पीआईएल में किसानों की मांग थी कि सरकार गन्ने का एमएसपी दे. लेकिन सरकार ने साफ इनकार कर दिया और कहा कि राशन में मक्का नहीं बांटा जाता है, इसलिए सरकार अपने स्तर पर मक्के की खरीद नहीं कर सकती.
इस तरह की कई शिकायतें किसानों की हैं जो कोसी का 'पीला सोना' बड़ी उम्मीद के साथ उगाते हैं. मगर एमएसपी देने की बारी आते ही सरकार मुकर जाती है. किसानों की बस इतनी मांग है कि कोसी में एक मक्का आधारित उद्योग लग जाए तो उनके हालात जरूर सुधर सकते हैं.
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