लैवेंडर की खेतीजम्मू-कश्मीर में लैवेंडर की खेती किसानों के लिए कमाई का नया विकल्प बनकर उभर रही है. गांदरबल में आयोजित पहले लैवेंडर फेस्टिवल के दौरान यह सामने आया कि सरकारी पहल के तौर पर शुरू हुई यह फसल अब कई जिलों में व्यावसायिक स्तर पर अपनाई जा रही है. बेहतर बाजार और ज्यादा आय की संभावना के कारण किसान पारंपरिक फसलों से लैवेंडर की तरफ रुख कर रहे हैं.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, बारामूला के किसान मोहम्मद अशरफ ने बताया कि लैवेंडर से मिलने वाला रिटर्न मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक है. यही वजह है कि किसानों की इसमें रुचि लगातार बढ़ रही है.
लैवेंडर खेती का विस्तार केंद्र सरकार के अरोमा मिशन के तहत सीएसआईआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन की पहल से शुरू हुआ था. समय के साथ यह पहल बाजार आधारित खेती के मॉडल में बदलती गई और अब इसे आय बढ़ाने वाली फसल माना जा रहा है.
लैवेंडर से निकाला जाने वाला एसेंशियल ऑयल इत्र, साबुन, कॉस्मेटिक, वेलनेस और दवा उद्योग में इस्तेमाल होता है. किसान सूखे फूल बेचकर भी अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं. किसानों के अनुसार, एक किलो सूखे फूल की कीमत 1000 से 1500 रुपये तक मिल जाती है.
डोडा, रामबन, उधमपुर, अनंतनाग, पुलवामा और गांदरबल समेत कई जिलों में अब लैवेंडर की खेती की जा रही है. करीब 1200 हेक्टेयर क्षेत्र इसके दायरे में आ चुका है.
होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सरकार क्लस्टर आधारित मॉडल पर काम कर रही है. 14 लैवेंडर क्लस्टर संचालित किए जा चुके हैं जिनसे 1105 किसान जुड़े हैं. इसके साथ एफपीओ, प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.
गांदरबल के बेनहामा में औषधीय और सुगंधित पौधों के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किया गया है. यहां किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री, प्रशिक्षण, वैज्ञानिक खेती और प्रोसेसिंग से जुड़ी सहायता दी जाएगी.
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