चीनी की कीमतें मजबूत रहने की संभावना (सांकेतिक तस्वीर)एजेंसी ने कहा कि भारत का चीनी क्षेत्र एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां उत्पादन में थोड़ी बढ़ोतरी के बावजूद, कम इन्वेंट्री (स्टॉक) से कीमतों को सहारा मिलने की उम्मीद है. हालांकि, इथेनॉल उत्पादकों को घटते मुनाफे का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि सप्लाई लगातार मांग से ज्यादा बनी हुई है. कुछ सुधार के बावजूद, चीनी का उत्पादन पहले की उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा है, और इथेनॉल क्षेत्र बढ़ते उत्पादन और मांग में धीमी बढ़ोतरी के बीच नुकसान का सामना कर रहा है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि चीनी फैक्ट्रियां दबाव में हैं, क्योंकि गन्ने की लागत बढ़ रही है, लेकिन चीनी की कीमतें उसी तेजी से नहीं बढ़ी हैं. इसमें यह भी कहा गया है कि इस क्षेत्र में फायदे के लिए इथेनॉल पर सरकार की स्पष्ट नीति जरूरी होगी. हालांकि इथेनॉल की कीमतें सीधे तौर पर कच्चे तेल से जुड़ी नहीं हैं, फिर भी दुनिया में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें इथेनॉल को एक वैकल्पिक ईंधन के तौर पर और भी ज्यादा महत्वपूर्ण बना सकती हैं.
कमजोर वैश्विक कीमतों और घरेलू सप्लाई की कमी के कारण, निर्यात भी 20 लाख टन की तय सीमा से नीचे रहने की उम्मीद है. नतीजतन, क्लोजिंग स्टॉक का स्तर लगभग 50 लाख टन के आस-पास रहने की संभावना है, जो सामान्य स्तर से थोड़ा कम है. इससे घरेलू कीमतों को लगातार सहारा मिलता रहेगा.
आने वाले सीजन में गन्ने की ऊंची कीमतों के कारण चीनी उत्पादन की लागत बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन चीनी की मजबूत कीमतें और बेहतर रिकवरी दरें इस असर को कुछ हद तक कम कर सकती हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अगर मध्य-पूर्व में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो ब्राजील की मिलें ज्यादा गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन के लिए कर सकती हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर चीनी की कीमतों को सहारा मिल सकता है. हालांकि, निर्यातकों को ट्रांसपोर्ट की ऊंची लागत और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
इथेनॉल के मोर्चे पर, गन्ने का इस्तेमाल करने वाले उत्पादकों को इथेनॉल की कीमतों में कोई बदलाव न होने के कारण अपने मुनाफे पर लगातार दबाव का सामना करना पड़ सकता है. इसके विपरीत, अनाज-आधारित डिस्टिलरीज को कच्चे माल की कम लागत से फायदा हो रहा है. DDGS जैसे बायप्रोडक्ट के उत्पादन में बढ़ोतरी से पशुओं के चारे के लिए एक सस्ता विकल्प उपलब्ध हुआ है, जबकि मक्के की रिकॉर्ड पैदावार के कारण कीमतें नीचे आई हैं, जिससे अनाज-आधारित उत्पादकों का मुनाफा बढ़ा है.
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत में इथेनॉल की मांग में बढ़ोतरी की गति धीमी पड़ रही है, क्योंकि देश अपने 20% ब्लेंडिंग (मिश्रण) के लक्ष्य के करीब पहुंच रहा है. साथ ही, उत्पादन क्षमता—विशेष रूप से अनाज-आधारित इकाइयों में—तेजी से बढ़ी है, जिसके कारण सप्लाई जरूरत से ज्यादा हो गई है. भारत में इथेनॉल की मांग, जो हाल के सालों में तेजी से बढ़ी थी, अब धीमी होने की उम्मीद है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ज्यादा उत्पादन होने की वजह से, आने वाले समय में कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना कम है. इसमें यह भी बताया गया है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत DDGS के आयात से सप्लाई बढ़ सकती है और मक्के की कीमतें कम रह सकती हैं, जिससे अनाज-आधारित डिस्टिलरीज को और मदद मिलेगी.
इस बीच, गन्ने से इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों पर दबाव बना रहने की उम्मीद है, क्योंकि पिछले तीन सालों में गन्ने की बढ़ती कीमतों के मुकाबले इथेनॉल की कीमतें उतनी नहीं बढ़ी हैं. एजेंसी ने कहा कि अगर इथेनॉल की ब्लेंडिंग का स्तर बढ़ाने या इसके दूसरे इस्तेमाल के लिए कोई साफ नीतिगत समर्थन नहीं मिलता है, तो इस क्षेत्र में उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल और मुनाफा, दोनों में कोई खास सुधार होने की संभावना नहीं है.
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