जलवायु परिवर्तन का खेती पर असर, किसानों को चाहिए मौसम-मिट्टी और हवा की सटीक जानकारी

जलवायु परिवर्तन का खेती पर असर, किसानों को चाहिए मौसम-मिट्टी और हवा की सटीक जानकारी

जलवायु बदलाव का असर खेती पर लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में किसानों के लिए सिर्फ मौसम की जानकारी ही नहीं, बल्कि मिट्टी और हवा की स्थिति की सटीक जानकारी भी जरूरी हो गई है. सही जानकारी से किसान फसल की बुवाई, सिंचाई और कीट-रोग प्रबंधन को बेहतर तरीके से तय कर सकते हैं.

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जलवायु परिवर्तन का खेती पर असर, किसानों को चाहिए मौसम-मिट्टी और हवा की सटीक जानकारीजलवायु परिवर्तन का खेती पर असर

समय के साथ मौसम में लगातार बदलाव हो रहा है. जहां मानव जीवन के स्वास्थ्य से लेकर खेती पर सीधा असर पड़ रहा है. कभी कम तो कभी ज्यादा बारिश के बीच तापमान में उतार-चढ़ाव और हवा की खराब क्वालिटी जैसी चुनौतियां लगातार सामने आ रही हैं. ऐसे में खेती को इन बदलावों के अनुकूल बनाने और किसानों को मौसम के जोखिम से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने पटना स्थित दशरथ मांझी श्रम और नियोजन अध्ययन संस्थान में आयोजित दो दिवसीय ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन क्लाइमेट चेंज क्रॉसरोड्स’ कार्यक्रम के दौरान अलग-अलग विषयों पर विस्तार से चर्चा की.

जिसमें, ‘कृषि, खाद्य सुरक्षा, टिकाऊ खाद्य प्रणाली और जलवायु तनाव’ विषय पर आयोजित तकनीकी सत्र में देशभर से आए वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने फसल विविधीकरण, मौसम के हिसाब से खेती की सलाह, कीट प्रबंधन, मिट्टी की नमी, वायु गुणवत्ता और स्मार्ट फसल प्रतिरूपण को खेती के भविष्य के लिए अहम बताया.

जलवायु परिवर्तन में बारिश के साथ मिट्टी की भूमिका खास

तकनीकी सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि खेती पर जलवायु परिवर्तन के असर को समझने के लिए केवल तापमान और बारिश का आंकड़ा पर्याप्त नहीं है. बल्कि हवा की क्वालिटी, धुंध, कीटों का प्रकोप और मिट्टी में नमी जैसे पहलुओं पर भी नजर रखना बेहद जरूरी है. खराब हवा और धुंध से फसलों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जबकि मिट्टी की नमी पौधों को पानी देने के साथ उसके तापमान और जैविक गतिविधियों को भी प्रभावित करती है.

रबी और खरीफ वाली फसलों पर अगले साल से अध्ययन

‘कृषि, खाद्य सुरक्षा, टिकाऊ खाद्य प्रणाली और जलवायु तनाव’ विषय पर आयोजित तकनीकी सत्र के दौरान वैज्ञानिकों ने बताया कि इन सभी पहलुओं को साथ लेकर अगले दो वर्षों के लिए एक्शन रिसर्च की योजना तैयार की जा रही है. जिसकी शुरुआत संभावित रूप से 2027 की जायद फसल (रबी और खरीफ के बीच उगाई जाने वाली) से हो सकती है. वहीं, इस अध्ययन के दौरान जहां किसानों को केवल योजनाओं का लाभ लेने वाला नहीं, बल्कि शोध का सक्रिय हिस्सा बनाया जाएगा. साथ ही आईएमडी, आईसीएआर, बिहार कृषि विश्वविद्यालय और पूसा कृषि विश्वविद्यालय समेत अन्य संस्थानों के सहयोग से खेत स्तर पर आंकड़े जुटाकर अध्ययन किया जाएगा. इस दौरान विद्यार्थियों और युवा शोधार्थियों को कृषि और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों पर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया.

समय पर मौसम की मिले किसानों को जानकारी

विशेषज्ञों ने बताया कि इस वर्ष मॉनसून के शुरुआती दौर में बारिश कम होने के बावजूद कई किसानों ने मौसम को देखते हुए अपनी फसल योजना में बदलाव किया है. जहां ऊपरी इलाकों में धान की जगह कुछ किसानों ने उड़द और मोटे अनाज जैसी वैकल्पिक फसलों को अपनाया. वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसानों को समय रहते मौसम की जानकारी मिले तो वे अपनी खेती में बदलाव करके अच्छी कमाई कर सकते हैं. साथ ही नुकसान को काफी हद तक कम भी कर सकते हैं.

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