Fennel cultivation: सौंफ की खेती में मालामाल हो रहे राजस्‍थान के 4 जिले, ड्रिप सिंचाई से बदल रही किस्‍मत 

Fennel cultivation: सौंफ की खेती में मालामाल हो रहे राजस्‍थान के 4 जिले, ड्रिप सिंचाई से बदल रही किस्‍मत 

खारे पानी और ड्रिप सिंचाई के साथ सौंफ की खेती यह साबित कर रही है कि कम संसाधनों में भी टिकाऊ खेती संभव है. राजस्थान का यह मॉडल दूसरे सूखा प्रभावित राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है. सही तकनीक, सरकारी सहयोग और किसानों की मेहनत से सौंफ की खेती अब राजस्थान में विकास की नई कहानी लिख रही है.

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Fennel cultivation: सौंफ की खेती में मालामाल हो रहे राजस्‍थान के 4 जिले, ड्रिप सिंचाई से बदल रही किस्‍मत 

सौंफ, वह मसाला जिसका प्रयोग कई तरह की डिशेज को स्‍वादिष्‍ट बनाने के अलावा माउथ फ्रेशनर के तौर पर भी किया जाता है. अब यही सौंफ किसानों की आर्थिक स्थिति बदलने में भी कारगर साबित हो रही है. राजस्‍थान के किसान अब सौंफ की खेती करके मालामाल हो रहे हैं. खास बात है कि राजस्‍थान के ये वो जिले हैं जो पूरी तरह से रेगिस्‍तान से घिरे हैं और किसानों को सिंचाई के लिए खारे पानी पर निर्भर रहना पड़ता है. राजस्‍थान को आमतौर पर सूखा, रेतीली जमीन और पानी की कमी वाला राज्य माना जाता है, लेकिन अब यही राज्य सौंफ की खेती में नई मिसाल पेश कर रहा है. खास बात यह है कि राजस्थान के चार जिले ऐसे है जो ड्रिप सिंचाई तकनीक के सहारे बेहतर उत्पादन और मुनाफा हासिल कर रहे हैं. यह बदलाव न सिर्फ किसानों की आय बढ़ा रहा है, बल्कि कम पानी वाले इलाकों में खेती की नई राह भी खोल रहा है.

4 जिले बन रहे मुख्‍य केंद्र

राजस्थान में सौंफ की खेती मुख्य रूप से नागौर, जालौर, बाड़मेर और जोधपुर जिलों में तेजी से बढ़ रही है. इन जिलों की जलवायु सौंफ के लिए अनुकूल मानी जाती है. सर्दियों में ठंडा और शुष्क मौसम सौंफ की फसल को अच्छा विकास देता है. पहले इन इलाकों में सीमित फसलें ही उगाई जाती थीं, लेकिन अब किसान सौंफ को एक कैश क्रॉप के रूप में अपना रहे हैं.राजस्थान के कई इलाकों में मीठे पानी की उपलब्धता कम है और भूमिगत पानी खारा है. आमतौर पर खारे पानी को खेती के लिए नुकसानदायक माना जाता है, लेकिन सौंफ एक ऐसी फसल है जो हल्के से मध्यम खारे पानी को सहन कर सकती है. यही वजह है कि किसान खारे पानी का भी उपयोग कर पा रहे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जल की क्षारीयता नियंत्रित हो और सही तकनीक अपनाई जाए, तो सौंफ की पैदावार पर नकारात्मक असर नहीं पड़ता.

ड्रिप सिंचाई से बढ़ी पैदावार 

सौंफ की खेती में ड्रिप सिंचाई ने बड़ा बदलाव किया है. ड्रिप सिस्टम से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है. राजस्‍थान जैसे जल संकट वाले राज्य में यह तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. ड्रिप सिंचाई से नमी संतुलित रहती है और खारे पानी के दुष्प्रभाव भी काफी हद तक कम हो जाते हैं. इससे पौधों की ग्रोथ बेहतर होती है और उत्पादन बढ़ता है. सौंफ की खेती में लागत अपेक्षाकृत कम होती है और बाजार में इसकी मांग लगातार बनी रहती है. मसाला उद्योग, आयुर्वेदिक दवाओं और घरेलू उपयोग में सौंफ की खपत ज्यादा है. राजस्थान के किसान एक हेक्टेयर में औसतन 12 से 15 क्विंटल तक सौंफ का उत्पादन कर रहे हैं. मौजूदा बाजार भाव को देखें तो किसानों को अच्छी आमदनी मिल रही है. यही कारण है कि किसान पारंपरिक फसलों से हटकर सौंफ की ओर आकर्षित हो रहे हैं.

सरकारी योजनाओं से मदद 

राज्य सरकार और कृषि विभाग की ओर से किसानों को ड्रिप सिंचाई पर सब्सिडी, उन्नत बीज और तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है. कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को सौंफ की उन्नत किस्मों, बुवाई का सही समय और पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी दे रहे हैं. इससे किसानों का जोखिम कम हो रहा है और उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर हो रही है. जस्थान के ये चार जिले अब धीरे-धीरे सौंफ उत्पादन के हब के रूप में पहचान बना रहे हैं. स्थानीय मंडियों के साथ-साथ बाहर के व्यापारी भी यहां से सौंफ की खरीद कर रहे हैं. इससे किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है. आने वाले समय में यदि प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट पर ध्यान दिया जाए, तो सौंफ किसानों की आय और ज्यादा बढ़ सकती है.

भविष्य की खेती का मॉडल

खारे पानी और ड्रिप सिंचाई के साथ सौंफ की खेती यह साबित कर रही है कि कम संसाधनों में भी टिकाऊ खेती संभव है. राजस्थान का यह मॉडल दूसरे सूखा प्रभावित राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है. सही तकनीक, सरकारी सहयोग और किसानों की मेहनत से सौंफ की खेती अब राजस्थान में विकास की नई कहानी लिख रही है.

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