
पंजाब को पिछले कई वर्षों से गेहूं–धान की खेती का गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन अब यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. बठिंडा, मलरकोटला, मानसा और मुक्तसर जैसे जिलों में कुछ प्रगतिशील किसान बेर की खेती के जरिए फसल विविधीकरण की नई मिसाल पेश कर रहे हैं. कभी बेर को 'गरीबों का फल' माना जाता था लेकिन अब यह जलवायु अनुकूल, कम लागत और ज्यादा मुनाफे वाली फसल के तौर पर देखा जाने लगा है. रेतीली, खारी और कमजोर जमीन में भी पनपने वाला बेर, कम लागत, जल्दी फल और बेहतर दाम के कारण पंजाब में फसल विविधीकरण की दिशा में एक मजबूत विकल्प बनता जा रहा है. कई युवा किसान अब उस जमीन से भी कमाई कर रहे हैं, जहां पहले गेहूं–धान असफल हो चुके थे.
पहले खेतों की मेड़ों पर जंगली रूप में उगने वाला बेर अब पानी की अधिक खपत वाली फसलों का मजबूत विकल्प बनकर उभर रहा है. यह कम सिंचाई में अच्छा उत्पादन देता है और इनपुट लागत भी बेहद कम है. उमरान और एप्पल क्रॉस जैसी किस्में किसानों में लोकप्रिय हो रही हैं. आमतौर पर इसकी रोपाई फरवरी–मार्च या जुलाई–अगस्त में की जाती है. खास बात यह है कि बेर के पौधे पहले ही साल फल देने लगते हैं और 10–15 साल से ज्यादा समय तक उत्पादन देते हैं. दिसंबर से अप्रैल तक इसकी तुड़ाई होती है, जिससे यह आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से टिकाऊ फसल बन जाती है.
बठिंडा के बलुआना गांव के किसान जगतार सिंह इस बदलाव का अच्छा उदाहरण हैं. वर्ष 2002 में किन्नू से बागवानी की शुरुआत करने वाले जगतार ने बाद में अंगूर, अनार, नाशपाती और आड़ू भी लगाए. आज उनके बागों में बेर नई पहचान बना रहा है. वे पांच एकड़ में बेर उगा रहे हैं, जिसमें उमरान और एप्पल क्रॉस दोनों किस्में हैं.
एप्पल क्रॉस बेर 100–125 ग्राम वजनी, मीठा और पीले रंग का होता है, जो दिसंबर के आखिर से फरवरी तक बाजार में आता है. वहीं उमरान किस्म मार्च–अप्रैल में पकती है, जब मौसम का जोखिम बढ़ जाता है. इसी वजह से जगतार ने अपने करीब 90 प्रतिशत उमरान पौधों पर एप्पल क्रॉस की ग्राफ्टिंग कर दी है. उनका कहना है कि एप्पल क्रॉस की मार्केटिंग ज्यादा आसान और फायदेमंद है.
प्रति एकड़ लागत करीब 25,000 रुपये आती है, जबकि सरकारी योजनाओं से 20,000 रुपये प्रति एकड़ तक की सहायता मिल जाती है. तीसरे साल से व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाता है. एक पौधे से 50–60 किलो से लेकर परिपक्व होने पर दो क्विंटल तक फल मिल सकता है. औसतन 15 रुपये प्रति किलो के हिसाब से प्रति एकड़ दो लाख रुपये तक की कमाई संभव है, जो गेहूं और धान दोनों से कहीं ज्यादा है.
बेर की एक और खासियत है ईंधन लकड़ी. छंटाई से निकलने वाली टहनियां करीब 1,000 रुपये प्रति क्विंटल बिक जाती हैं, जिससे सालाना 50–60 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय हो जाती है. इससे बाग की पूरी लागत निकल आती है. जगतार का मानना है कि बागवानी भविष्य है, क्योंकि यह पानी बचाती है और स्थायी आय देती है. मलरकोटला के भैनी कांबोआन गांव में रजू नर्सरी के मालिक आसिफ अली उर्फ रजू रेड एप्पल, मिस इंडिया, कश्मीरी रेड और बिना बीज वाली किस्मों पर प्रयोग कर रहे हैं. वे खुद ट्रायल के बाद ही पौधे किसानों को देते हैं. उनका कहना है कि कोविड के बाद बेर की मांग बढ़ी है, क्योंकि इसमें विटामिन ए और सी भरपूर होते हैं और यह इम्युनिटी बढ़ाने वाला फल माना जाता है.
बठिंडा के लेहरा बेगा गांव के भोला सिंह ने 1.5 एकड़ में बेर का बाग लगाया. 65 उमरान पेड़ों से उन्हें करीब 150 क्विंटल उत्पादन मिला. 20–22 रुपये प्रति किलो के भाव से सालाना 3–3.5 लाख रुपये की आमदनी हुई, जो उनकी बाकी 4.5 एकड़ गेहूं–धान के बराबर है. एक बार स्थापित होने के बाद बेर के पेड़ों को साल में सिर्फ तीन सिंचाइयों की जरूरत होती है. मानसा के मौजो खुर्द गांव के जसविंदर सिंह पिछले 20 साल से बेर उगा रहे हैं. उनके कुछ पुराने पेड़ तीन क्विंटल तक फल देते हैं. ड्रिप सिंचाई अपनाकर वे हर साल कई मजदूरों को रोजगार भी देते हैं. उन्हें गुणवत्ता वाले बेर उत्पादन के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं.
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