EXPLAINER: कृषि सेक्टर बना जियोपॉलिटिक्स का नया हथियार, समझिए कैसे ग्लोबल डील्स की दिशा बदल रहा खाद्यान्न?

EXPLAINER: कृषि सेक्टर बना जियोपॉलिटिक्स का नया हथियार, समझिए कैसे ग्लोबल डील्स की दिशा बदल रहा खाद्यान्न?

भारत और अमेरिका ने नई ट्रेड डील फाइनल की है. इस डील में भारत ने कहा कि हम अमेरिका से फल, सब्जियां, नट्स, वाइन और कुछ कृषि उत्पाद खरीदेंगे. लेकिन इस डील में भारत ने साफ लाइन खींच दी कि हम अपने चावल, डेयरी, चीनी और सोयाबीन जैसी एग्री कमोडिटी पर कोई समझौता नहीं करेंगे. अब समझने वाली बात है कि ये चार चीजें भारत ने अमेरिका की डील से क्यों बचाए?

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कृषि सेक्टर बना जियोपॉलिटिक्स का नया हथियार, समझिए कैसे ग्लोबल डील्स की दिशा बदल रहा खाद्यान्न?अब खेती सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जियोपॉलिटिक्स के सेंटर में पहुंच रही है.

भारत-अमेरिका की नई ट्रेड डील, यूरोप का किसानों के विरोध में सड़कों पर उतरना, रूस-यूक्रेन युद्ध से दुनिया में गेहूं की कीमतें हिल जाना,  ये सब अलग-अलग खबरें नहीं हैं. ये एक ही कहानी के हिस्से हैं. पहले कभी तेल के दम कर पावर सेंटर स्थापित होते थे और अब कृषि के दम पर ग्लोबल कॉरिडोर में दबदबा बनाया जा रहा है. आज की दुनिया में खेती सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कृषि अब वैश्विक शक्तियों का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है. डोनाल्ड ट्रंप ने भी जब पीएम मोदी से फोन पर बात की तो इस डील के सेंटर में था तो सिर्फ कृषि सेक्टर. इसलिए हम समझेंगे कि कैसे दुनिया की सबसे ताकतवर सरकारें गेहूं, चावल और दूध के जरिए राजनीति कर रही हैं. 

कृषि बन रही दुनिया का नया 'तेल'

कुछ ही साल पहले दुनिया की राजनीति तेल से चलती थी. लेकिन अब तेल की जगह फूड सिक्योरिटी ले रही है. क्योंकि दुनिया अब तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ बढ़ रही है और दूसरी ऊर्जा जरूरतों के लिए न्यूक्लियर एनर्जी काफी है. ऐस में तेल का दबदबा वैश्विक डीलों में कमजोर होने लगा है. महाशक्तियों को भी ये समझ आ रहा है कि तेल के बिना देश फिर भी चलाया जा सकता है, मगर क्लाइमेट चेंज के चलते जिन देशों की खेती तबाह हो रही है, वहां खाने के बिना आबादी पर बड़ा संकट पैदा हो सकता है. कोरोना महामारी के वक्त इसका सबसे बड़ा सबक दुनिया ने खुली आंखओं से देखा. जब वैश्विक सप्लाई चेन रुकीं, तो देशों को समझ आया कि अगर खाना बाहर से आता है तो देश सुरक्षित नहीं. इसीलिए आयातित अन्न पर निर्भर बहुत सारे देशों को ने अपनी नई रणनीति तैयार की है. ग्लोबल पॉवर का नया फॉर्मूला अब ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा से मिलकर बनता है. और यहीं से शुरू होती है कृषि की जियोपॉलिटिक्स. 

भारत के पास मजबूत एग्रीकल्चर हथियार

हाल ही में भारत और अमेरिका ने नई ट्रेड डील फाइनल की है. इस डील में भारत ने कहा कि हम अमेरिका से फल, सब्जियां, नट्स,  वाइन और कुछ कृषि उत्पाद खरीदेंगे. लेकिन इस डील में भारत ने साफ लाइन खींच दी कि हम अपने चावल, डेयरी, चीनी और सोयाबीन जैसी एग्री कमोडिटी पर कोई समझौता नहीं करेंगे. अब समझने वाली बात है कि ये चार चीजें भारत ने अमेरिका की डील से क्यों बचाए? असल में चावल, डेयरी, चीनी और सोयाबीन सिर्फ फसलें नहीं हैं, ये देश की खाद्य सुरक्षा की रीड़ की हड्डी हैं और साथ ही इन फसलों के इर्द-गिर्द भारत में राजनीतिक समीकरण भी तय होता हैं. 

केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत भारत में करीब 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन लेते हैं. हमारी 50% आबादी खेती पर निर्भर है और हमारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सिस्टम इन्हीं फसलों पर आधारित है. अगर ये सेक्टर दूसरे देशो के लिए खुल जाते, तो इससे सस्ता विदेशी दूध भारत आता, सस्ता अमेरिकी चावल बाजार में आता और भारतीय किसानों के इन उत्पादों की कीमतें गिर जातीं. देखते ही देखते अगले कुछ सालों में हमारी खाद्य सुरक्षा की प्रमुख चीजें देश के किसान उगाना ही बंद कर देते. इससे देश की जनता की थाली अमेरिका के हाथ में चला जाती. इसलिए भारत ने साफ कहा कि ट्रेड करेंगे, लेकिन कृषि सुरक्षा से कोई समझौता नहीं और यही है कृषि भू-राजनीति. 

रूस-यूक्रेन युद्ध में व्हीट वॉर का एंगल

रूस-यूक्रेन युद्ध भी केवल जमीन की लड़ाई नहीं थी, बल्कि एक तरह से व्हीट वॉर भी थी. दरअसल, रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया का 30% गेहूं निर्यात करते हैं. जब युद्ध शुरू हुआ तो गेहूं की कीमतें आसमान पर पहुंच गईं. अफ्रीका और एशिया में खाद्य संकट बढ़ गया. ऐसे हालात में रूस ने कहा कि जो देश हमारा साथ देंगे, उन्हें सस्ता गेहूं मिलेगा. मतलब गेहूं को युद्ध में दबाव बनाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया.

इसका एक और उदाहरण यूरोप में देखने को मिला. 2024-25 के दौरान पूरा यूरोप किसानों के विरोध से हिल गया. फ्रांस से लेकर जर्मनी और  नीदरलैंड से लेकर बेल्जियम तक हर जगह ट्रैक्टर सड़कों पर थे. ये सब इसलिए हुआ क्योंकि यूरोप ने सस्ते कृषि आयात खोल दिए थे. यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने जंग लड़ रहे यूक्रेन की मदद करने के लिए उसके अनाज को अपने देशों में बिना टैक्स आने दिया. मगर इससे हुआ ये क यूरोप के किसानों के उगाए अनाज की कीमतें गिर गईं. ऐसे में वहां के किसान सड़क पर उतर गए. यूरोप के किसानों की दलील थी कि उन्हें क्लाइमेट नियम भी मानने पड़ रहे हैं और सस्ते आयात से भी लड़ना पड़ रहा है? यहां फिर से दुनिया ने देखा कि कैसे कृषि के कारण राजनीतिक अस्थिरता आ सकती है. 

खाद्यान्न बनेगा जियोपॉलिटिक्स का रिमोट कंट्रोल

यही वजह है कि हर देश अपने किसानों को बहुत बड़े स्तर पर आर्थिक सुरक्षा देते हैं. अमेरिका अपने किसानों को बहुत बड़े स्तर पर सब्सिडी देता है,  यूरोप भी सब्सिडी देता है और भारत भी बड़े स्तर पर अपने किसानों को मुख्य फसलों पर MSP देता है. ऐसा इसलिए क्योंकि हर देश में किसान खाद्य सुरक्षा की सबसे आधारभूत इकाई होते हैं. यही वजह है कि एक्सपर्ट कयास जताते हैं कि आने वाले 10 साल में दुनिया में सबसे बड़ी लड़ाई तेल या गैस की नहीं होगी, बल्कि पानी, जमीन और खाद्यान्न के लिए होगी. जलवायु परिवर्तन के कारण बहुत सारे देशों में सूखा बढ़ेगा, लगातार बाढ़ आएंगी, फसलों का उत्पादन बड़े स्तर पर घटेगा. यानी कि दुनिया वैश्वीकरण से खाद्य राष्ट्रवाद खाद्य राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रही है. 21वीं सदी में जो देश फूड चेन और फूड सिक्योरिटी नियंत्रित करेगा, उसी के पास जियोपॉलिटिक्स का रिमोट कंट्रोल होगा.

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