
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट से पहले इकोनॉमिक सर्वे पेश किया. इस सर्वे में यूं तो कई ऐसे बिंदु थे जो देश के कृषि सेक्टर के लिए सकारात्मक थे लेकिन कुछ ऐसी बातें भी थीं जो केंद्र सरकार की नाकामी की तरफ इशारा करती हैं. इनमें से ही एक रहा सरकार के इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम का जिक्र. इस सर्वे से यह साफ हो गया कि सरकार ने जिस इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम का सपना संजोया था, वह अब टूटता नजर आ रहा है. सर्वे के अनुसार वित्त वर्ष 2025 में मक्का वाले इथेनॉल की कीमतों में 11.7 फीसदी का इजाफा तो हुआ लेकिन उसके बाद भी यह यह धान के रकबे को कम करने में नाकाम रहा. इसके बजाय, ऐसा लगता है कि इसने अनजाने में दालों के उत्पादन में गिरावट ला दी.
सरकार हर साल फीडस्टॉक के हिसाब से प्रति लीटर इथेनॉल की कीमतें तय करती है.इसके तहत ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) पक्का उठाव करती हैं. हालांकि, मक्का आधारित इथेनॉल प्रोड्यूसर्स पर किसानों को एक तय कीमत देने की कोई मजबूरी नहीं है लेकिन चीनी-बेस्ड यूनिट्स को सरकार की तरफ से तय रेट पर गन्ना खरीदना पड़ता है. फिर भी, सर्वे कहता है कि इस पॉलिसी का मकसद किसानों को इनकम का एक 'स्टेबल' सोर्स देना है.
सर्वे के अनुसार,'वित्त वर्ष 22 और 2025 के बीच, मक्के से बने इथेनॉल की कीमत में 11.7 फीसदी के CAGR से इजाफा हुआ है और यह चावल या गुड़ से बने इथेनॉल की तुलना में काफी तेजी से बढ़ा है. इससे मक्के के पक्ष में एक मजबूत और लगातार प्राइस सिग्नल बना है. उम्मीद थी कि इससे धान से मक्के की तरफ रकबा बढ़ाने में मदद मिलेगी लेकिन धान के रकबे में उम्मीद के मुताबिक कमी नहीं हुई है.' वहीं सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि इसी दौरान दालों के उत्पादन और रकबे में गिरावट आई है.
2024-25 के फसल वर्ष (जुलाई-जून) में, धान का रकबा 7.5 प्रतिशत बढ़कर 514.2 लाख हेक्टेयर हो गया. इसके साथ ही भारत चावल के उत्पादन में ग्लोबल लीडर बन गया. हालांकि, मक्के का रकबा भी 2024-25 में 6.9 प्रतिशत बढ़कर 120.2 लाख हेक्टेयर हो गया. लेकिन, पिछले साल दालों का क्षेत्र 276.2 लाख हेक्टेयर पर ही रुका हुआ था. सर्वे में कहा गया है कि मक्के की पैदावार वित्त वर्ष 2016 में 2.56 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 तक 3.78 टन प्रति हेक्टेयर हो गई. इसका श्रेय इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को दिया गया.
सर्वे में कहा गया है, 'प्रोडक्टिविटी में ये बढ़ोतरी, पॉलिसी में दखल न होने पर भी, कई दूसरे अनाज और दालों के मुकाबले मक्के को किसानों के लिए एक प्राकृतिक तौर पर एक आकर्षक फसल बना देती है. हालांकि, इसमें यह भी बताया गया है कि सोयाबीन, सूरजमुखी के बीज, रेपसीड, मूंगफली और बाजरा जैसी फसलों की पैदावार इसी समय में या तो रुकी हुई है या घट गई है. सर्वे में सरकार ने यह भी कहा है कि भारत का इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) हाल के सालों में देश की एनर्जी सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी का एक अहम हिस्सा बन गया है.सर्वे के मुताबिक, 'EBP प्रोग्राम ने कच्चे तेल के सब्स्टिट्यूशन में ठोस फायदे दिए हैं, फॉरेन एक्सचेंज आउटफ्लो कम किया है, एमिशन कम किया है और किसानों की आय को भी बढ़ाया है.'
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