सुप्रीम कोर्टकावेरी नदी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. कर्नाटक सरकार ने सोमवार को शीर्ष अदालत में कहा कि इस साल कम बारिश और कई इलाकों में सूखे की स्थिति के कारण तमिलनाडु की 11 हजार मिलियन क्यूबिक फीट (TMC) पानी की मांग पूरी करना मुश्किल है. वहीं, तमिलनाडु सरकार ने कहा कि वह संकट के दौरान अपने हिस्से के पानी और पहले से बकाया आपूर्ति की मांग कर रही है. मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने तमिलनाडु की नई याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया.
सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि यह साल राज्य के लिए बेहद कठिन रहा है और कई इलाकों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है. उन्होंने दलील दी कि उपलब्ध पानी का संरक्षण करना जरूरी है, ताकि आवासीय क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति प्रभावित न हो.
श्याम दीवान ने यह भी कहा कि तमिलनाडु को नवंबर में पूर्वोत्तर मॉनसून से बारिश का लाभ मिलने की उम्मीद है, जिससे वहां के जलाशयों में पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है. कर्नाटक को इस बारिश से वैसा लाभ नहीं मिलेगा. उन्होंने कहा कि कम बारिश वाले वर्षों में इस तरह की समस्या बार-बार सामने आती है.
वहीं, तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत से कर्नाटक को पानी की कमी की भरपाई करने का निर्देश देने की मांग की. उन्होंने कहा कि संकट के दौरान तमिलनाडु को मिलने वाले पानी का हिस्सा आनुपातिक आधार पर तय किया जाना चाहिए. पानी की कमी जारी रहने से राज्य में फसलों पर असर पड़ सकता है.
तमिलनाडु सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि 7 अक्टूबर तक कावेरी नदी के पानी की आपूर्ति में 11 TMC की कमी दर्ज की गई है. राज्य ने मांग की है कि कर्नाटक इस बकाया पानी को तत्काल पूरा करे और बिलिगुंडलू में 10 दिनों तक प्रतिदिन 1.3 TMC पानी पहुंचाने की व्यवस्था करे. बिलिगुंडलू कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित पानी मापने का प्रमुख केंद्र है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस आपरेश कुमार सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि जब इस साल बारिश की कमी के कारण दोनों राज्य प्रभावित हैं, तो पानी की कमी की भरपाई कैसे की जा सकती है. जस्टिस विक्रम नाथ ने टिप्पणी की कि अगर यह सामान्य वर्ष होता तो स्थिति अलग होती.
मुकुल रोहतगी ने कहा कि किसानों की परेशानी को देखते हुए मामले को अगले साल तक नहीं टाला जा सकता. उन्होंने अदालत से कम से कम अंतरिम व्यवस्था करने का अनुरोध किया, ताकि तमिलनाडु को उसके हिस्से का पानी मिल सके.
तमिलनाडु सरकार के मुताबिक, 24 सितंबर को हुई कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) की बैठक में बारिश और पानी के प्रवाह में कमी के अनुपात के आधार पर बिलिगुंडलू में 52.935 TMC पानी का प्रवाह होना चाहिए था. राज्य ने आरोप लगाया कि समिति ने कमी दर्ज करने के बावजूद कर्नाटक को बकाया पानी की भरपाई करने का निर्देश नहीं दिया.
तमिलनाडु सरकार ने कहा कि समिति ने 24 सितंबर से अगले 15 दिनों तक बिलिगुंडलू में 4,000 क्यूसेक पानी पहुंचाने का निर्देश दिया था. राज्य ने दावा किया कि कर्नाटक इस निर्देश का प्रतिदिन पालन नहीं कर पाया. इसके बाद 8 अक्टूबर को हुई बैठक में प्रवाह घटाकर 9 अक्टूबर से अगले 15 दिनों के लिए 3,000 क्यूसेक कर दिया गया.
तमिलनाडु सरकार ने कहा कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के गठन के आठ साल बाद भी कम बारिश या सूखे की स्थिति में दोनों राज्यों के बीच पानी बांटने का स्पष्ट फॉर्मूला तैयार नहीं हुआ है. राज्य का कहना है कि ऐसे हालात में पानी का बंटवारा आनुपातिक आधार पर होना चाहिए, ताकि किसी एक राज्य पर पूरा बोझ न पड़े.
तमिलनाडु ने अदालत से 24 सितंबर के प्राधिकरण के निर्देशों को लागू कराने और 24 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच पानी की आपूर्ति में हुई 0.94 TMC की कमी पूरी करने की मांग की है. इसके साथ ही राज्य ने 8 अक्टूबर की बैठक में तय किए गए आगे के जल प्रवाह को भी सुनिश्चित कराने का अनुरोध किया है.
इससे पहले, कावेरी जल विवाद को लेकर तमिलनाडु सरकार ने 3 अगस्त को भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कर्नाटक से तत्काल पानी छोड़ने का निर्देश देने की मांग की थी. 24 सितंबर को अदालत ने कर्नाटक सरकार से तमिलनाडु की याचिका पर जवाब मांगा था.
उस दौरान तमिलनाडु ने कहा था कि पानी की कमी के कारण उसकी खरीफ की शुरुआती फसल को नुकसान हो चुका है. इसके जवाब में कर्नाटक ने राज्य में गंभीर सूखे की स्थिति का हवाला दिया था. ताजा सुनवाई में दोनों राज्यों ने पानी की उपलब्धता और अपने-अपने हिस्से को लेकर दलीलें रखीं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की नई याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया. (पीटीआई)
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