
किसान कल्पेश पटेल (फोटो-एएनआई)गुजरात के सूरत जिले के ओलपाड तालुका स्थित सरस गांव के युवा किसान कल्पेश पटेल ने अपने पिता की मौत के बाद खेती का पूरा तरीका बदल दिया. कभी खेतों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करने वाला परिवार अब प्राकृतिक खेती की मिसाल बन चुका है. कल्पेश पटेल आज 50 से अधिक किस्मों के केले उगा रहे हैं और उनकी पहचान राज्य ही नहीं, देशभर में प्राकृतिक खेती करने वाले प्रगतिशील किसान के रूप में बन रही है. कल्पेश पटेल निजी कंपनी में केमिकल ऑपरेटर के तौर पर काम करते हैं. उन्होंने बताया कि उनके पिता रमणभाई खेती में बड़े पैमाने पर रासायनिक कीटनाशकों और खाद का उपयोग करते थे. इसी दौरान पिता को कैंसर हुआ और बाद में उनका निधन हो गया. इस घटना ने कल्पेश की सोच पूरी तरह बदल दी.
कल्पेश पटेल ने कहा कि जब उनके पिता बीमार पड़े तो उन्हें महसूस हुआ कि खेती में इस्तेमाल होने वाले जहरीले रसायन इंसानों और मिट्टी दोनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनके पिता के शरीर से हमेशा कीटनाशकों की तेज गंध आती थी, लेकिन उस समय वह खेती से सीधे जुड़े नहीं थे. पिता की मौत के बाद उन्होंने तय किया कि अब खेतों में रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करेंगे.
प्राकृतिक खेती की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कल्पेश पटेल ने गुजरात कृषि विभाग की ट्रेनिंग ली. उन्होंने जीवामृत जैसे प्राकृतिक उर्वरक तैयार करना सीखा और धीरे-धीरे पूरी खेती को प्राकृतिक मॉडल में बदल दिया. प्रकृति से लगाव होने के कारण उन्होंने खेती को केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारने और लागत घटाने पर भी काम किया. कल्पेश ने बताया कि वह पिछले सात वर्षों से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं. उन्होंने अपने खेत में फॉरेस्ट मॉडल भी अपनाया है, जिससे जैव विविधता बढ़ी और फसल की गुणवत्ता में सुधार हुआ.

कल्पेश पटेल को परिवार से करीब आठ बीघा जमीन मिली थी. इनमें से साढ़े तीन बीघा जमीन पर वह 50 से अधिक किस्मों के केले की खेती कर रहे हैं. उनके खेत में पुवन, अधापुरी, रस्थाली, रेड बनाना, ब्लू जावा, बसराई, महालक्ष्मी और इलायची केले जैसी कई प्रजातियां उगाई जा रही हैं.
उन्होंने केले की खेती में रिकॉर्ड उत्पादन भी हासिल किया है. वर्ष 2025 में उनके खेत में तैयार केले का एक घौद (गुच्छा) 73 किलोग्राम तक पहुंच गया, जबकि सामान्य तौर पर एक गुच्छे का औसत वजन करीब 20 किलोग्राम माना जाता है. कल्पेश के खेत में केले के गुच्छे का औसत वजन 30 किलोग्राम से अधिक है.
कल्पेश पटेल ने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनकी लागत में बड़ा अंतर आया है. रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च लगभग खत्म हो गया. उन्होंने कहा कि प्रति बीघा हर साल 15 हजार से 20 हजार रुपये तक की बचत हो रही है.
उन्होंने बताया कि मिट्टी की सेहत सुधरने के साथ केले का उत्पादन भी तेजी से बढ़ा. साढ़े तीन बीघा जमीन से वह सालाना 10 से 12 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं. कल्पेश अपने उत्पादों की कीमत खुद तय करने के सिद्धांत पर काम करते हैं और वैल्यू एडिशन के जरिए अतिरिक्त आय भी कमा रहे हैं.
कल्पेश पटेल केवल कच्चा उत्पादन बेचने पर निर्भर नहीं हैं. अगर केले बाजार में नहीं बिकते तो वह उनसे केले के वेफर्स, सूखे केले से तैयार फिग और केले का पाउडर बनाते हैं. इससे उन्हें फसल खराब होने का नुकसान नहीं उठाना पड़ता और आय बढ़ाने में मदद मिलती है.
वह सूरत के वेसू स्थित कृषि बाजार में प्राकृतिक खेती से तैयार केले और अन्य उत्पाद सीधे बेचते हैं. गुजरात सरकार ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई शहरों में ऐसे विशेष बाजार शुरू किए हैं, जहां किसान सीधे ग्राहकों तक अपनी उपज पहुंचा सकते हैं.
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात में प्राकृतिक खेती को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है. किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूरी बनाने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं. राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी लगातार प्राकृतिक खेती के प्रचार में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और कई बार खेतों का दौरा कर चुके हैं.
कल्पेश पटेल की सफलता की चर्चा राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उनसे बातचीत की और उनकी कहानी को सोशल मीडिया पर साझा किया. इससे प्राकृतिक खेती को लेकर दूसरे किसानों में भी रुचि बढ़ रही है. (एएनआई)
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