कृष्णा यादव की सफलता की कहानीसंघर्ष की भट्टी में तपकर कुंदन बनी कृष्णा यादव की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की रहने वाली कृष्णा का जीवन एक समय ऐसे मोड़ पर था, जहां सिर छिपाने को छत तक नहीं थी. आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अपना घर बेचना पड़ा और तीन बच्चों के साथ वे दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में मजदूरी करने पर मजबूर हो गईं. एक अनपढ़ महिला, जो दूसरों के खेतों में दिहाड़ी करती थी, आज सैकड़ों से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रही है. उनकी सफलता का राज केवल उनकी मेहनत नहीं, बल्कि कुछ नया सीखने की ज़िद और 'मेक इन इंडिया' के सपने को हकीकत में बदलने का जज्बा है.
पैसे-पैसे को तरसने वाले परिवार की बागडोर जब इस महिला ने संभाली, तो किस्मत ने भी उनके हौसले के आगे घुटने टेक दिए. आज उनका नाम कृषि जगत में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है, क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया कि कामयाबी डिग्री की मोहताज नहीं होती.
बुलंदशहर की गलियों से निकलकर दिल्ली के आलीशान मंचों तक पहुंची कृष्णा यादव की कहानी केवल एक व्यापारिक सफलता नहीं, बल्कि अदम्य साहस का प्रतीक है. 1996 में जब उनके पति की नौकरी छूटी, तो परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया. एक तरफ तीन बच्चों की जिम्मेदारी थी और दूसरी तरफ आर्थिक तंगी से टूटे हुए पति. ऐसी घड़ी में कृष्णा ने हार मानने के बजाय लड़ने का फैसला किया. उन्होंने एक परिचित से मात्र 500 रुपये उधार लिए और एक बेहतर कल की तलाश में दिल्ली आ गईं. नजफगढ़ में किराये की जमीन पर सब्जियां उगाने से शुरू हुआ उनका सफर आज एक ऐसी मिसाल बन चुका है, जिसे देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी सलाम करते हैं.
कृष्णा यादव की असली उड़ान तब शुरू हुई जब उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र उजवा से 'फूड प्रोसेसिंग' की ट्रेनिंग ली. कृष्णा यादव की मेहनत को सही दिशा तब मिली जब वे दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संपर्क में आईं. यहां से उन्होंने अचार और मुरब्बा बनाने की वैज्ञानिक ट्रेनिंग ली. अनपढ़ होने के बावजूद उन्होंने तकनीक को समझा और हाइजीन और साफ-सफाई व पैकेजिंग के गुर सीखे.
ICAR उनके लिए एक मार्गदर्शक बनकर उभरा. 2001 में उन्होंने सिर्फ 'करौंदे के अचार' और कैंडी से शुरुआत की, जिसे वे सड़क किनारे बेचा करती थीं. लेकिन उनकी मेहनत और स्वाद का जादू ऐसा चला कि 2010 तक उन्होंने अपने पोर्टफोलियो में 151 अलग-अलग उत्पाद शामिल कर लिए.आज 'श्री कृष्णा पिकल्स' के बैनर तले अचार, चटनी और मुरब्बे के अलावा एलोवेरा जेल, जामुन और स्ट्रॉबेरी के जूस जैसे स्वास्थ्यवर्धक पेय पदार्थ भी बनाए जा रहे हैं.
जो महिला कभी खुद दूसरों के खेतों में मजदूरी करती थी,आज वह करोड़ों रुपये सालाना का टर्नओवर कर रही हैं. उनका यह सफर दिखाता है कि कैसे एक 'अनपढ़' कहलाने वाली महिला अपनी स्वदेशी सूझबूझ और वैज्ञानिक तकनीक के तालमेल से करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर सकती है. लेकिन कृष्णा यादव के लिए यह सफलता सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है. उन्होंने अपने इस उद्यम के माध्यम से 110 स्थायी और लगभग 400 मौसमी मजदूरों को रोजगार दिया है. उनके कारखाने में काम करने वाले ज्यादातर लोग ग्रामीण परिवेश से हैं, जिन्हें कृष्णा ने खुद आत्मनिर्भर बनाया है. उनकी इस सफलता ने साबित कर दिया कि स्वरोजगार और 'मेक इन इंडिया' का सपना ग्रामीण भारत की मिट्टी में भी उतनी ही मजबूती से जड़ें जमा सकता है जितना किसी बड़े शहर के स्टार्टअप में.
कृष्णा यादव ने अपनी सफलता को सिर्फ खुद तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने अब तक बिहार, यूपी, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों की 30,000 से अधिक महिलाओं और युवाओं को फूड प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग देकर स्वरोजगार के काबिल बनाया है. उनके दिल में समाज के लिए कितनी संवेदना है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने BSF के 147 शहीद जवानों की विधवाओं को मुफ्त ट्रेनिंग दी ताकि वे सम्मान के साथ अपना जीवन जी सकें. इसके अलावा, उन्होंने दिव्यांग युवाओं को भी मार्केटिंग के हुनर सिखाकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा है. उनके इस सामाजिक योगदान ने उन्हें एक उद्यमी से ऊपर उठाकर एक समाज सुधारक की पहचान दी है.
कृष्णा यादव के इस बेमिसाल योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 'नारी शक्ति पुरस्कार' साल 2016 और 'पंडित दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय कृषि पुरस्कार' जैसे कई बड़े सम्मानों से नवाजा है. वे आज उन सभी कृषि महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए एक 'रोल मॉडल' हैं, जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं. उनकी दृढ़ता, ईमानदारी और दूसरों को साथ लेकर चलने की भावना हमें सिखाती है कि अगर इरादा नेक हो और मेहनत में सच्चाई हो, तो वक्त बदलते देर नहीं लगती.
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