केले की खेती से किसान बेहतर मुनाफा कमाते हैं, लेकिन बारिश की वजह से अगस्त-सितंबर के महीने में केले के पौधों में रोग लगने का भी खतरा बढ़ जाता है. इस महीने में केले के पौधे में सिगाटोका रोग का प्रभाव देखा जा रहा है. ये एक फफूंद जनित रोग है, जिसकी पहचान और बचाव करना किसानों के लिए बहुत जरूरी है. इस रोग के लगने से किसानों को कई बार नुकसान का सामना करना पड़ता है, इन्हीं समस्याओं के निजात के लिए बिहार कृषि विभाग ने केले में लगने वाले रोग से बचाव के उपाय बताएं हैं. इस उपाय को अपनाकर किसान अपनी केले की फसल को बचा सकते हैं.
केले के पौधे में काला सिगाटोका रोग का प्रभाव देखा जा रहा है, जो एक फफूंद जनित रोग है. इस रोग के कारण केले के नए पत्ते की ऊपरी भाग पर हल्का पीला दाग या धारीदार लाइन के रूप में परिलक्षित होता है. बाद में ये धब्बे बड़े और भूरे रंग के हो जाते हैं, जिसका केंद्र हल्का कत्थई रंग का होता है. इस रोग को लगने से फलों के उत्पादन पर भारी असर पड़ता है.
पीला सिगाटोका रोग से बचाव के लिए प्रतिरोधी किस्म के पौधे लगाना चाहिए. साथ ही खेत को खरपतवार से मुक्त रखें और रोगग्रस्त पत्तियों को हटाकर नष्ट कर दें. बारिश से अगर खेत भर गया है तो पानी की निकासी करें, खेत में पानी का ठहराव बिल्कुल न होने दें, क्योंकि यह रोग के संक्रमण को बढ़ावा देता है. इसके अलावा 1 किलो ट्राईकोडर्मा विरिडे को 25 किलो गोबर खाद के साथ प्रति एकड़ की दर से मिट्टी में मिला दें.
केले के फसल में काला सिगाटोका रोग का प्रभाव बढ़ते जा रहा है. इस रोग के कारण केले के पत्तियों के निचले भाग पर काला धब्बा, धारीदार लाइन के रूप में होता है. ये बारिश के दिनों में अधिक तापमान होने के कारण फैलते हैं और इनके प्रभाव से केले परिपक्व होने से पहले ही पक जाते हैं, जिसके कारण किसानों को उचित लाभ नहीं मिल पाता है और काफी नुकसान भी होता है.
काला सिगाटोका रोग से बचाव के लिए रासायनिक फफूंदनाशक कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. इसके अलावा आप खेत या पौधे के आसपास किसी तरह का पानी न जमा होने दें. अगर पौधों के आसपास किसी तरह की गंदगी है तो फौरन हटा दें ताकि फफूंद ना पनपने पाए. अगर पौधे को पानी की जरूरत नहीं है तो अनावश्यक सिंचाई करने से बचना चाहिए.
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