किसान ने पशुओं के लिए बनाया गॉलर बेलगांव और-शहरी इलाकों में पशुपालन की सबसे बड़ी चुनौती खुले में चरना है. गांवों में मवेशी जंगलों और खाली मैदानों में चरते हैं, तो शहरों में वे अक्सर सड़कों और कूड़े के ढेरों के आसपास घूमते नजर आते हैं. खुले में चरते समय इन पशुओं पर निगरानी रखना नामुमकिन होता है, जिससे वे अनजाने में घास के साथ लोहे की नुकीली कीलें, तार या कचरे में पड़ी धारदार धातु निगल लेते हैं. यह धातु उनके पेट में जाकर फंस जाती है, जिसे 'हार्डवेयर डिजीज' कहते हैं. इससे पशु को असहनीय दर्द होता है, दूध उत्पादन गिर जाता है और कई बार उनकी तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है.
इसके अलावा, झाड़ियों में जहरीले सांपों का खतरा और रात के समय पशु का खो जाना किसानों की बड़ी चिंता है. इसी गंभीर समस्या को देखते हुए, तमिलनाडु के शिवगंगा जिले के अनुभवी पशुपालक श्री सुब्रमण्यन ने अपनी 15 वर्षों की सूझबूझ से एक 'मैग्नेटिक बेल कॉलर यानी' चुंबकीय घंटी पट्ट तैयार किया है. यह साधारण उपकरण न केवल मवेशियों को जहरीली धातु खाने से रोकता है, बल्कि एक साथ कई सुरक्षा घेरे तैयार करता है.
इस आविष्कार की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है. यह करीब 500 ग्राम वजन का एक मजबूत रस्सी वाला पट्टा है, जिसमें एक शक्तिशाली बेलनाकार चुंबक लगाया गया है. इस चुंबक को पशु के गले में इस तरह सेट किया जाता है कि यह उसके मुंह के पास रहे. जब गाय या बैल जमीन पर घास चरते हैं, तो यह चुंबक आसपास पड़े लोहे के टुकड़ों, कीलों या तारों को अपनी ओर खींच लेता है, जिससे पशु उन्हें निगल नहीं पाता. यह छोटा सा बदलाव पशुओं को एक दर्दनाक मौत से बचाता है और उनके जीवन को सुरक्षित बनाता है.
सुब्रमण्यन का यह 'मैग्नेटिक बेल कॉलर' पूरी तरह से स्वदेशी और किफायती है. इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री जैसे मजबूत रस्सी, चुंबक और लोहे की घंटी गांव के बाजारों में आसानी से मिल जाती है. इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि एक पट्टे की लागत 78 रुपये से भी कम आती है और यह लगभग 3 साल तक चलता है. इसमें न तो बिजली की जरूरत है और न ही किसी महंगे मेंटेनेंस की.
यह उन गरीब किसानों के लिए वरदान है जो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा पशुओं के इलाज पर खर्च नहीं कर सकते हैं. इस पट्टे में लगी पारंपरिक लोहे की घंटी केवल सजावट के लिए नहीं है, बल्कि इसके कई उद्देश्य हैं. जब पशु चलता है, तो घंटी की आवाज से आसपास छिपे जहरीले सांप और जंगली जानवर भाग जाते हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों में चरने वाले पशु सुरक्षित रहते हैं.
इसके साथ ही, घंटी की आवाज सुनकर मालिक को अंधेरे में भी अपने मवेशियों की लोकेशन का पता चल जाता है. इतना ही नहीं, यह घंटी पास के खेतों में काम करने वाले किसानों को भी सतर्क कर देती है, जिससे फसल के नुकसान को समय रहते रोका जा सकता है. आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो यह नवाचार बहुत प्रभावशाली है.
एक गाय, भैस या बैल की कीमत लगभग ₹40,000 होती है. लोहे की चीजें निगलने से होने वाली मौत किसान की कमर तोड़ देती है. इस पट्टे के इस्तेमाल से न केवल ₹40,000 का नुकसान बचता है, बल्कि हर साल इलाज पर होने वाले करीब 4,000 का खर्च भी बच जाता है. पुलीकुलम जैसी स्वदेशी नस्लों को बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योंकि स्वस्थ पशु ही नस्ल को आगे बढ़ा सकते हैं.
सुब्रमण्यन जी का यह मॉडल अब केवल शिवगंगा तक सीमित नहीं रहना चाहिए. हालांकि इसके नतीजे बहुत सकारात्मक हैं, लेकिन अगर इसे वैज्ञानिक रूप से और अधिक परखा जाए, तो इसे पूरे भारत के पशुपालकों के लिए अनिवार्य बनाया जा सकता है. वैज्ञानिक जांच से यह सुनिश्चित होगा कि लंबे समय तक चुंबक गले में रहने से पशु के व्यवहार पर कोई असर तो नहीं पड़ रहा. यदि इसे सरकारी सहयोग मिलता है, तो यह 'जीरो-कॉस्ट' तकनीक देश के करोड़ों पशुपालकों की किस्मत बदल सकती है और हमारी देसी नस्लों को विलुप्त होने से बचा सकती है.
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