
बीज पुरुष बाबूलाल दहियामध्य प्रदेश के सतना जिले के पिथौराबाग गांव के रहने वाले 83 वर्षीय बाबूलाल दहिया महज एक किसान नहीं, बल्कि भारतीय कृषि के जीवित पुस्तकालय हैं. दुनिया जब आधुनिक खेती और हाइब्रिड बीजों की ओर भाग रही थी, तब दहिया जी ने 20 साल पहले महसूस किया कि रसायनों के उपयोग और नए बीजों के आने से हमारी धरती की पुरानी शक्ति और फसलों का स्वाद खत्म हो रहा है. उन्होंने देखा कि जो चावल हमारे पूर्वज खाते थे, वे न केवल पौष्टिक थे बल्कि बिना किसी दवा के भी बीमारियों से लड़ने में सक्षम थे. इसी विचार के साथ उन्होंने विलुप्त हो रही देसी फसलों को बचाने का संकल्प लिया.
उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज उनके पास धान की 200 से अधिक ऐसी किस्में हैं, जो इतिहास के पन्नों में खो चुकी थीं. उनका मानना है कि बीज केवल अनाज नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं. आज उनके द्वारा संरक्षित बीज न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे देश के लिए एक बेशकीमती विरासत बन चुके हैं, जो आने वाले समय में भुखमरी और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से लड़ने में हमारी मदद करेंगे.
बाबूलाल जी ने अपने छोटे से खेत को एक जीवित संग्रहालय में बदल दिया है. यहां सिर्फ धान ही नहीं, गेहूं की पुरानी 25 किस्में, मक्का की 4, बाजरा और मोटे अनाज की 12 और सब्जियों की 34 से अधिक पारंपरिक किस्में सुरक्षित हैं. इस तरह उनके पास विभिन्न फसलों के लगभग 275 के आसपस देसी किस्में हैं. उन्होंने अपने घर पर ही एक 'फसल और बीज संग्रहालय' बनाया है, जहां वे आने वाले हर व्यक्ति को बीजों की पहचान और उनकी विशेषताएं बताते हैं.

इस संग्रहालय का उद्देश्य केवल बीजों को जमा करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के किसानों और छात्रों को यह दिखाना है कि हमारी पारंपरिक खेती कितनी समृद्ध थी. उनके पास ऐसे बीज भी हैं जो कम पानी में उगते हैं. कुछ बीज ऐसे भी हैं जो बाढ़ के पानी में खराब नहीं होते. यह विविधता आज के बदलते मौसम में खेती को बचाने का सबसे बड़ा हथियार है.
बाबूलाल दहिया का सबसे बड़ा योगदान किसानों को बाजार की निर्भरता से मुक्त करना है. आज अधिकांश किसान हर साल बड़ी कंपनियों से महंगे बीज और खाद खरीदने को मजबूर हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ती जा रही है. बाबूलाल किसानों को समझाते हैं कि असली आजादी 'बीज संप्रभुता' में है. वे कहते हैं कि अगर किसान अपना बीज खुद बचाएगा, तो उसे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा. वे किसानों को मुफ्त में बीज देते हैं और बस एक ही शर्त रखते हैं कि अगली फसल में वे उस बीज को बढ़ाकर अन्य किसानों को भी बांटें. उनका यह तरीका न केवल खेती की लागत कम करता है, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को भी बनाए रखता है. उनके प्रयासों से सैकड़ों किसान अब जैविक और पारंपरिक खेती की ओर लौट रहे हैं.
बाबूलाल दहिया जी का काम केवल उनके गांव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इसे एक बड़े आंदोलन का रूप दे दिया है. उन्होंने 'जैव विविधता बचाओ अभियान' शुरू किया, जो किसानों से लेकर वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और मीडिया तक फैला हुआ है. वे स्कूल-कॉलेजों में जाकर छात्रों को बताते हैं कि कैसे ये पुराने बीज भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी हैं. वैज्ञानिकों का भी मानना है कि इन पारंपरिक बीजों में ऐसे गुण हैं जिनका उपयोग भविष्य में नई और मजबूत फसलें तैयार करने के लिए किया जा सकता है. उनकी इस मुहिम ने पर्यावरण संरक्षण को एक नई दिशा दी है.
वे समाज के हर वर्ग को जोड़कर यह संदेश दे रहे हैं कि अगर हम अपनी जैव विविधता को नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए शुद्ध भोजन मिलना असंभव हो जाएगा. उनकी निस्वार्थ सेवा और पर्यावरण के प्रति समर्पण को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' जैसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान से नवाजा है. 82 वर्ष की आयु में भी उनकी ऊर्जा युवाओं को मात देती है. वे आज भी अपने खेतों में मिट्टी से जुड़े रहते हैं और नई फसलों पर प्रयोग करते रहते हैं.
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