Sugarcane farming: आलू, सरसों और गेहूं के साथ गन्ने की 'एडवांस' तैयारी, कम बीज में ज्यादा पैदावार

Sugarcane farming: आलू, सरसों और गेहूं के साथ गन्ने की 'एडवांस' तैयारी, कम बीज में ज्यादा पैदावार

वसंत ऋतु में जब किसान आलू, सरसों या गेहूं की कटाई का इंतजार करते हैं, तो गन्ने की बुवाई में 25 से 40 दिनों की देरी हो जाती है. इस देरी के कारण गन्ने को बढ़ने का पूरा समय नहीं मिलता, जिससे पैदावार काफी घट जाती है. साथ ही, गर्मी बढ़ने के कारण पारंपरिक बुवाई में गन्ने का जमाव भी कम होता है. इस समस्या का सबसे बेस्ट समाधान 'सिंगल बड नर्सरी' तकनीक है.

Advertisement
आलू, सरसों और गेहूं के साथ गन्ने की 'एडवांस' तैयारी, कम बीज में ज्यादा पैदावारगन्ने की खेती में सिंगल बड तकनीक का फायदा

गन्ने की खेती करने वाले किसानों के लिए गन्ने का बड चीप या सिंगल बड नर्सरी तकनीक फायदेमंंद साबित हो रही है. अक्सर किसान सरसों, आलू या गेहूं की कटाई का इंतजार करते हैं, जिससे गन्ने की बुवाई में देरी हो जाती है. देर से बुवाई करने पर गन्ने की पैदावार कम हो जाती है और फसल को पूरा समय नहीं मिल पाता. इस समस्या का सबसे सरल समाधान यह है कि जब आपके खेत में गेहूं या सरसों खड़ी हो, तभी आप खाली जगह या घर के पास गन्ने की कलियों को प्रो-ट्रे में लगा दें. जब तक आपकी पिछली फसल कटेगी, तब तक गन्ने के पौधे 25 से 30 दिन के होकर तैयार हो जाएंगे.

फसल कटते ही आप इन तैयार पौधों को सीधे खेत में रोप सकते हैं. परंपरागत रूप से किसान गन्ने के बड़े टुकड़ों वाले दो या तीन आंख वाली गिल्लियां का उपयोग बुवाई के लिए करते हैं, जिससे बीज की लागत बहुत अधिक आती है और जमाव भी अनिश्चित रहता है. लेकिन अब सिंगल बड तकनीक ने गन्ने की खेती में एक नई बदलाव लाई है.

गन्ने की खेती में सिंगल बड नर्सरी का कमाल 

यह तकनीक न केवल बीज की बचत करती है, बल्कि किसानों को कम मेहनत में बेहतर पैदावार और अतिरिक्त आय के नए अवसर भी प्रदान करती है. बड चिप तकनीक में पूरे गन्ने को खेत में बोने के बजाय, एक विशेष मशीन की मदद से गन्ने की 'आंख' को छोटे चिप के रूप में निकाल लिया जाता है. इन चिप्स को बाविस्टिन जैसे रसायनों से उपचारित किया जाता है ताकि बीजजनित रोगों से बचाव हो सके.

इसके बाद, प्लास्टिक की ट्रे प्रो ट्रे में कोकोपीट या वर्मीकंपोस्ट भरकर इन चिप्स को बोया जाता है. लगभग 4 से 5 सप्ताह की देखभाल और हल्की सिंचाई के बाद, जब पौधा स्वस्थ और तैयार हो जाता है, तो इसे मुख्य खेत में रोपित कर दिया जाता है. यह तकनीक केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार का एक बेहतरीन जरिया भी बन रही है. प्रगतिशील किसान अब बड़े पैमाने पर बड नर्सरी स्थापित कर रहे हैं. एक पौधा तैयार करने की लागत लगभग एक से सवा रुपये आती है, जिसे बाजार में आसानी से 2 से 3  रुपये तक बेचा जा सकता है.

कम बीज में गन्ने के ज्यादा पैदावार का फॉर्मूला

पुरानी विधि में एक एकड़ खेत की बुवाई के लिए लगभग 25 से 30 क्विंटल गन्ना बीज की आवश्यकता होती है, जो किसान की लागत का एक बड़ा हिस्सा होता है. इसके विपरीत, बड चिप तकनीक में केवल 6 से 7 क्विंटल गन्ना बीज ही पर्याप्त होता है. इस विधि में गन्ने के सिंगल आंख वाले बड को उपयोग में लाया जाता है. इस तरह, किसान बुवाई के समय ही बीज की लागत में हजारों रुपये बचा लेता है, जिससे खेती का मुनाफा सीधे तौर पर बढ़ जाता है.

सिगल बड तकनीक में पौधों को एक निश्चित दूरी पर लगाया जाता है. पौधों के बीच मिलने वाले इस खाली स्थान का उपयोग किसान 'अंतःफसली खेती' के लिए कर सकते हैं. गन्ने के साथ दलहन, तिलहन, सब्जियां या अन्य नकदी फसलें उगाई जा सकती हैं. इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि गन्ने की फसल तैयार होने से पहले ही किसान को दूसरी फसलों से अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होने लगती है. यह विधि जोखिम को कम कर लाभ के दायरे को व्यापक बनाती है.

देर से बुवाई का डर होगा खत्म, बंपर होगी उपज

उत्तर भारत में गन्ने की बुवाई का सबसे सटीक समय मार्च (बसंत) माना जाता है, क्योंकि इस दौरान तापमान 28 से 35 डिग्री के बीच रहता है जो बेहतर जमाव के लिए अनुकूल है. अक्सर किसान गेहूं की कटाई के इंतजार में अप्रैल-मई तक बुवाई टाल देते हैं, जिससे गन्ने की बढ़वार के लिए कम समय मिलता है. सिंगल बड तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान गेहूं कटने से पहले ही नर्सरी तैयार कर सकता है. जैसे ही आलू, सरसों, गेहूं का खेत खाली होता है, तैयार पौधों का रोपण कर दिया जाता है, जिससे फसल पिछड़ती नहीं और पूरी पैदावार मिलती है. स्वस्थ और रोगमुक्त पौधों की मांग के कारण, समूह की महिलाएं  सिंगल बड उगाकर या युवा इस तकनीक के माध्यम से सालाना लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं. 

POST A COMMENT