Oilseeds Production: सोयाबीन पर संकट गहराया, सरसों बनी भारत की नंबर-1 तिलहन फसल

Oilseeds Production: सोयाबीन पर संकट गहराया, सरसों बनी भारत की नंबर-1 तिलहन फसल

भारत के तिलहन सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां सरसों (रेपसीड) उत्पादन में आगे निकलकर नंबर-1 बन गई है, जबकि सोयाबीन लगातार दूसरे साल गिरावट की ओर है. कम कीमतों और किसानों के मक्का की ओर रुझान के कारण सोयाबीन संकट में है, जिससे कृषि और पशुपालन क्षेत्र पर भी असर पड़ सकता है.

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सोयाबीन पर संकट गहराया, सरसों बनी भारत की नंबर-1 तिलहन फसलसोयाबीन का गिरा उत्पादन

भारत के तिलहन सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. अमेरिकी कृषि विभाग के फॉरेन एग्रीकल्चर सर्विस (FAS) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार दूसरे साल सोयाबीन का उत्पादन घटने वाला है, जबकि सरसों (रेपसीड) ने तिलहन फसलों में पहला स्थान हासिल कर लिया है. यह बदलाव सिर्फ किसानों ही नहीं, बल्कि देश के फीड और पशुपालन सेक्टर के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है.

FAS के अनुमान के अनुसार, 2026-27 में भारत का कुल तिलहन उत्पादन करीब 41 मिलियन टन रहेगा इसमें रेपसीड (सरसों) 12.1 मिलियन टन जबकि सोयाबीन का उत्पादन 10.35 मिलियन टन रहने की संभावना है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि बेहतर कीमतें मिलने और ज्यादा पैदावार देने वाली किस्मों को अपनाने की वजह से सरसों का उत्पादन करीब 2% बढ़ा है. वहीं दूसरी ओर, सोयाबीन का उत्पादन लगातार दूसरे साल 3% घटने का अनुमान है. इसकी बड़ी वजह यह है कि बाजार में सोयाबीन के दाम उत्पादन लागत से कम बने हुए हैं, जिससे किसानों का रुझान इस फसल से कम हो रहा है.

मक्का की ओर झुकाव, सोयाबीन पर संकट

पिछले कुछ साल में किसान तेजी से मक्का की खेती की ओर शिफ्ट हो रहे हैं. ऐसे में पहले से दबाव झेल रहा सोयाबीन अब अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है. ऊपर से तिलहन उत्पादन में सरसों का आगे निकल जाना सोयाबीन के लिए एक और बड़ी चुनौती बन गया है.

फीड सेक्टर के लिए क्यों बुरी खबर?

सोयाबीन खली (सोया मील) अब तक फीड सेक्टर, खासकर पोल्ट्री और पशुपालन के लिए अहम मानी जाती रही है. लेकिन उत्पादन कम होने और कीमतें ऊंची रहने के चलते इसकी खपत पर असर पड़ रहा है. FAS के मुताबिक, सोयाबीन खली की खपत में 7% की गिरावट आ सकती है. इसके मुकाबले रेपसीड खली और मूंगफली खली का उत्पादन 3% बढ़ने की उम्मीद है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगी सोयाबीन खली और बदलती फीड जरूरतों के कारण पोल्ट्री और पशुपालन से जुड़े किसान अब सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं.

निर्यात में बढ़ोतरी, लेकिन घरेलू चिंता

एफएएस की रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां एक ओर घरेलू फीड सेक्टर सोयाबीन की कमी से जूझेगा, वहीं खली के निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

सोयाबीन खली के निर्यात में 13% बढ़ोतरी का अनुमान है. यूरोप में गैर-GMO भारतीय खली की मांग बनी हुई है. रेपसीड खली के निर्यात में 10% बढ़ोतरी हो सकती है. इसमें चीन सबसे बड़ा खरीदार बन सकता है, क्योंकि उसने 2025 के अंत में रिकॉर्ड मात्रा में रेपसीड खली खरीदी थी.

तेल उत्पादन की तस्वीर

भारत का कुल घरेलू तेल उत्पादन 9.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो मौजूदा साल से थोड़ा ज्यादा है जिसमें रेपसीड तेल के उत्पादन में 2% बढ़ोतरी का अनुमान है. जबकि सोयाबीन तेल के उत्पादन में 2% गिरावट की संभावना है.

इसका साफ मतलब है कि पेराई के लिए रेपसीड, सोयाबीन के मुकाबले ज्यादा उपलब्ध है. किसान भी अब नारियल, सरसों और मूंगफली जैसी उन फसलों की ओर बढ़ रहे हैं, जिनसे ज्यादा तेल निकलता है. 

आयात पर बढ़ती निर्भरता

इन सबके बीच एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि भारत अपनी कुल खाद्य तेल जरूरतों का करीब दो-तिहाई हिस्सा आयात से ही पूरा करेगा. सोयाबीन के कमजोर उत्पादन के चलते अब सोया मील के आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है, जो भविष्य में देश के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है. 

कुल मिलाकर, सरसों की बढ़ती ताकत और सोयाबीन की गिरती पकड़ ने तिलहन बाजार की तस्वीर बदल दी है. यह बदलाव जहां कुछ फसलों के लिए फायदेमंद है, वहीं सोयाबीन और उससे जुड़े फीड सेक्टर के सामने नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है.

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