Seaweed farming: बंपर कमाई का जरिया बना समुद्री शैवाल, हेल्थकेयर से लेकर खाद में बढ़ा इस्तेमाल

Seaweed farming: बंपर कमाई का जरिया बना समुद्री शैवाल, हेल्थकेयर से लेकर खाद में बढ़ा इस्तेमाल

समुद्री शैवाल, यानी सी-वीड या एल्गी, 21वीं शताब्दी का चिकित्सा भोजन कहा जाने लगा है. इन समुद्री शैवालों में कई जैव सक्रिय यौगिक होते हैं, जिनके कारण मानव और पशु में पूरक आहार के रूप में उपयोग किया जाता है. शैवाल समुद्र तट पर कम गहराई वाले इलाके में और चट्टानी किनारों पर उगते हैं. इनका इस्तेमाल खाद्य, ऊर्जा, रसायन और दवा उद्योग के साथ पोषण, बायोमेडिकल, फसल उर्वरक, पर्सनल केयर उत्पादों में भी किया जाने लगा है.

Advertisement
बंपर कमाई का जरिया बना समुद्री शैवाल, हेल्थकेयर से लेकर खाद में बढ़ा इस्तेमालसमुद्री शैवाल की खेती

समुद्री शैवाल यानी सी- वीड या एल्गी 21वीं शताब्दी का चिकित्सा भोजन कहा जाने लगा  है. इन समुद्री शैवालों में कई जैव सक्रिय यौगिक होते हैं, जिनके कारण मानव और पशु में पूरक आहार के फसल के उर्वरक रूप में उपयोग किया जाता है. सी-वीड सूक्ष्म एल्गी, यानी शैवाल होते हैं. ये समुद्र तट पर कम गहराई वाले इलाके में और चट्टानी किनारों पर उगते हैं. इनका इस्तेमाल खाद्य, ऊर्जा, रसायन और दवा उद्योग के साथ पोषण, बायोमेडिकल और पर्सनल केयर उत्पादों में भी किया जाने लगा है. घेघा, कैंसर, बोन रिप्लेसमेंट थेरेपी और कार्डियोवैस्कुलर सर्जरी में भी इनका इस्तेमाल किया जाने लगा है.

वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तेजी से बदलते बाजार में इनकी मांग बढ़ रही है. विशषज्ञों का कहना है कि सी-वीड कंपाउंड्स कास्मेटिक्स उत्पादों की गुणवत्ता को बेहतर करते हैं. यही वजह है कि कास्मेटिक्स इंडस्ट्री में इनका उपयोग बढ़ रहा है. सीवीड की बायोएक्टिव प्रापर्टीज की वजह भोजन, जैव उर्वरक और हेल्थ केयर के उत्पाद तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं. सीवीड समुद्र के तटीय जिलों में आमदनी का बेहतर जरिया बनता जा रहा है.

समुद्र तटीय किसानों के लिए सुनहरा अवसर

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) पूसा में माइक्रोबायोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. सुनील पब्बी के अनुसार भारत में 7516.6 किलोमीटर की तटरेखा है, जिसमें नौ समुद्री राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं. इन 70 तटीय जिलों में 17 करोड़ लगभग आबादी है जिसमें से लगभग 40  लाख मछुआरे जो 3288 मछली पकड़ने वाले गांवों और बस्तियों में रहते हैं. इनके लिए समुद्री शैवाल बेहतर आय का जरिया बन सकता है.

ये भी पढ़ें: आम के किसान ध्यान दें, मंजर के समय बारिश हो जाए तो तुरंत स्प्रे करें ये खाद

डॉ. सुनील पब्बी ने बताया कि भारत के समुद्री क्षेत्र में अभी तक सीवीड की 844 प्रजातियों का पता चला है. इनमें से रेड एल्गी की 434, ब्राउन एल्गी की 194 और ग्रीन एल्गी की 216 प्रजातियां हैं. अनुमान है कि इनका स्टॉक करीब 58,715 टन का है. यह सी-वीड आधारित इंडस्ट्री की जरूरत के हिसाब से कम है. हालांकि सी-वीड कल्टीवेशन बहुत ही आसान और सस्ता है. इसे तैयार होने में भी ज्यादा समय नहीं लगता. तमिलनाडु, गुजरात, लक्षद्वीप, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, गोवा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश,और ओडिशा में सी-वीड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. पिछले कुछ बरसों में उपभोक्ताओं की पसंद में ग्रीन और इको फ्रैंडली उत्पादों को लेकर प्राथमिकता बढ़ी है. नेचुरल, सुरक्षित और अधिक प्रभावी प्राकृतिक तत्वों के होने के चलते इनसे तैयार स्कीनकेयर उत्पाद बेहतर नतीजे दे रहे हैं.

समुद्री शैवाल की खेती है बेहद आसान

माइक्रोबायोलॉजी विशेषज्ञ डॉ पब्बी के अनुसार सीवीड की खेती समुद्र के किनारे कम गहरे पानी में होती है. इसके लिए बांस के राफ्ट या ट्यूब नेट का इस्तेमाल किया जाता है. इसके लिए आदर्श स्थिति यह है कि पानी में नमक की मात्रा 30 पीपीटी हो, सतह चट्टानी या बलुई हो, औसत तापमान 26 से 30 डिग्री सेल्सियस रहता हो, और पानी के बहाव की गति बहुत धीमी हो.

आमतौर पर तीन मीटर के वर्गाकार बांस के राफ्ट या ट्यूब मेट का इस्तेमाल किया जाता है जो समुद्र में तैरता रहता है. एक राफ्ट पर करीब 2000 रुपये का खर्च आता है. एक जगह पर इस तरह के कई राफ्ट रखे जाते हैं. सीवीड की एक फसल तैयार होने में 45 से 60 दिन लगते हैं. तैयार होने पर प्रति राफ्ट 40-50 से लेकर 240 से 260 किलो तक सी-वीड प्राप्त होता है. पानी से निकालने के बाद इन्हें सुखाना पड़ता है. सूखने के बाद वजन दसवें हिस्से के बराबर रह जाता है. यानी अगर गीला सीवीड 100 किलो का है तो सूखने के बाद वह 10 किलो रह जाएगा.

सीवीड उत्पादों की मांग में तेजी से वृद्धि

सीवीड विटामिन्स, मिनरल्स, अमीनो एसिड्स और प्रोटीन से भरपूर हैं. सीवीड से तैयार कास्मेटिक्स को लोग सिंथेटिक्स कॉस्मेटिक्स के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं. इसकी वजह से इन उत्पादों में प्राकृतिक और प्योर कंपाउंड्स और एक्सट्रैक्ट्स का होना है. पिछले कुछ वर्षों में उपभोक्ताओं की पसंद में ग्रीन और इको फ्रेंडली उत्पादों को लेकर प्राथमिकता बढ़ी है. नेचुरल, सुरक्षित और अधिक प्रभावी प्राकृतिक तत्वों के होने के चलते इनसे तैयार स्कीन केयर उत्पाद बेहतर नतीजे दे रहे हैं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तेजी से बदलते बाजार में इनकी मांग बढ़ रही है.

सीवीड से तैयार उत्पादन जहां त्वचा में नमी बरकरार रखते हैं, वहीं फोटो प्रोटेक्टिव, एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-एलर्जीक, एंटी-इनफ्लेमेटरी, एंटी-एक्ने, एंटी-रिंकलिंग, एंडी-माइक्रोबियल और एंटी-एजिंग जैसी प्रॉपर्टीज भी सीवीड से तैयार कॉस्मेटिक्स उत्पादों में होती हैं.

शैवाल की खाद से फसलों को लाभ

सभी जैव सक्रिय पदार्थ समुद्री शैवाल से निकाले गए शुद्ध प्राकृतिक पदार्थ होते हैं. इससे बनाए खाद धीरे-धीरे मिट्टी में पोषक तत्व छोड़ते रहते हैं जिससे लंबे समय तक पौधे को न्यूट्रीशन मिलता रहता है. इसमें पौधे की बढ़त के लिए जरूरी उत्प्रेरक हार्मोन होते हैं, जोकि सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का उचित उपयोग करके पौधे को मजबूत और स्वस्थ बनाते हैं. चूंकि समुद्री शैवाल समुद्री जल में विकसित होता है जहां का पर्यावरण समुद्री शैवाल को न केवल स्थलीय पौधों के रासायनिक घटकों को शामिल करने में सक्षम बनाता है, बल्कि इसमें कई पोषक तत्व भी बढ़ते हैं

ये पोषक तत्व पौधों के लिए अतुलनीय हैं. जैसे कि समुद्री पोलीसेकेराइड, मैनिटोल, फेनोलिक बहुलक, बीटाइन, फ्यूकोइडन. इसके अलावा, समुद्री शैवाल खाद में बड़ी मात्रा में पौधे की वृद्धि वाले सक्रिय पदार्थ जैसे कि इंडोलैसिटिक एसिड, साइटोकिनिन, जिब्रेलिन और खनिज तत्व जैसे आयोडीन, पोटेशियम, मैग्नीशियम, मैंगनीज और टाइटेनियम होते हैं. खेती-किसानी को ज्यादा प्रॉफिटेबल बनाने और लागत कम करने के लिए सरकार और एग्री कंपनियां लगातार कोशिश कर रही हैं. 

इफको की समुद्री शैवाल खाद

इस कड़ी में, कोऑपरेटिव सोसायटी इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर्स कोऑपरेटिव लिमिटेड (IFFCO) ने समुद्री शैलाव से बना बायो-फर्टिलाइजर सागरिका निकाला है, जिससे उत्पादन और मिट्टी की गुणवत्ता दोनों के लिए फायदेमंद है. समुद्री शैवाल में उपस्थित हार्मोन कोशिका विभाजन और कोशिका के विस्तार को बढ़ावा देता है. एक्सपर्ट के मुताब बीज की सुस्ती को तोड़ता है और अंकुरण को तीव्र करता है. फसल की वृद्धि को बढ़ावा देना, फसल की परिपक्वता को प्रेरित करना, नई जड़ों के निर्माण को प्रोत्साहित करना, इसका मुख्य काम है.

ये भी पढ़ें: पौधों के लिए टॉनिक है कच्चा कोयला, खाद में मिलाकर करें इस्तेमाल-फिर देखें फायदा

समुद्री शैवाल खाद अक्सर कार्बनिक सक्रिय पदार्थ में समृद्ध होता है और कार्बनिक पदार्थ सामग्री 18 प्रतिशत से अधिक होती है. यह मिट्टी की कुल संरचना और नमी को बनाए रख सकती है. यह खाद एक हार्मोन के रूप में काम करती है और मिट्टी की जैविक प्रभावशीलता को बढ़ाती है. मृदा संरचना बेहतर करने में मदद करती और सुधार करती है. मिट्टी को पोरस बनाती है और मिट्टी में रासायनिक प्रदूषण के कारण खोए गए प्राकृतिक कोलाइड संतुलन को बहाल करती है. इसके अलावा, सीवीड खाद से पौधा स्वस्थ, रोगमुक्त और मौसम की मार से सुरक्षित रहता है.

 

POST A COMMENT