विदेशी करेंसी की कमाई कराने वाली बासमती धान की किस्मों के बारे में जानिएभारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) द्वारा विकसित पूसा बासमती की कई किस्में आज किसानों और देश की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए अहम साबित हो रही हैं. इनमें पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1718 और पूसा बासमती 1509 प्रमुख हैं. इन किस्मों ने जहां किसानों को बेहतर उत्पादन और बाजार भाव दिलाया है, वहीं भारत के बासमती निर्यात को भी मजबूती दी है.
पूसा बासमती 1121 देश की सबसे लोकप्रिय बासमती किस्मों में शामिल है. इसकी लंबी और उच्च क्वालिटी वाली खुशबूदार दानेदार बनावट के कारण विदेशी बाजारों में इसकी भारी मांग रहती है. यही वजह है कि यह भारत के लिए सबसे अधिक विदेशी करेंसी कमाने वाली बासमती किस्मों में गिनी जाती है.
इस किस्म ने भारतीय बासमती चावल को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और आज भी कई राज्यों के किसान बड़े पैमाने पर इसकी खेती करते हैं.
पूसा बासमती 1718 को देश के बासमती उत्पादन वाले भौगोलिक संकेतक (GI) क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है. इसकी औसत पैदावार लगभग 46.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह करीब 135 दिनों में तैयार हो जाती है.
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बैक्टीरियल ब्लाइट रोग के प्रति प्रतिरोधी है. इसे मार्कर असिस्टेड सिलेक्शन (MAS) तकनीक के जरिए पूसा बासमती 1121 की उन्नत किस्म के रूप में विकसित किया गया है. यह भी देश के टॉप विदेशी करेंसी कमाने वाले बासमती चावलों में शामिल है.
पूसा बासमती 1509: कम पानी में ज्यादा फायदा
पूसा बासमती 1509 किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई है क्योंकि यह जल्दी तैयार होने वाली किस्म है. इसकी औसत पैदावार 41.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह केवल 115 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. यह पूसा बासमती 1121 की तुलना में लगभग 30 दिन पहले तैयार हो जाती है.
कम ऊंचाई, गिरने और दाना झड़ने की समस्या न होने के कारण इसकी खेती अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है. जल्दी पकने से किसानों को गेहूं की अगली फसल के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है, जिससे पराली जलाने की समस्या भी कम होती है.
विशेषज्ञों के अनुसार, यह किस्म 3 से 4 सिंचाइयों की बचत करती है और करीब 33 प्रतिशत तक पानी बचाने में मददगार साबित होती है.
धान की जया किस्म को भारत की कृषि क्रांति का प्रतीक माना जाता है. यह वही किस्म है जिसने 1960 और 1970 के दशक में देश में हरित क्रांति को नई गति दी.
जया एक सेमी-ड्वार्फ यानी कम ऊंचाई वाली धान किस्म है, जो लगभग 130 दिनों में तैयार होती है. इसकी उत्पादन क्षमता 5 टन प्रति हेक्टेयर तक मानी जाती है. उस समय इस किस्म ने पारंपरिक धान की तुलना में कहीं अधिक पैदावार देकर उत्पादन का नया रिकॉर्ड बनाया.
जया जैसी उन्नत किस्मों के कारण भारत खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा और देश को खाद्यान्न आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिली.
पूसा बासमती 1121, 1718 और 1509 जैसी किस्में जहां बेहतर उत्पादन, पानी की बचत और निर्यात आय बढ़ाने में मदद कर रही हैं, वहीं जया जैसी किस्मों ने भारत की कृषि व्यवस्था को नई दिशा दी. बदलते मौसम और बढ़ती लागत के दौर में ऐसी उन्नत किस्में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
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