
टमाटर की फसल उखाड़ते हुए श्रमिकमहाराष्ट्र के बीड जिले में किसान मौसम और बाजार की दोहरी मार झेल रहे हैं. एक तरफ बारिश की कमी से खरीफ फसलों पर संकट मंडरा रहा है तो दूसरी तरफ सब्जियों के दाम गिरने से किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है. यहां अंबाजोगाई तहसील के हणमंतवाड़ी गांव में इसी आर्थिक संकट के चलते एक किसान को अपनी चार एकड़ में खड़ी टमाटर की फसल उखाड़कर फेंकनी पड़ी. किसान महादेव कराड ने चार एकड़ में टमाटर की खेती की थी.
उन्होंने बताया कि पौध लगाने, कीटनाशकों के छिड़काव, तुड़ाई और फसल को बाजार तक पहुंचाने समेत खेती पर करीब 2 लाख रुपये खर्च हुए. इसके बावजूद टमाटर के भाव में भारी गिरावट के कारण उन्हें अब तक केवल करीब 40 हजार रुपये की आय ही हो सकी है.

किसान ने बताया कि केवल पौध लगाने पर 40 से 42 हजार रुपये खर्च हुए थे, जबकि कीटनाशकों के छिड़काव पर करीब 50 हजार रुपये खर्च करने पड़े. इसके बाद मजदूरी, तुड़ाई और परिवहन का खर्च भी लगातार बढ़ता गया.
महादेव कराड ने बताया कि शुरुआत में टमाटर का भाव करीब 200 रुपये प्रति कैरेट मिल रहा था. हालांकि, कुछ समय बाद कीमतों में तेज गिरावट आई और भाव घटकर सिर्फ 80 रुपये प्रति कैरेट तक पहुंच गया. यह कीमत करीब 4 रुपये प्रति किलो के आसपास बैठती है.

इतने कम भाव पर टमाटर बेचने से तुड़ाई और बाजार तक फसल पहुंचाने का खर्च निकालना भी संभव नहीं रहा. ऐसे में किसान ने बची हुई खड़ी फसल को तोड़कर बाजार भेजने के बजाय उसे खेत से ही हटाने का फैसला किया.
टमाटर की खेती से नुकसान उठाने के बाद किसान के सामने एक और खर्च खड़ा हो गया. चार एकड़ में खड़ी फसल को उखाड़ने के लिए मजदूर लगाने पड़े. महादेव कराड के मुताबिक, इस काम पर महिला मजदूरों की मजदूरी समेत करीब 30 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं. यानी जिस फसल से किसान को लागत की भरपाई की उम्मीद थी, उससे न तो पर्याप्त आय मिली और न ही फसल को खेत में छोड़ना संभव हुआ. कम कीमत के कारण फसल को हटाने का खर्च भी अलग से उठाना पड़ रहा है.
महादेव कराड ने बताया कि जिले के किसानों के सामने केवल टमाटर की कीमतों का संकट नहीं है. बारिश की कमी का असर सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों पर भी पड़ रहा है. एक तरफ बारिश न होने से फसलें सूखने का खतरा है, जबकि दूसरी तरफ बाजार में उपज के उचित दाम नहीं मिल रहे हैं.
किसान ने सरकार से टमाटर जैसी सब्जियों के लिए भी एक न्यूनतम या आधार मूल्य तय करने की मांग की है. उनका कहना है कि कीमतों में अचानक गिरावट आने पर सब्जी उत्पादक किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है.
महादेव कराड ने कहा कि बीमा और सब्सिडी को लेकर कई योजनाओं की बात की जाती है, लेकिन संकट के समय किसानों को राहत नहीं मिल पाती. करीब 2 लाख रुपये की लागत के मुकाबले केवल 40 हजार रुपये की आय मिलने के बाद अब उनके सामने अगली फसल के लिए फिर से कर्ज लेने की मजबूरी पैदा हो गई है.
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