केला किसानों पर संकट (AI- Image)महाराष्ट्र में केला किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं. एक तरफ सूखे और पानी की कमी से केले की फसल बर्बाद हो रही है, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया के देशों में निर्यात प्रभावित होने से किसानों को उनकी उपज का सही दाम नहीं मिल रहा है. हालात इतने खराब हो गए हैं कि कई किसानों को अपनी तैयार फसल पर ब्लेड कटर और ट्रैक्टर चलाकर उसे नष्ट करना पड़ रहा है. किसानों को केले का भाव 2 से 5 रुपये प्रति किलो तक मिल रहा है, जिससे उनकी लागत और परिवहन का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया है.
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले की मोहोल तहसील के पापरी गांव के किसान मोहन डेकाले को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है. उन्होंने चार एकड़ में केले की फसल लगाई थी. करीब दो साल तक फसल की देखभाल करने और लाखों रुपये खर्च करने के बाद जब केले बेचने का समय आया, तो व्यापारियों ने उन्हें केवल 2 रुपये प्रति किलो का भाव दिया. इस कीमत पर केले को खेत से मंडी तक पहुंचाने का खर्च भी नहीं निकल रहा था. आखिरकार मजबूरी में मोहन डेकाले ने अपनी पूरी फसल पर ब्लेड कटर चलवा दिया. उनकी फसल में कई केले के गुच्छे पेड़ों पर ही पक चुके थे, लेकिन उन्हें तोड़कर बाजार तक पहुंचाना घाटे का सौदा बन गया था.
डेकाले ने बताया कि एक एकड़ में केले की खेती पर कम से कम 2 लाख रुपये खर्च होते हैं. इसके बावजूद फसल नष्ट करने के लिए उन्हें 50 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़े. उन्होंने कहा कि दो साल की मेहनत और लाखों रुपये लगाने के बाद अपनी ही फसल को नष्ट करना उनके लिए बेहद दर्दनाक था.
केला किसानों की परेशानी सिर्फ कम कीमत तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र के कई इलाकों में बारिश की कमी, बढ़ते तापमान और गिरते भूजल स्तर ने भी किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. कुएं और बोरवेल सूखने से खेतों में सिंचाई का पानी नहीं मिल रहा है. वहीं, बिजली कटौती के कारण किसान मोटर पंप भी नहीं चला पा रहे हैं.
सोलापुर के किसान पांडुरंग भोसले के मुताबिक, इलाके में कई किसान अपनी केले की फसल को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पानी की कमी और बिजली कटौती के कारण सिंचाई करना मुश्किल हो गया है. दूसरी तरफ बाजार में भी सही भाव नहीं मिल रहा. ऐसे में कई किसान नुकसान से बचने के लिए अपनी फसल उखाड़ने की तैयारी कर रहे हैं.
सूखे का असर वाशिम जिले में भी देखने को मिल रहा है. यहां ढिल्ली गांव के किसान उमेश मरकड को अपनी 2.5 एकड़ केले की फसल पर ट्रैक्टर चलाना पड़ा. उन्होंने करीब 3,000 केले के पौधे लगाए थे और एक साल तक उनकी देखभाल की थी. अगले महीने फसल की कटाई होनी थी, लेकिन बारिश नहीं होने से अक्टूबर में ही उनके कुएं और बोरवेल सूख गए. पानी की कमी और बढ़ते तापमान के कारण पूरी फसल सूखने लगी. इस खेती पर उन्होंने करीब 3.5 से 4 लाख रुपये खर्च किए थे, लेकिन फसल बचाना संभव नहीं हुआ. आखिरकार उन्हें पूरे बाग में ट्रैक्टर चलाकर फसल नष्ट करनी पड़ी.
केले की कीमतों में गिरावट की एक बड़ी वजह पश्चिम एशिया के देशों में निर्यात प्रभावित होना है. क्षेत्रीय संघर्ष के कारण ईरान, इराक और खाड़ी देशों में भारतीय केलों की सप्लाई में रुकावट आई है. महाराष्ट्र भारत के प्रमुख केला उत्पादक राज्यों में शामिल है. यहां से बड़ी मात्रा में केले पश्चिम एशिया के देशों में भेजे जाते हैं. लेकिन निर्यात प्रभावित होने के कारण विदेश भेजे जाने वाले केले अब घरेलू बाजारों में पहुंच रहे हैं. इससे बाजार में केले की आवक बढ़ गई है और कीमतों में भारी गिरावट आई है.
APEDA के लिए क्रिसिल की ओर से तैयार फरवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कुल केला निर्यात का करीब 75 से 80 फीसदी हिस्सा मध्य-पूर्व के बाजारों में जाता है. भारत अपने कुल केला उत्पादन का लगभग 3 से 5 फीसदी निर्यात करता है. रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 में घरेलू बाजार में केले का भाव करीब 18 से 20 रुपये प्रति किलो था. लेकिन मार्च के दूसरे सप्ताह तक यह घटकर 8 से 9 रुपये प्रति किलो रह गया. इसके बाद कई उत्पादक इलाकों में किसानों को केवल 2 से 5 रुपये प्रति किलो तक भाव मिलने लगा.
निर्यात में रुकावट के साथ परिवहन की समस्याओं ने भी संकट बढ़ा दिया है. केले जल्दी खराब होने वाली फसल है. इन्हें सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज और बेहतर परिवहन व्यवस्था की जरूरत होती है. राज्य कृषि विपणन बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सोलापुर के करमाला इलाके के निर्यातकों को कंटेनर का किराया बढ़ने और माल पहुंचने में देरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, पहले जहां केले की खेप पहुंचने में करीब 10 दिन लगते थे, वहीं अब कुछ मामलों में 40 दिन तक का समय लग रहा है.
इतनी लंबी देरी के कारण केले खराब होने का खतरा बढ़ जाता है. इससे निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है और इसका सीधा असर किसानों को मिलने वाले भाव पर भी पड़ रहा है. केला व्यापारी गोरख हैडाले के मुताबिक, प्रभावित बाजारों में नई फसल के लिए किसानों को करीब 6 से 7 रुपये प्रति किलो मिल रहे हैं, जबकि पुरानी फसल यानी रटून के लिए केवल 3 से 4 रुपये प्रति किलो का भाव मिल रहा है.
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