बीड में गन्ना किसानों का विरोध प्रदर्शनमहाराष्ट्र के बीड़ जिले में सूखे और गन्ने के घटते उत्पादन के बीच गन्ना उत्पादक किसानों ने आगामी पेराई सत्र से पहले उचित कीमत तय करने की मांग तेज कर दी है. किसान सभा और क्रांतिकारी शेतकरी संगठन ने चीनी मिलों से गन्ने के लिए बिना किसी कटौती के 4,250 रुपये प्रति टन की पहली किस्त और 5,000 रुपये प्रति टन अंतिम भाव देने की मांग की है.
किसान संगठनों का कहना है कि चीनी मिलों में पेराई शुरू होने से पहले ही गन्ने की कीमत स्पष्ट कर दी जानी चाहिए. इसके लिए मिलों की ओर से लिखित सर्कुलर जारी करने की मांग की गई है, ताकि किसानों को पहले से पता रहे कि उन्हें अपनी उपज का कितना पैसा मिलेगा.
इन्हीं मांगों को लेकर किसान संगठनों ने जिले की अलग-अलग चीनी मिलों के सामने विरोध प्रदर्शन किया और मिल प्रबंधन को ज्ञापन सौंपे. अंबासाखर, येडेश्वरी, रांजणी और गंगामाऊली समेत कई चीनी मिल क्षेत्रों में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाई है. जिले में कुल नौ चीनी मिलें बताई गई हैं और संगठनों का कहना है कि सभी मिलों तक अपनी मांग पहुंचाई जा रही है.
किसान संगठनों का कहना है कि इस साल बीड़ में कम बारिश ने खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है. सोयाबीन, कपास, अरहर, मूंग, मक्का और बाजरा जैसी खरीफ फसलों को सूखे से नुकसान होने का दावा किया जा रहा है. गन्ना उगाने वाले किसानों के सामने स्थिति और कठिन रही, क्योंकि उन्हें सीमित पानी के बावजूद अपनी फसल बचाने के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ा.
किसानों के मुताबिक पानी की कमी के कारण गन्ने की बढ़वार और वजन भी प्रभावित हुआ है. उनका दावा है कि कई जगह गन्ने के वजन में भारी कमी आई है. ऐसे में एक तरफ उत्पादन घटने की आशंका है तो दूसरी तरफ सिंचाई और दूसरी जरूरतों पर खर्च बढ़ गया है. किसानों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में उत्पादन लागत और गन्ने से मिलने वाली कीमत के बीच संतुलन नहीं बन पा रहा है.
किसानों की प्रमुख मांग है कि पेराई सत्र शुरू होने के बाद कीमत को लेकर असमंजस न रहे. चीनी मिलें पहले ही यह लिखित रूप में स्पष्ट करें कि किसान को गन्ने की पहली किस्त कितनी मिलेगी और अंतिम भुगतान किस दर से किया जाएगा.
किसान संगठनों ने इस बार 4,250 रुपये प्रति टन पहली किस्त और 5,000 रुपये प्रति टन अंतिम भाव की मांग रखी है. उनका कहना है कि सूखे, घटते उत्पादन और बढ़ती लागत को देखते हुए गन्ने की कीमत में बढ़ोतरी जरूरी है.
किसानों ने प्रशासन से यह भी मांग की है कि सूखे की परिस्थितियों का गलत फायदा उठाकर किसानों से कम कीमत पर गन्ना खरीदने या मुनाफाखोरी करने वालों पर नजर रखी जाए. संगठनों ने गुड़ उत्पादकों और चीनी मिल प्रबंधन की गतिविधियों की निगरानी करने की मांग भी उठाई है.
गन्ने के भाव के साथ सूखे से हुए नुकसान के लिए अलग आर्थिक सहायता की मांग भी सामने आई है. अखिल भारतीय किसान सभा के राज्य उपाध्यक्ष अजय बुरांडे ने सरकार से सूखा प्रभावित गन्ना उत्पादकों को 70 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की आर्थिक सहायता देने की मांग की है.
बुरांडे का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में गन्ना किसान अपनी फसल की सही कीमत और भुगतान को लेकर ज्यादा जागरुक हुए हैं. किसानों ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन भी किए हैं. अब किसान चाहते हैं कि पेराई सत्र शुरू होने से पहले ही गन्ने की कीमत तय कर दी जाए, जिससे बाद में भुगतान को लेकर विवाद और आंदोलन की स्थिति न बने.
उनका कहना है कि सरकार और चीनी मिल ऑपरेटरों को किसानों की मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए जल्द फैसला लेना चाहिए.
गन्ने के भाव की मांग को मजबूत करने के लिए किसान संगठन गांव स्तर पर भी किसानों को लामबंद कर रहे हैं. अलग-अलग गांवों में आयोजित बैठकों में गन्ना उत्पादकों के सामने कीमत और सूखे से हुए नुकसान का मुद्दा उठाया गया है.
संगठनों के मुताबिक बैठकों में शामिल किसानों ने 4,250 रुपये की पहली किस्त और 5,000 रुपये प्रति टन अंतिम भाव की मांग का समर्थन किया है. इसके बाद जिले की चीनी मिलों को ज्ञापन सौंपकर पेराई सत्र शुरू होने से पहले फैसला लेने की मांग की गई है.
किसान संगठनों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर सरकार और चीनी मिल प्रबंधन ने समय रहते उनकी मांगों पर सकारात्मक फैसला नहीं लिया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा. ऐसे में आगामी पेराई सत्र से पहले बीड़ में गन्ने का भाव बड़ा किसान मुद्दा बन सकता है.
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