बरबरी नस्ल की बकरियां. फोटो क्रेडिट-किसान तककिसी भी बकरी पालक के लिए बकरीद सबसे बड़ा बाजार होता है. एक महीने का ये वो बाजार है जब बकरी पालक एक साल में तैयार किए गए बकरों को कुछ ही दिनों में बेच देता है. इस बाजार में उसे बकरों के दाम भी अच्छे मिल जाते हैं. जबकि आम दिनों में उसी बकरे के उतने दाम नहीं मिल पाते हैं. बस जरूरत इस बात की है कि बकरीद पर तगड़े बकरों की अच्छी डिमांड होती है. लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि पशु पालन सिर्फ गांव-देहात में ही किया जा सकता है.
क्योंकि शहर में पशुओं को चराने के लिए जगह ही नहीं है. शहर में हरा चारा भी आसानी से नहीं मिल पाता है. और जब बकरों को हरा चारा ही खाने को नहीं मिलेगा तो वो मोटे-ताजे कैसे होंगे. लेकिन केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (CIRG), मथुरा के गोट एक्सपर्ट की एक सलाह सभी परेशानियों को दूर कर देती है. बकरों को गांव-देहात की जगह शहर में पालना आसान बना देती है.
गोट एक्सपर्ट डॉ. एके दीक्षित का कहना है कि शहर में बकरा-बकरी पालन करना अब कोई मुश्किल काम नहीं है. ये कोई जरूरी नहीं है कि बकरों को फार्म और घर में रखकर सूखे, हरे और दानेदार चारे का अलग-अलग इंतजाम किया जाए. सीआईआरजी ने चारे की फील्ड में कई ऐसी रिसर्च की है कि जिसके बाद आपको बकरे के लिए तीन तरह के अलग-अलग चारे का इंतजाम करने की जरूरत नहीं है. संस्थान के साइंटिस्ट ने हरे, सूखे और दाने वाले चारे को मिलाकर पैलेट्स फीड तैयार किया है. जरूरत के हिसाब से बकरे और बकरियों के सामने पैलेट्स रख दिजिए, जब पानी का वक्त हो जाए तो पानी पिला दिजिए. इसके अलावा कुछ और न खिलाने की जरूरत है और न ही पिलाने की.
सीआईआरजी के सीनियर साइंटिस्ट और बरबरी नस्ल के एक्सपर्ट एमके सिंह का कहना है कि बरबरी नस्ल को शहरी बकरी भी कहा जाता है. अगर आपके आसपास चराने के लिए जगह नहीं है तो इसे खूंटे पर बांधकर या छत पर भी पाला जा सकता है. अच्छा चारा खिलाने से इसका वजन नौ महीने का होने पर 25 से 30 किलो, एक साल का होने पर 40 किलो तक हो जाता है. अगर सिर्फ मैदान या जंगल में चराई पर ही रखा जाए तब भी एक साल का बकरा 25 से 30 किलो का हो जाता है.
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