
केरल में आज दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की आधिकारिक तौर पर एंट्री हो चुकी है. भारत मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, इस बार मॉनसून समय से तीन दिन लेट पहुंचा है. इस सब के बीच, दुनियाभर की मौसम एजेंसियों की निगाहें अल नीनो पर टिकी हुई हैं. इसका सबसे ज्यादा असर भारत और एशियाई देशों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. IMD सहित कई मौसम एजेंसियों ने जून के इसके सक्रिय होने की संभावना जताई है. लेकिन इस साल की शुरुआत से ही एक टर्म "सुपर अल नीनो" पर चर्चा छिड़ी हुई है.
सोशल मीडिया से लेकर मौसम चर्चा तक इस शब्द ने आम लोगों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है, लेकिन क्या सुपर अल नीनो का मतलब हमेशा कमजोर मॉनसून और सूखा ही होता है? आज जानिए पुराने रिकॉर्ड और मौसम वैज्ञानिकों की व्याख्या क्या कहती है? इसमें कितनी सच्चाई है…
दरअसल, "सुपर अल नीनो" कोई औपचारिक वैज्ञानिक शब्द नहीं माना जाता है. विश्व मौसम विज्ञान विभाग (WMO) भी इस टर्म को इस्तेमाल नहीं करता है. मौसम विज्ञान में इसे आम तौर पर बहुत मजबूत या वेरी स्ट्रांग अल नीनो की स्थिति के तौर पर देखा जाता है. यानी प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्री तापमान सामान्य से काफी ऊपर चला जाए और उसका असर वैश्विक मौसम पैटर्न पर दिखने लगे.
अल नीनो के कारण भारत के लिए चिंता इसलिए ज्यादा रहती है, क्योंकि अल नीनो और दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के बीच लंबे समय से संबंध देखा गया है. कई अल नीनो वर्षों में देश में सामान्य से कम बारिश दर्ज हुई है और यही वजह है कि जब भी अल नीनो मजबूत होने के संकेत आते हैं तो खेती, खाद्य महंगाई और जल भंडारण पर चर्चा तेज हो जाती है. इस बार भी मौसम एजेंसियां कमजोर मॉनसून की आशंका जता रही हैं.
लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है. मौसम का इतिहास बताता है कि अल नीनो का मतलब भारत में हर बार खराब मॉनसून नहीं रहा है. वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, 1950 के बाद सभी 16 अल नीनो वर्षों में से 9 बार भारत में बारिश नहीं बिगड़ी. वहीं, कई बार सामान्य बारिश भी दर्ज हुई और कुछ मामलों में बेहतर प्रदर्शन भी देखने को मिला. पूर्व में संसद में सरकार द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, 1950 के बाद सभी अल नीनो वर्षों में से केवल कुछ वर्षों में ही मॉनसून स्पष्ट रूप से सामान्य से नीचे गया.
वहीं, सबसे ज्यादा चर्चा 1997 के अल नीनो की होती है, जिसे दुनिया के सबसे मजबूत अल नीनो घटनाक्रमों में गिना जाता है. इसके बावजूद भारत में व्यापक सूखे जैसी स्थिति नहीं बनी. मौसम और जलवायु अध्ययनों में इसकी एक वजह उस समय सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल यानी IOD को माना गया, जिसने मानसून को सहारा दिया.
यही वजह है कि कई मौसम विशेषज्ञ लगातार कह रहे हैं कि "सुपर अल नीनो" शब्द देखकर घबराने की जरूरत नहीं है. मॉनसून सिर्फ प्रशांत महासागर से तय नहीं होता. हिंद महासागर की स्थिति, इंडियन ओशन डाइपोल, स्थानीय समुद्री तापमान, हवाओं का पैटर्न और मॉनसून की प्रोग्रेस भी बड़ा रोल निभाती है.
इसका मतलब जोखिम खत्म होना भी नहीं है. मौजूदा आकलनों में अल नीनो बनने की संभावना मजबूत बताई जा रही है और इसी कारण बारिश के वितरण, मॉनसून की रफ्तार और खेती पर नजर बनी हुई है. साथ ही इस बार इंडियन ओशन डाइपोल के सितंबर में सक्रिय होने की बात कही जा रही है, जो आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के लौटने का समय होता है.