
इस साल जून के महीने में मौसम के मिजाज ने हर किसी को हैरत में डाल दिया है. भारत में पिछले एक 10 साल का सबसे सूखा जून दर्ज किया गया है. अगर हम सन 1901 से मौसम के रिकॉर्ड्स पर नजर डालें, तो यह इतिहास का पांचवां सबसे कम बारिश वाला जून का महीना साबित हुआ है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में इस महीने के आखिर तक मॉनसून की बारिश अपने दीर्घकालिक औसत (LPA) से करीब 39.8 प्रतिशत यानी लगभग 40% कम रही. देश के लोग और किसान शिद्दत से आसमान की तरफ निगाहें टिकाए बैठे हैं, लेकिन बादलों की इस बेरुखी ने हर तरफ फिक्र की लकीरें खींच दी हैं. जून 2026 बीते 146 वर्षों में सबसे सूखे महीनों की लिस्ट में शामिल हो गया है, जिसने देश के एक बहुत बड़े हिस्से को प्यासा छोड़ दिया है.
साल 2000 के बाद से भारतीय मॉनसून के इतिहास पर नजर डालें, तो कुछ वर्षों में जून के महीने में बारिश की बेहद गंभीर किल्लत देखी गई है. इस दौरान साल 2009 का जून महीना सबसे ज्यादा संकटपूर्ण रहा, जब पूरे देश में (महज 87.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी, जिसे सन 1901 के बाद से अब तक का सबसे सूखा जून माना जाता है. इसके बाद साल 2014 में भी मॉनसून ने देश को तगड़ा झटका दिया और जून के दौरान सिर्फ 92.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जो पिछले 100 वर्षों के रिकॉर्ड में तीसरा सबसे सूखा जून का महीना साबित हुआ.
इसी सिलसिले में अब साल 2026 का नाम भी जुड़ गया है, जिसमें जून के अंत तक केवल 99.5 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई है. सामान्य के मुकाबले लगभग 40 प्रतिशत की भारी कमी के साथ साल 2026 का यह दौर, सन 1901 में मौसम के रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से इतिहास का पांचवां सबसे सूखा जून का महीना बन गया है.
इस बार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत ही थोड़ी सुस्त रही. केरल में मॉनसून अपनी तय तारीख से तीन दिन की देरी से, यानी 4 जून को पहुंचा. शुरुआती दिनों में तो इसकी रफ़्तार ठीक रही और इसने दक्षिण, पूर्व और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों को कवर कर लिया, लेकिन 15 जून के बाद मॉनसून अचानक थम सा गया. करीब दो हफ्ते तक देश के बड़े हिस्से में एक बूंद पानी नहीं बरसा और मॉनसून पश्चिमी कृषि क्षेत्रों में ठहर गया.
इस लंबी खामोशी का सीधा असर हमारी खेती-किसानी पर पड़ा है. बारिश की भारी किल्लत की वजह से धान, मक्का, कपास और सोयाबीन जैसी मुख्य खरीफ फसलों की बुवाई का काम बेहद धीमा हो गया है. इसके साथ ही, उत्तर भारत के कई राज्यों में भीषण गर्मी और हीटवेव का दौर लंबा खिंच गया, जहां अधिकतम तापमान 42 डिग्री सेल्सियस के भी पार चला गया, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया.
मौसम विभाग के डेटा शीट के मुताबिक, जून के पूरे महीने में देश के भीतर महज 99.5 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जबकि सामान्य तौर पर यह आंकड़ा 165.3 मिलीमीटर होना चाहिए था. अगर क्षेत्रीय स्तर पर देखें, तो मध्य भारत सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां बारिश में लगभग 60 प्रतिशत तक की भारी गिरावट देखी गई. उत्तर-पश्चिम भारत में भी हालत खस्ता रही; दिल्ली में सामान्य से 49% और पंजाब में 47% कम बारिश हुई. पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे असम, मणिपुर और मिजोरम में भी सामान्य से काफी कम पानी बरसा.
हालांकि, इस सूखे के बीच पश्चिम बंगाल, और सिक्किम जैसे कुछ गिने-चुने राज्यों में जून के आखिरी दिनों में सामान्य या उससे बेहतर बारिश दर्ज की गई, लेकिन देश के 68% से अधिक हिस्से यानी करीब 23 राज्यों में मॉनसून की भारी कमी बनी रही, जिसने देशव्यापी संकट का रूप ले लिया है.
जून की मायूसी के बाद अब सबकी उम्मीदें जुलाई के महीने पर टिकी हैं, लेकिन मौसम विभाग का नया पूर्वानुमान बहुत ज्यादा राहत देने वाला नहीं है. IMD के मुताबिक, जुलाई 2026 के दौरान भी पूरे देश में औसत मासिक वर्षा सामान्य से नीचे रहने की सबसे ज्यादा आशंका है, जो कि दीर्घकालिक औसत के 94 प्रतिशत से भी कम हो सकती है. जुलाई के महीने का सामान्य औसत 280.4 मिलीमीटर होता है. हालांकि, एक छोटी सी तसल्ली यह है कि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और पूर्वी-मध्य भारत के कुछ इलाकों में सामान्य या उससे थोड़ी ज्यादा बारिश हो सकती है. लेकिन देश के ज्यादातर हिस्सों में न सिर्फ बारिश कम होगी, बल्कि दिन और रात का तापमान भी सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है, जिससे उमस और गर्मी का दौर जारी रह सकता है.
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस कम बारिश के पीछे समुद्र में होने वाली हलचल और अल-नीनो का बड़ा हाथ है. इस समय भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक कमजोर अल-नीनो की स्थिति बनी हुई है, जिसके आने वाले हफ्तों में और मजबूत होने के आसार हैं. ऐसे हालात में पूरे साल की कुल बारिश भी सामान्य से लगभग 90 प्रतिशत कम रहने का अंदेशा जताया जा रहा है. बारिश की इस भारी कमी से खेती, पीने के पानी की उपलब्धता और पनबिजली उत्पादन के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. अब यह बेहद लाज़मी हो गया है कि सरकार और किसान मिलकर पानी के बेहतर प्रबंधन, जल संरक्षण और कम पानी में उगने वाली फसलों जैसी वैकल्पिक योजनाओं पर अमल करें, ताकि इस सूखे के असर को कम किया जा सके और आने वाले महीनों में किसी बड़े संकट से बचा जा सके.