
आंध्र प्रदेश सरकार ने खरीफ सीजन 2026 में अल नीनो के संभावित असर से किसानों और फसलों को बचाने के लिए चार स्तरीय रणनीति अपनाई है. इसमें पानी का बेहतर प्रबंधन, मौसम के अनुकूल खेती, कृषि से जुड़े दूसरे क्षेत्रों की सुरक्षा और फसल बीमा को मजबूत करना शामिल है. सरकार का कहना है कि राज्य की बड़ी आबादी की आजीविका खेती और इससे जुड़े कामों पर निर्भर है, इसलिए अल नीनो के प्रभाव को कम करना उसकी प्राथमिकता है.
आंध्र प्रदेश कृषि विभाग के मुताबिक, राज्य में 1 जून से 25 अगस्त 2026 के बीच सामान्य से 51 फीसदी कम बारिश हुई है. इसके मुकाबले पूरे देश में बारिश की कमी करीब 13 फीसदी रही. राज्य के सभी 28 जिले बारिश की कमी से प्रभावित हैं. इनमें 25 जिले सामान्य से कम बारिश की श्रेणी में हैं, जबकि तीन जिलों में बारिश की कमी काफी ज्यादा दर्ज की गई है. अल नीनो की वजह से मानसून कमजोर, देर से या अनियमित हो सकता है. इसका सबसे ज्यादा असर उन खरीफ फसलों पर पड़ता है, जो बारिश पर निर्भर रहती हैं. इसी खतरे को देखते हुए आंध्र प्रदेश सरकार ने फरवरी से ही स्थिति की निगरानी शुरू कर दी थी. इसके लिए भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और केंद्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान के साथ मिलकर तैयारी की गई.
सरकार ने राज्य के सभी 8,489 रायतु सेवा केंद्रों यानी Rythu Seva Kendrams को उनके जोखिम के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है. इनमें 1,357 केंद्रों को हाई रिस्क और 2,077 केंद्रों को मध्यम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है. इसका मकसद यह पता लगाना है कि किन इलाकों में फसलों को पानी की ज्यादा जरूरत है और कहां सूखे जैसे हालात बन सकते हैं. सरकार ने 7 अगस्त को पूरे राज्य में 'रायतन्ना मीकोसम- एल नीनो इफेक्ट मिटिगेशन एक्शन प्लान- खरीफ 2026' अभियान शुरू किया. इसके जरिए 8,489 रायतु सेवा केंद्रों और 18,513 गांवों तक पहुंचने की योजना है, ताकि किसी किसान और खेत को इस अभियान से बाहर न रखा जाए.
राज्य में करीब 2.7 करोड़ खेतों का सर्वे करने का लक्ष्य रखा गया था. अब तक करीब 2.6 करोड़ खेतों का सर्वे पूरा हो चुका है, जो कुल लक्ष्य का 96.9 फीसदी है.
सरकार की चार स्तरीय रणनीति में पानी का प्रबंधन सबसे अहम हिस्सा है. जिन इलाकों में बांधों और जलाशयों से पर्याप्त पानी उपलब्ध है, वहां सिंचाई के लिए समय से पानी छोड़ा जा रहा है. कृषि और सिंचाई विभाग मिलकर यह तय कर रहे हैं कि उपलब्ध पानी का इस्तेमाल किस तरह किया जाए, ताकि फसलों को नुकसान न हो. वहीं, जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है, वहां किसानों को कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. इसका असर खरीफ की बुआई के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है. राज्य में इस साल अब तक करीब 20.3 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुआई हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह क्षेत्र 25.6 लाख हेक्टेयर था. धान की खेती का क्षेत्र पिछले साल के 11.7 लाख हेक्टेयर से घटकर इस साल 10.3 लाख हेक्टेयर रह गया है. दूसरी ओर, दलहन की खेती 2.1 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2.6 लाख हेक्टेयर हो गई है. सरकार के मुताबिक, यह बदलाव पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है.
कम बारिश वाले इलाकों में किसानों की मदद के लिए प्री-मॉनसून ड्राई सोइंग और सीड पेलेटिंग पर भी जोर दिया जा रहा है. इसके तहत 23 लाख किसानों को करीब 25 लाख एकड़ क्षेत्र में कवर करने का लक्ष्य रखा गया है. अब तक 16.3 लाख किसानों के करीब 18.2 लाख एकड़ क्षेत्र को इस योजना के तहत कवर किया जा चुका है. सरकार जरूरत के हिसाब से जीवन रक्षक सिंचाई, फसलों पर सुरक्षात्मक स्प्रे, मल्चिंग, पोषक तत्व और पौध संरक्षण से जुड़ी मदद भी दे रही है. जहां फसल पूरी तरह खराब होने की स्थिति बन रही है, वहां दोबारा बुआई और कम अवधि में तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाने की सलाह दी जा रही है.
सरकार फसलों की स्थिति पर लगातार नजर रख रही है. अब तक 14.3 लाख एकड़ क्षेत्र का क्रॉप हेल्थ डेटा अपडेट किया गया है. इनमें करीब 1.1 लाख एकड़ क्षेत्र में फसल पर मौसम और पानी की कमी का असर पाया गया है. करीब 87,686 एकड़ क्षेत्र में नमी की कमी यानी मॉइस्चर स्ट्रेस देखा गया है. वहीं 15,250 एकड़ में फसल मुरझाने और 3,731 एकड़ में फसल सूखने की स्थिति सामने आई है. कुरनूल और नंद्याल में प्रभावित क्षेत्र सबसे ज्यादा बताया गया है.
आंध्र प्रदेश सरकार फसल की निगरानी के लिए तकनीक का भी इस्तेमाल कर रही है. Andhra Pradesh Agriculture Information Management System 2.0 और सैटेलाइट के जरिए फसलों की स्थिति का आकलन किया जा रहा है. किसानों को मौसम और फसल प्रबंधन से जुड़ी जानकारी मोबाइल पर भेजी जा रही है. इस खरीफ सीजन में अब तक किसानों को करीब 189 लाख SMS एडवाइजरी भेजी जा चुकी हैं. इन संदेशों के जरिए किसानों को समय पर सिंचाई, फसल सुरक्षा और मौसम के अनुसार खेती करने की सलाह दी जा रही है.
सरकार की रणनीति सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है. अल नीनो और सूखे के असर को देखते हुए बागवानी, पशुपालन, मछली पालन और रेशम उत्पादन जैसे क्षेत्रों के लिए भी अलग-अलग योजनाएं तैयार की गई हैं. बागवानी क्षेत्र में माइक्रो इरिगेशन और फार्म पॉन्ड जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है. पशुपालन में सूखे से निपटने की तैयारी और पशुओं के लिए जरूरी प्रबंधन पर ध्यान दिया जा रहा है. मछली पालन में बीमारी की निगरानी और मौसम के अनुसार प्रबंधन किया जा रहा है. वहीं, खेती में जलवायु के अनुकूल तकनीक और सूखा सहने वाली किस्मों को बढ़ावा दिया जा रहा है.
अल नीनो के बीच किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए फसल बीमा पर भी खास जोर दिया गया है. खरीफ 2025 में जहां 7.83 लाख हेक्टेयर क्षेत्र फसल बीमा के दायरे में था, वहीं खरीफ 2026 में यह बढ़कर 16.3 लाख हेक्टेयर हो गया है. यानी बीमा कवरेज दोगुने से भी ज्यादा बढ़ा है. बीमित क्षेत्र के मामले में आंध्र प्रदेश देश में पांचवें स्थान पर पहुंच गया है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत नामांकन की आखिरी तारीख बढ़ाकर 31 अगस्त कर दी गई है. ऐसे में किसानों के पास अपनी फसल को संभावित नुकसान से आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बीमा कराने का मौका है.
आंध्र प्रदेश में इस साल कम बारिश और अल नीनो के खतरे ने खरीफ सीजन के सामने चुनौती खड़ी की है. ऐसे में सरकार पानी की उपलब्धता के आधार पर फसल का चुनाव, कम पानी वाली खेती, समय पर सिंचाई, फसल स्वास्थ्य की निगरानी, वैकल्पिक फसलों और बीमा जैसे उपायों पर जोर दे रही है. सरकार का लक्ष्य सिर्फ मौजूदा नुकसान को संभालना नहीं, बल्कि मौसम में आने वाले बदलाव के लिए किसानों को पहले से तैयार करना है. चार स्तरीय रणनीति के जरिए कोशिश की जा रही है कि जहां पानी उपलब्ध है वहां फसलों को पर्याप्त सिंचाई मिले और जहां पानी की कमी है वहां किसान ऐसी फसलें चुनें जिनमें कम पानी की जरूरत हो. इससे अल नीनो के कारण खरीफ 2026 में होने वाले संभावित फसल नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है.
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