
मध्यप्रदेश में खेती का जोखिम लगातार बढ़ रहा है.कभी बारिश और अतिवृष्टि, कभी सूखा, ओलावृष्टि तो कभी बेमौसम बारिश किसानों की फसल को नुकसान पहुंचा देती है. ऐसे समय में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण सहारा है. लेकिन योजना से जुड़े आंकड़े और किसानों की शिकायतें यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि फसल खराब होने के बाद बीमा का पैसा किसान तक कितनी आसानी और कितनी जल्दी पहुंचता है?
मध्यप्रदेश में पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में किसान फसल बीमा योजना से जुड़े हैं. केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2016-17 से 2024-25 तक मध्यप्रदेश में 10.19 करोड़ किसान आवेदन फसल बीमा योजना के तहत दर्ज हुए. इस अवधि में किसानों के हिस्से के प्रीमियम के रूप में करीब ₹6,819.97 करोड़ जमा हुए, जबकि ₹31,737.14 करोड़ के क्लेम का भुगतान किया गया. इस दौरान करीब 3.05 करोड़ लाभार्थी आवेदन दर्ज हुए.
यहां ध्यान रखना जरूरी है कि 10.19 करोड़ का आंकड़ा अलग-अलग किसानों की संख्या नहीं, बल्कि वर्षों में दर्ज किसान आवेदन हैं. यानी एक किसान कई वर्षों में कई बार योजना में शामिल हो सकता है.
खरीफ 2025 में भी मध्यप्रदेश में फसल बीमा का बड़ा कवरेज रहा. 31 अक्टूबर 2025 तक उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में करीब 101.2 लाख किसान आवेदन बीमित हुए थे.इनमें से उस तारीख तक ₹10.5 करोड़ के क्लेम स्वीकृत और ₹9 करोड़ के क्लेम भुगतान किए जा चुके थे.
हालांकि यह आंकड़ा 31 अक्टूबर 2025 तक का है, इसलिए इसे खरीफ 2025 के पूरे सीजन का अंतिम क्लेम भुगतान नहीं माना जाना चाहिए.
फसल बीमा की पूरी व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है फसल नुकसान का आकलन. किसान के खेत में नुकसान होने के बावजूद क्लेम की राशि केवल उसके खेत को देखकर तय नहीं होती.बीमा प्रक्रिया में संबंधित बीमा इकाई की उपज, निर्धारित उपज मानक और नुकसान के आकलन जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं.
यही वजह है कि किसानों के बीच अक्सर यह सवाल उठता है कि अगर किसी किसान के खेत में सोयाबीन, गेहूं या अन्य फसल को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन संबंधित क्षेत्र की औसत उपज अपेक्षाकृत बेहतर रही, तो किसान को वास्तविक नुकसान के अनुपात में राहत कैसे मिलेगी?
हाल में सामने आई रिपोर्ट में भी किसानों ने सर्वे और औसत उपज के आधार पर क्लेम तय किए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के शाजापुर सहित अन्य राज्यों के किसानों के अनुभव भी सामने रखे गए हैं.
मध्यप्रदेश में सोयाबीन और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों का बड़ा रकबा है. इसलिए फसल बीमा की व्यवस्था में इन फसलों के नुकसान का सही आकलन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है.
हालिया विधानसभा में पेश आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक 2021 से 2025 के बीच मध्यप्रदेश में सोयाबीन बीमा के तहत करीब 2.71 करोड़ किसान आवेदन दर्ज हुए और करीब ₹11,232 करोड़ प्रीमियम जमा हुआ. इसी अवधि में करीब ₹3,373 करोड़ के क्लेम का भुगतान हुआ. गेहूं के मामले में इसी अवधि में करीब 3.58 करोड़ कुल आवेदन, करीब ₹4,524 करोड़ प्रीमियम और लगभग ₹760-770 करोड़ क्लेम भुगतान की जानकारी सामने आई है.
इन आंकड़ों को सीधे तौर पर "प्रीमियम का पैसा वापस नहीं मिला" के रूप में देखना सही नहीं होगा, क्योंकि बीमा में क्लेम केवल उन मामलों में मिलता है जहां योजना के नियमों के तहत नुकसान निर्धारित होता है. लेकिन ये आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि किसानों के लिए क्लेम की पात्रता और नुकसान आकलन की प्रक्रिया को समझना कितना जरूरी है.
PMFBY में किसान की प्रीमियम हिस्सेदारी सीमित रखी गई है. खरीफ खाद्यान्न और तिलहन फसलों के लिए किसान अधिकतम 2 प्रतिशत, रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत और वाणिज्यिक व बागवानी फसलों के लिए अधिकतम 5 प्रतिशत प्रीमियम देता है. बाकी प्रीमियम का हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से दिया जाता है.
यानी किसान के लिए कम प्रीमियम में फसल का बीमा होना राहत की बात है, लेकिन नुकसान के समय दावा सही तरीके से दर्ज कराना और समय सीमा का पालन करना उतना ही महत्वपूर्ण है.
खरीफ 2026 से फसल बीमा योजना में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी लागू होने जा रहा है.जंगली जानवरों के हमले से फसल नुकसान को स्थानीयकृत जोखिम के तहत अतिरिक्त कवर में शामिल किया गया है. धान में जलभराव को भी स्थानीय आपदा के रूप में कवर किया गया है. ऐसे मामलों में किसान को फसल नुकसान की सूचना 72 घंटे के भीतर Crop Insurance App के जरिए देनी होगी और जियो-टैग्ड फोटो जैसी जानकारी देनी होगी.मध्यप्रदेश भी इस नए प्रावधान से लाभान्वित होने वाले राज्यों में शामिल है.
यह बदलाव मध्यप्रदेश के उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जिनकी फसल वन क्षेत्रों या वन्यजीव प्रभावित इलाकों के आसपास है.
मध्यप्रदेश में फसल बीमा का कवरेज बड़ा है और सरकार के आंकड़ों में हजारों करोड़ रुपये के क्लेम भुगतान भी दर्ज हैं. लेकिन किसान के लिए असली सवाल आंकड़ों से आगे का है—फसल खराब होने के बाद उसे उसका हक कितनी जल्दी और कितनी पारदर्शिता से मिलता है?
किसान चाहता है कि उसके खेत में हुए नुकसान का सही आकलन हो, सर्वे की जानकारी उसे मिले, क्लेम की स्थिति स्पष्ट हो और भुगतान में अनावश्यक देरी न हो.इसलिए मध्यप्रदेश में फसल बीमा योजना की अगली बड़ी चुनौती केवल ज्यादा किसानों को बीमा से जोड़ना नहीं, बल्कि किसान के भरोसे को मजबूत करना है. प्रीमियम देने वाला किसान यह महसूस करे कि आपदा के समय बीमा वास्तव में उसके परिवार और खेती के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच बनकर खड़ा है.