
दस साल पहले 2 करोड़ रुपये की लागत से लगाई गई राज्य की एकमात्र कॉटन प्री-क्लीनिंग और ड्राइंग यूनिट अभी भी इस्तेमाल नहीं हो रही है. इसे 2014 में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी (SAD-BJP) सरकार के दौरान मलोट के कॉटन मार्केट में लगाया गया था, लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ एक बार हुआ है. यह मशीन मालवा इलाके के प्रमुख कॉटन बेल्ट में ज़्यादा क्षेत्र में खेती लाने, किसानों का लाभ ज़्यादा से ज़्यादा करने और महंगे लेबर की दिक्कत का समाधान करके लागत कम करने के मकसद से लगाई गई थी.
अब ये यूनिट बिना इस्तेमाल के जंग खा रही है. इसके कई पार्ट्स या तो गायब हो गए हैं या चोरी हो गए हैं, फिर भी यह अभी भी मार्केट में खड़ा है. अंग्रेजी अखबार 'द ट्रिब्यून' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, धान की खरीद के मौजूदा सीजन में जगह की कमी के कारण इसके चारों ओर धान की बोरियां भी जमा कर दी गई हैं. पंजाब स्टेट एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड ने यह मशीन नागपुर, महाराष्ट्र से खरीदी थी और इसे नो-प्रॉफिट, नो-लॉस बेसिस पर चलाने के लिए मलौट मार्केट कमेटी को सौंप दिया था. इसे हर घंटे छह टन कपास साफ करने, पत्तियां हटाने और नमी कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था.
अधिकारियों और किसानों को याद है कि इस यूनिट का एकमात्र टेस्ट रन निराशा में खत्म हुआ. एक कमीशन एजेंट ने कहा कि साधारण कॉटन वैरायटी की प्रोसेसिंग के बाद लगभग कुछ नहीं निकला. इसके बादकिसानों का भरोसा उठ गया, और आखिरकार, मशीन को फिर कभी नहीं चलाया गया. अब, इसे ठीक करने में लगभग 1 करोड़ रुपये लगेंगे. इसको लेकर कांग्रेस नेता नाथू राम गांधी ने कहा कि यह जनता के पैसे की बर्बादी का एक क्लासिक मामला है. अधिकारियों को जांच करनी चाहिए कि 2 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद मशीन ने काम क्यों नहीं किया. अधिकारियों को जवाबदेही से क्यों बचाया गया?
वहीं इस मुद्दे पर बात करते हुए, मार्केट कमेटी के सूत्रों ने कहा कि उनके पास न तो इसे चालू करने के लिए फंड थे और न ही इसे चलाने के लिए स्किल्ड स्टाफ. मलोट मार्केट कमेटी के सेक्रेटरी मंदीप रहेजा ने कहा कि मैंने जुलाई में यहां जॉइन किया था, लेकिन मशीन बिना इस्तेमाल के पड़ी है और अभी इसे चालू करने का कोई प्रपोज़ल नहीं है.
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