
उत्तराखंड के टिहरी जिले के थाती कठूड़ पट्टी के निवालगांव में रविवार को 18 साल बाद ऐतिहासिक भेड़ मेले का आयोजन हुआ. बौल्या चांदनी नागराजा के पावन प्रांगण में हुए इस मेले में हजारों श्रद्धालु और पशुपालक पहुंचे. लोगों ने पारंपरिक भेड़ परिक्रमा में हिस्सा लिया और देवी-देवताओं की देव डोलियों का आशीर्वाद लिया. मेले का शुभारंभ उत्तराखंड सरकार के ग्राम्य विकास मंत्री भरत सिंह चौधरी और स्थानीय विधायक शक्ति लाल शाह ने किया. इस दौरान आसपास के गांवों से कई देव डोलियां और देवी-देवताओं के निशान मेले में पहुंचे. पशुपालकों ने धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लिया.
इस मेले में दूर-दराज के गांवों से किसान अपनी भेड़-बकरियों के साथ पहुंचे. किसानों के मुताबिक, यह मेला बहुत पुरानी परंपरा का हिस्सा है. इसे पशुधन की सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और अच्छी फसल की कामना के लिए आयोजित किया जाता है. ग्रामीण भरोषा लाल ने बताया कि यह मेला बौल्या देवता के नाम पर आयोजित होता है. इसमें क्षेत्र के अलग-अलग देवी-देवताओं की देव डोलियां शामिल होती हैं और लोग उनका आशीर्वाद लेते हैं. वहीं, दूसरे निवासी मालचंद बिष्ट ने बताया कि कुछ कारणों से पिछले 18 साल से यह मेला नहीं हो पाया था. ग्रामीणों ने इसे फिर से शुरू करने का फैसला किया, ताकि नई पीढ़ी अपनी पुरानी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रहे.
ग्रामीणों ने कहा कि उत्तराखंड में पलायन एक बड़ी समस्या है. ऐसे आयोजनों से गांवों की पुरानी परंपराएं और रीति-रिवाज जीवित रहते हैं, इसलिए लोगों से अपनी संस्कृति को बचाने और आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने की अपील की गई. क्षेत्र पंचायत सदस्य गंगा बिष्ट ने कहा कि यह मेला उनके पूर्वजों की शुरू की हुई परंपरा है. 18 साल बाद अपनी पीढ़ी में इसका आयोजन होते देखकर ग्रामीण काफी खुश हैं. उन्होंने आने वाली पीढ़ी से भी ऐसे आयोजनों को आगे बढ़ाने की अपील की.
विधायक शक्ति लाल शाह ने कहा कि यह क्षेत्र की पौराणिक धरोहर है और इसे बचाना सभी की जिम्मेदारी है. वहीं, ग्रामीणों ने मेले के दौरान क्षेत्र में हेलीपैड बनाने की मांग भी रखी. वहीं, ग्राम्य विकास मंत्री भरत चौधरी ने कहा कि भेड़ पालकों से जुड़ा यह मेला बेहद खास है. उन्होंने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि हेलीपैड की मांग को मुख्यमंत्री के सामने रखा जाएगा और इसे पूरा कराने का प्रयास किया जाएगा. बता दें कि 18 साल बाद हुए इस आयोजन से निवालगांव में उत्साह का माहौल रहा. मेले ने न सिर्फ पुरानी लोक परंपरा को फिर से जीवित किया, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और गांव की जड़ों से जोड़ने का भी काम किया. (पंकज भट्ट की रिपोर्ट)