
भारत अमेरिका के बीच ट्रेड डील कि मौजूदा सामने आ रही शर्तों को लेकर सरकार पर जहां विपक्ष हमलावर है, तो वहीं अब किसान संगठनों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. संयुक्त किसान मोर्चा ने 12 फरवरी को पूरे ग्रामीण भारत बंद करने का अपील किया है. किसान संगठनों का कहना है कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के लिए अमेरिकी दबाव के आगे मोदी सरकार का आत्मसमर्पण भारत की संप्रभुता की मृत्यु-घंटी है. ऑल इंडिया किसान सभा ने 11 फरवरी तक इस बिल के खिलाफ अभियान चलाने की अपील की है, जिसके तहत गांव-गांव में प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के पुतले जलाए जाएंगे, जबकि 12 फरवरी को आम हड़ताल बुलाई गई है.
अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) भारत–अमेरिका व्यापार समझौते का तीव्र विरोध किया है. ऑल इंडिया किसान सभा के नेता हनन मुल्ला ने कहा कि ट्रेड डील की एकतरफ़ा घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की और जिसकी पुष्टि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की. यह ट्रंप की धमकियों के आगे पूर्ण आत्मसमर्पण के अलावा कुछ नहीं है. सरकार भारत के राष्ट्रीय हितों को गिरवी रख रहे हैं और इसे “पारस्परिक रूप से लाभकारी साझेदारी” बता रहे हैं.
किसान संगठनों की चिंता है कि अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क हटाने से भारतीय बाजार अमेरिकी वस्तुओं से पट जाएंगे, जिससे भारतीय उद्योग तबाह होगा और उस पर निर्भर श्रमिकों का जीवन उजड़ जाएगा. कृषि क्षेत्र पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा, जो किसानों और कृषि मजदूरों की आजीविका को नष्ट कर देगा. गैर-शुल्क बाधाओं में वे सब्सिडी और नीतियां शामिल हैं, जो भारतीय किसानों को समर्थन देती हैं और उनकी उपज के लिए बाज़ार सुनिश्चित करती हैं. अब इन्हें अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त अमेरिकी कृषि उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करनी होगी.
किसानों के सबसे बड़े संघीय संगठन संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि महंगे अमेरिकी ऊर्जा, कोयला और अन्य उत्पादों की अनिवार्य खरीद भारतीय उपभोक्ताओं पर सीधा बोझ डालेगी, महंगाई बढ़ाएगी और जनता की दुर्दशा को और गंभीर बनाएगी, साथ ही भारत की ऊर्जा संप्रभुता को भी कमजोर करेगी.
AIKS की मांग है कि केंद्र सरकार भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, भारत-यूके FTA और भारत-यूरोपीय संघ FTA का पूरा पाठ संसद के समक्ष रखे और राज्यों के साथ व्यापक चर्चा तय करें. इस सरकार द्वारा किए गए सभी मजदूर-विरोधी, किसान-विरोधी और जन-विरोधी मुक्त व्यापार समझौतों और व्यापार समझौतों को रद्द किया जाए. एसकेएम ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में किसी भी कृषि उत्पाद या डेयरी को शामिल किया गया, तो देश 2020–21 जैसे किसान आंदोलन का फिर से साक्षी बनेगा.
संयुक्त किसान मोर्चा वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के दावे को सख्ती से खारिज किया है कि “कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से बाहर रखा गया है”, जबकि यह समझौता पहले ही 2 फ़रवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोशल मीडिया पर घोषित किया जा चुका है.
संयुक्त किसान मोर्चा ने बयान जारी करके कहा है कि जब 15 अगस्त 2025 को लाल किले की प्राचीर से किसानों के हितों की रक्षा के लिए “व्यक्तिगत रूप से भारी कीमत चुकाने” की घोषणा करने के मात्र तीन दिन बाद, 19 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में कपास पर लगने वाले 11 फीसदी आयात शुल्क को हटाने की अनुमति दे दी. देश का संपूर्ण कपास क्षेत्र सबसे अधिक किसान आत्महत्या-प्रवण क्षेत्रों में आता है. कपास पर आयात शुल्क समाप्त होने से लाखों कपास किसान परिवारों की आजीविका सुरक्षा और अधिक कमजोर हो गई. अमेरिका से कपास आयात जनवरी–नवंबर 2024 के 199.30 मिलियन डॉलर से बढ़कर जनवरी–नवंबर 2025 में 377.90 मिलियन डॉलर हो गया, यानी 95.50 फीसदी की बढ़ोतरी, इसी अवधि में गेहूं और सोयाबीन तेल का आयात भी बढ़ा.
कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) द्वारा वर्ष 2025 की खरीफ फसलों के लिए घोषित MSP के अनुसार, कपास का मूल्य (A2+FL आधार पर) 7,710 रुपये प्रति क्विंटल है, जो C2+50% के आधार पर निर्धारित 10,075 से 2,365 रुपये कम है. इसके बावजूद मोदी सरकार A2+FL मूल्य भी सुनिश्चित करने में विफल रही और किसानों को 5,500 से 6,500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच औने-पौने दामों पर फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसीलिए ट्रेडिंग के खिलाफ संयुक्त किसान संगठनों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और 12 फरवरी को पूरा ग्रामीण भारत बंद बुलाया है.