
देश में इस साल खरीफ सीजन की शुरुआत कुछ सुस्त रही है, क्योंकि जून के महीने में देश का कुल मॉनसून औसत से करीब 38% कम दर्ज किया गया. मॉनसून की इस बेरुखी और कम बारिश की वजह से खेतों में रौनक थोड़ी देर से लौट रही है, जिसका सीधा असर फसलों की बुवाई पर पड़ा है. आंकड़ों की बात करें, तो 5 जुलाई 2026 तक कुल खरीफ फसलों का रकबा पिछले साल के मुकाबले करीब 91.95 लाख हेक्टेयर पीछे चल रहा है. इस साल अब तक केवल 350.85 लाख हेक्टेयर में ही बुवाई हो सकी है, जबकि पिछले साल इसी मुकाम तक किसानों ने 442.80 लाख हेक्टेयर जमीन हरी-भरी कर दी थी. यानी कुल बुवाई में पिछले साल की तुलना में 20.76% की भारी कमी दर्ज की गई है.
भारतीय किसानों के दिल के सबसे करीब रहने वाली धान की फसल पर भी इस शुरुआती सूखे का असर साफ नजर आ रहा है. आंकड़ों के मुताबिक, इस साल 5 जुलाई तक देश में सिर्फ 60.24 लाख हेक्टेयर में ही धान की बुवाई या रोपाई हो पाई है. अगर इसकी तुलना बीते साल यानी 2025 की समान अवधि से करें, तो पिछले साल यह आंकड़ा 69.30 लाख हेक्टेयर पर था. इस तरह चालू सीजन में धान का कुल रकबा पिछले साल की तुलना में 9.06 लाख हेक्टेयर कम दर्ज किया गया है, जो कि करीब 13.07% की गिरावट दिखाता है.
खाने की थाली का प्रोटीन यानी दलहनी फसलों के मोर्चे पर भी इस बार सुस्ती का आलम है. पिछले साल के मुकाबले दलहनी फसलों का कुल रकबा करीब 10.34 लाख हेक्टेयर घट गया है, जो कि प्रतिशत के हिसाब से 21.77% की बड़ी कमी है. इस सीजन में अब तक महज 37.15 लाख हेक्टेयर में दालों की बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल इस वक्त तक 47.49 लाख हेक्टेयर का रकबा कवर हो चुका था. दालों का अलग-अलग डेटा इस प्रकार है: अरहर: इस बार बुवाई 12.35 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के 21.00 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 8.65 लाख हेक्टेयर, लगभग 41.19% कम है. उड़द: इस साल रकबा 3.01 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल के 4.63 लाख हेक्टेयर से 1.62 लाख हेक्टेयर जो 34.98% कम है. मूंग: इस बार बुवाई 16.81 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के 17.20 लाख हेक्टेयर से 0.39 लाख हेक्टेयर यानी 2.26% कम है.
इस खरीफ सीजन में अगर किसी फसल पर सबसे तगड़ी मार पड़ी है, तो वो हैं तिलहनी फसलें. तिलहन का कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले रिकॉर्ड 42.96 लाख हेक्टेयर पिछड़ चुका है, जो कि 39.31% की भारी-भरकम गिरावट को दर्शाता है. जहां बीते साल इस समय तक 109.27 लाख हेक्टेयर में तिलहनी फसलें लहलहा रही थीं, वहीं इस साल किसानों ने अब तक सिर्फ 66.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ही कवर किया है. सोयाबीन का इस बार रकबा घटकर 47.80 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल के 79.20 लाख हेक्टेयर से 31.40 लाख हेक्टेयर लगभग 39.64% कम है. मूंगफली: इस बार बुवाई 16.93 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के 28.00 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 11.07 लाख हेक्टेयर यानी 39.53% कम है.
'श्री अन्न' यानी मोटे अनाजों और नकदी फसल कपास के खेतों से भी आंकड़े बहुत ज्यादा जोश बढ़ाने वाले नहीं हैं. मोटे अनाजों (जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का) का कुल रकबा इस साल 60.12 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले साल के 71.86 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 11.75 लाख हेक्टेयर यानी 16.35% कम है. इसमें सबसे ज्यादा गिरावट बाजरा में देखी गई है, जिसका रकबा पिछले साल के 30.00 लाख हेक्टेयर से घटकर इस बार सिर्फ 20.82 लाख हेक्टेयर जो 30.60% कम रह गया है. वहीं दूसरी ओर, कपास की बुवाई में भी 18.82 लाख हेक्टेयर है. यानी 22.95% की बड़ी गिरावट आई है, जो पिछले साल के 82.00 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस बार सिमटकर 63.18 लाख हेक्टेयर ही रह गया है.
भले ही जून के सूखे ने शुरुआती रफ्तार पर ब्रेक लगाया हो, लेकिन अब उम्मीद की नई किरण दिखने लगी है. मौसम विभाग (IMD) के ताजा बुलेटिन के मुताबिक, जुलाई की शुरुआत से ही देश के बड़े हिस्से में मॉनसून ने अपनी चाल तेज कर दी है और आने वाले दिनों में देश के उत्तर, मध्य और पश्चिमी हिस्सों में झमाझम बारिश होने का पूरा अनुमान है. देश के कई इलाकों में तो भारी से बहुत भारी बारिश का दौर शुरू भी हो चुका है. ऐसे में पूरी उम्मीद है कि जुलाई के इस बेहतरीन कमबैक से पानी की कमी दूर होगी, जलाशयों का स्तर सुधरेगा और आने वाले हफ्तों में खरीफ की बुवाई की यह सुस्ती पूरी तरह काफूर हो जाएगी.
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