
देश के कई शहरों में प्याज की कीमतें 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं. त्योहारों का सीजन करीब आते ही बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है. दिलचस्प बात यह है कि सरकार और उद्योग जगत लगातार दावा कर रहे हैं कि देश में प्याज की कोई कमी नहीं है. इसके बावजूद बाजार में सप्लाई दबाव में है और दाम लगातार ऊपर बने हुए हैं.
इस विरोधाभास के पीछे सबसे बड़ी वजह उत्पादन नहीं बल्कि स्टोरेज और पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था है. आंकड़े बताते हैं कि भारत हर साल जरूरत से कहीं ज्यादा प्याज पैदा करता है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा बाजार तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाता है.
साल 2025-26 के दौरान देश में करीब 3.07 करोड़ टन (307.37 लाख मीट्रिक टन) प्याज का उत्पादन हुआ. जबकि घरेलू खपत की सालाना जरूरत लगभग 1.5 करोड़ टन मानी जाती है. यानी उत्पादन के स्तर पर देश आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि सरप्लस स्थिति में है.
कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए केंद्र सरकार नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) जैसी एजेंसियों के माध्यम से 2 से 5 लाख टन तक का बफर स्टॉक भी रखती है. इसके बावजूद बाजार में समय-समय पर कीमतों में तेज उछाल देखने को मिलता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रमुख कारण आधुनिक और वैज्ञानिक भंडारण सुविधाओं की कमी है. देश में कुल जरूरत के मुकाबले संगठित और नियंत्रित स्टोरेज क्षमता लगभग 10 प्रतिशत ही उपलब्ध है. बाकी 90 प्रतिशत से अधिक प्याज किसानों या स्थानीय व्यापारियों द्वारा पारंपरिक ढांचों में रखा जाता है.
महाराष्ट्र के कृषि पत्रकार संदीप भुजबल कहते हैं कि अगर स्टोरेज व्यवस्था दुरुस्त हो जाए तो देश में प्याज की कीमतें बढ़ने का झंझट हमेशा के लिए खत्म हो सकता है. वे बताते हैं कि अभी प्याज की कोई कमी नहीं है, लेकिन सप्लाई में गड़बड़ी के चलते बाजारों में आवक थोड़ी कम हुई है जिससे कीमतों में उछाल है. हालांकि वे यह भी कहते हैं कि देश के बाकी राज्यों और शहरों की तुलना में महाराष्ट्र में प्याज का भाव बहुत कम चल रहा है. उनके मुताबिक, नासिक आसपास के इलाकों में प्याज का भाव 30-40 रुपये किलो है.
भुजबल ने बताया कि प्याज की फसल कटने के बाद उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल कुल उत्पादन का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट के दौरान खराब हो जाता है.
यह मात्रा लगभग 80 से 90 लाख टन तक बैठती है. इतनी बड़ी मात्रा में फसल खराब होने से कृषि अर्थव्यवस्था को सालाना करीब 11 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. यही वजह है कि उत्पादन पर्याप्त होने के बावजूद बाजार में प्रभावी उपलब्धता कम हो जाती है और कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है.
इस साल स्थिति को और गंभीर बनाने में मौसम की भूमिका भी अहम रही. रबी प्याज की फसल के दौरान कई उत्पादक क्षेत्रों में बेमौसम बारिश हुई. खेतों में पानी भरने और अधिक नमी के कारण प्याज की क्वालिटी प्रभावित हुई.
विशेषज्ञों के अनुसार कई जगहों पर गीले प्याज को ही भंडारण में रख दिया गया. ऐसे प्याज के अंदर नमी फंस जाने से बाद में अंदरूनी सड़न, ब्लैक मोल्ड, फफूंद और समय से पहले अंकुरण जैसी समस्याएं बढ़ गईं.
गर्मी और नमी बढ़ने के साथ यह नुकसान और तेज हो गया, जिससे स्टॉक तेजी से घटा और बाजार में सप्लाई प्रभावित हुई.
भारत में अधिकांश प्याज अभी भी बांस, टीन शेड या प्राकृतिक वेंटिलेशन वाले ढांचों में जमा किया जाता है. इनमें तापमान और नमी को नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं होती.
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसी पारंपरिक भंडारण प्रणाली में चार महीने के भीतर कुल नुकसान 50 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकता है. इसमें सड़न, सूखने से वजन कम होना, रंग बदलना और अंकुरण जैसी समस्याएं शामिल हैं.
जब प्याज का वजन घटता है या क्वालिटी खराब होती है तो वह बाजार में बिकाऊ नहीं रह जाता. इसका सीधा असर आपूर्ति और कीमतों पर पड़ता है.
प्याज की कीमतों में बार-बार आने वाले उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय (DOGR) नई तकनीकों को बढ़ावा दे रहे हैं.
सामान्य कोल्ड स्टोरेज में 0 से 5 डिग्री सेल्सियस तापमान पर प्याज रखने से नुकसान लगभग 5 प्रतिशत तक सीमित किया जा सकता है. हालांकि स्टोरेज से बाहर निकालने के बाद इनमें तेजी से अंकुरण होने लगता है.
इसी समस्या को दूर करने के लिए DOGR ने 27±2 डिग्री सेल्सियस तापमान और नियंत्रित नमी पर आधारित विशेष भंडारण मॉडल तैयार किया है. इस तकनीक से चार महीने के भंडारण के दौरान कुल नुकसान केवल 7.14 प्रतिशत तक सीमित रहने का दावा किया गया है. साथ ही स्टोरेज के बाद अंकुरण की समस्या भी काफी कम हो जाती है.
सरकार प्याज की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक बाजार में उतार रही है और 'कांदा एक्सप्रेस' जैसी पहल के जरिए प्रमुख उपभोक्ता केंद्रों तक अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचा रही है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक देश में वैज्ञानिक भंडारण क्षमता का बड़े पैमाने पर विस्तार नहीं होगा, तब तक उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के बावजूद प्याज के दाम समय-समय पर उपभोक्ताओं को रुलाते रहेंगे.
उत्पादन की समस्या से ज्यादा यह अब भंडारण और सप्लाई चेन की समस्या बन चुकी है. यही वजह है कि खेतों में भरपूर पैदावार होने के बावजूद बाजार में प्याज महंगा दिखाई दे रहा है.
एपीएमसी, लासलगांव के चेयरमैन जयदत्त होलकर ने 'किसान तक' से खास बातचीत में बताया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और मौसम खराब होने से प्याज की ढुलाई पर असर देखा जा रहा है. प्याज भरे ट्रक रास्ते में फंस रहे हैं जिससे समय पर प्याज मंडियों और बाजारों में नहीं पहुंच रहा है. इस वजह से भी प्याज की महंगाई देखी जा रही है.
होलकर ने सरकार ने मांग उठाई कि प्याज की ढुलाई लागत को अगर कम कर दिया जाए तो व्यापारियों को मंडी तक प्याज पहुंचाने में राहत मिलेगी और इससे रेट भी कम होंगे. इसके लिए ढुलाई लागत पर सब्सिडी दिए जाने की मांग उठाई. इस तरह की पहल सरकार की ओर से पहले भी हो चुके हैं जिसे देखते हुए मौजूदा समय के लिए मांग की जा ही है. अगर ऐसा होता है तो प्याज के दाम घटने मं बड़ी मदद मिलेगी.