कुल्लू-मनाली के बागवान इस बार दोहरी मार झेल रहे हैं. एक ओर बाढ़ और भूस्खलन ने सड़कों को तहस-नहस कर दिया है तो वहीं, दूसरी ओर सेब का सीज़न शुरू होते ही बागवानों की मेहनत पर पानी फिरने लगा है. जिन बागों में महीनों की मेहनत के बाद लालिमा लिए सेब तैयार हुए थे, वे अब गोदामों और रास्तों में सड़ रहे हैं. इसके चलते दाम 40-50 रुपये किलो तक पहुंच गए हैं. हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा बागवानी है. सेब की खेती से ही लाखों परिवारों का गुजारा चलता है. कुल्लू जिला, राज्य का दूसरा सबसे बड़ा सेब उत्पादक क्षेत्र है. यहां से हर साल लगभग 1.5 लाख पेटियां यानी करीब 1.3 लाख मीट्रिक टन सेब देशभर की मंडियों तक पहुंचता है, लेकिन इस बार हालात इतने बिगड़ गए, क्योंकि बागवान अपने बागों से सेब तोड़ने के बावजूद बेच नहीं पा रहे हैं.
बाढ़ और बारिश से 397 सड़कें और 3 राष्ट्रीय राजमार्ग बंद हैं. एनएच-3 समेत कुल्लू ज़िला के कई संपर्क मार्ग क्षतिग्रस्त हैं. जिन रास्तों से ट्रक मंडियों तक जाते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा है. बागवानों ने सेब तोड़कर गोदामों में रखा है, लेकिन मंडी तक पहुंचाने का रास्ता ही बंद है. पहले सब्जी में किसानों को घाटा उठाना पड़ा था और अब सेब बागवानों की बारी आ गई है.
स्थानीय सब्ज़ी मंडियां भी बंद हैं और सब जगह सन्नाटा पसरा हुआ है. ट्रक 5 से 7 दिन तक रास्ते में ही फंसे रहते हैं. इस देरी में सेब खराब हो जाता है और किसानों को लाखों का नुकसान हो रहा है. लोकल मंडियों में खरीदार नहीं हैं और जो हैं भी, वे बेहद कम दाम दे रहे हैं. सेब का भाव सिर्फ 40 से 45 रुपये किलो तक गिर चुका है, जो 10 साल पुराने दामों से भी कम है. व्यापारी और आढ़ती भी कहते हैं कि वे सेब खरीदकर भी लें तो शहरों तक नहीं भेज सकते.
सालभर सीजन का इंतजार करने वाले बागवान और व्यापारी इस बार परेशान हो गए हैं. अब इस बार होने वाले घाटे की चिंता उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही है. कुल्लू सब्ज़ी मंडी के आढ़ती देव ठाकुर का कहना है कि इस साल आई प्राकृतिक आपदा, 2023 की आपदा से कहीं ज़्यादा गंभीर है. जगह-जगह सड़कों के टूटने से व्यापारियों की गाड़ियां रास्तों में ही फंसी हुई हैं. बागों में सेब की ड्रॉपिंग शुरू हो चुकी है और हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं.
वहीं, हरियाणा और चंडीगढ़ से आए व्यापारियों का कहना है कि पिछले साल तक वे रोज़ाना 10 से 12 गाड़ियां सेब की कुल्लू से बाहर भेजते थे, लेकिन इस बार मुश्किल से 1–2 गाड़ियों का सेब खरीदने में भी डर लग रहा है. उनकी गाड़ियां 72 घंटे तक रास्तों में फंसी रहीं, जिससे सारा सेब खराब हो गया.
आढ़ती, व्यापारी, किसान और हज़ारों की संख्या में मज़दूर सभी बेकार बैठे हैं. व्यापारियों ने साफ कह दिया है कि वे किसानों से सेब नहीं खरीद पाएंगे, क्योंकि खरीद भी लें तो बेचेंगे कहां? पिछले साल इसी समय सेब का रेट 80-85 रुपये किलो था, लेकिन इस बार भाव घटकर 50-55 रुपये किलो ही रह गया है.
बागवानों का कहना है कि हर साल 15 अगस्त से सेब का सीज़न शुरू हो जाता था, लेकिन इस बार मौसम की मार के कारण सीज़न देर से शुरू हुआ और उसका भी कोई फायदा नहीं हुआ. बागवान बताते हैं कि सेब तोड़कर गोदामों में रख दिया है, लेकिन मंडियों तक पहुंचाना संभव नहीं हो पा रहा. बागीचों में सेब की ड्रॉपिंग शुरू हो चुकी है और गोदामों में भी ज्यादा समय तक स्टोर करना मुश्किल है.
अब उम्मीद सिर्फ इतनी है कि जैसे-तैसे सड़क मार्ग जल्द बहाल हो जाएं, ताकि पूरे सालभर बागीचों पर किया गया खर्चा तो निकल सके. हालांकि मौजूदा हालात देखकर लगता है कि वह खर्चा भी पूरा नहीं होगा. बागवानों का कहना है कि मंडियों में सेब का भाव सिर्फ 40 से 50 रुपये किलो मिल रहा है, जो आज से 10 साल पहले हुआ करता था और अब इस रेट पर भी खरीदार नहीं मिल रहे.
वहीं, मनाली विधानसभा क्षेत्र से संबंध रखने वाले पूर्व मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने भी बागवानों की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि बागवानों की अर्थव्यवस्था खतरे में है. उन्होंने केंद्र और प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि मंडी से मनाली तक बंद पड़े एनएच को जल्द से जल्द दुरुस्त किया जाए.
साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बार बागवानों को बड़ा झटका दिया है. हर साल हिमफेड और एचपीएमसी के माध्यम से बी और सी ग्रेड सेब की खरीद के लिए कलेक्शन सेंटर स्थापित किए जाते थे, लेकिन इस वर्ष वे भी नहीं खोले गए हैं. इन्हें तत्काल शुरू किया जाना चाहिए, ताकि किसान और बागवान नुकसान से बच सकें.