
राज्य सरकार के अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में सर्दियों के दौरान पसंद की जाने वाली जड़ वाली सब्जी 'गराडू', सैलाना के 'बालम खीरे' और इंदौर के 'मालवी आलू' को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला है. बागवानी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर मंगल सिंह डोडवे ने PTI को बताया कि रतलाम जिले से मिली एप्लीकेशन और डेटा के आधार पर मालवा के गराडू और सैलाना के बालम खीरे को GI टैग दिया गया.
उन्होंने कहा कि रतलाम जिले में उगाए जाने वाले बालम खीरे और गराडू लंबे समय से खाने-पीने के शौकीनों के बीच लोकप्रिय रहे हैं, जिसकी वजह इस इलाके का खास मौसम, मिट्टी और बागवानी के पारंपरिक तरीके हैं.
सैलाना का बालम खीरा अपने बड़े आकार, रसीले स्वाद और खास रंग के लिए जाना जाता है, जबकि इंदौर और उज्जैन डिवीजन वाले मालवा इलाके में उगाया जाने वाला गराडू पकने के बाद बाहर से कुरकुरा और अंदर से नरम रहने के लिए मशहूर है.
गराडू को आमतौर पर डीप-फ्राई किया जाता है और मसाले व नींबू के रस के साथ परोसा जाता है. सर्दियों में इसकी बहुत मांग रहती है और यह शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में एक लोकप्रिय व्यंजन है.
अधिकारियों के मुताबिक, अभी रतलाम जिले में लगभग 100 हेक्टेयर में बालम खीरे की खेती होती है, जबकि गराडू की खेती करीब 120 हेक्टेयर में की जाती है. बड़ी संख्या में किसान इन दोनों फसलों की खेती से जुड़े हैं.
इस बीच, बागवानी विभाग के एक और डिप्टी डायरेक्टर त्रिलोकचंद्र वास्काले ने बताया कि इंदौर जिले में उगाए जाने वाले मालवी आलू को भी GI टैग मिला है.
वास्काले के अनुसार, मालवी आलू में शुगर और स्टार्च की मात्रा कम होती है, जिससे इससे बने चिप्स, वेफर्स और फ्रेंच फ्राइज़ तलने पर काले या लाल नहीं पड़ते और उनका रंग हल्का बना रहता है.
उन्होंने कहा कि अभी इंदौर जिले में लगभग 45,000 हेक्टेयर में मालवी आलू की खेती होती है और करीब 35,000 किसान सीधे या परोक्ष रूप से इसकी खेती से जुड़े हैं.
वास्काले ने कहा कि कई फूड प्रोसेसिंग कंपनियां मालवी आलू की खास क्वालिटी की वजह से इसे सीधे किसानों से खरीदती हैं.
अधिकारियों ने कहा कि GI टैग से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मालवी गरडू, बालम खीरे और मालवी आलू की पहचान मजबूत होगी. उन्होंने उम्मीद जताई कि इस पहचान से किसानों को बेहतर दाम पाने, खेती का दायरा बढ़ाने और एक्सपोर्ट की संभावनाओं को बेहतर करने में मदद मिलेगी.
अधिकारियों के अनुसार, मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों के कई फूड प्रोडक्ट्स को पहले ही GI टैग मिल चुका है, जिनमें रतलामी सेव, कड़कनाथ चिकन, रियावन लहसुन, चिन्नौर चावल और सुंदरजा आम शामिल हैं.
GI टैग का मतलब है कि किसी प्रोडक्ट को उसके खास इलाके से जुड़ी पहचान और विशेषता के लिए कानूनी सुरक्षा मिलती है, ताकि उसकी असली क्वालिटी और नाम सुरक्षित रहे.