
पश्चिम एशिया में जारी ईरान–इजरायल संघर्ष ने भारत के फल निर्यात को गहरा असर पहुंचाया है. मुंबई के न्हावा शेवा बंदरगाह पर 1,250 से अधिक रेफर कंटेनर फंसे हुए हैं, जिनमें मुख्य रूप से केले, अंगूर और अनार शामिल हैं. यह स्थिति ऐसे समय पैदा हुई है जब गल्फ देशों में रमजान के दौरान भारतीय फलों की मांग चरम पर होती है.
निर्यातकों का कहना है कि सामान्यतः ये खेप दो से तीन दिनों में दुबई के जबल अली पोर्ट पहुंच जाती हैं, लेकिन युद्ध के कारण जहाजी सेवाएं बाधित हो गई हैं. बंदरगाह के भीतर कुल 1,500 TEUs में से लगभग 1,250 कंटेनर सिर्फ फलों के हैं, जिन्हें रेफर यूनिट में सुरक्षित तो रखा गया है, लेकिन लंबे समय तक देरी होने पर नुकसान बढ़ सकता है.
इधर, कई गल्फ रूट की एयरलाइनों ने अपनी फ्लाइट सीमित कर दी हैं, जिससे हवाई फलों की खेप भी भारतीय हवाई अड्डों पर अटक गई है. भारत रोजाना सैकड़ों टन फल और सब्जियां हवाई मार्ग से पश्चिम एशिया भेजता है, लेकिन शुरुआती दिनों में उड़ानें पूरी तरह बाधित रहीं. हालांकि अब थोड़ी सामान्य स्थिति लौट रही है, लेकिन बैकलॉग अभी भी साफ नहीं हो पाया है.
निर्यातकों ने 'बिजनेसलाइन' को बताया, रमजान का समय उनके सालाना कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है. यदि इस अवधि में निर्यात धीमा रहता है, तो भारी मात्रा में फल घरेलू बाजार में कम कीमतों पर बेचने पड़ सकते हैं, जहां मांग इतनी अधिक नहीं है कि इतनी बड़ी मात्रा को खपाया जा सके. इससे भारी आर्थिक नुकसान तय माना जा रहा है.
सूत्रों ने बताया कि आने वाले दिनों में ओमान की ओर जाने वाले दो जहाज कुछ कंटेनरों को ले जा सकते हैं. समुद्री मार्ग की तुलना में हवाई मार्ग की रुकावट कम रही है, पर दोनों रूटों पर संकट जारी है.
संकट केवल फल और सब्जियों तक सीमित नहीं है. अनाजों का निर्यात भी बड़ी चिंता है. इसके अलावा, यह संकट डेयरी और बेवरेज जैसी खास कैटेगरी में भी फैल रहा है, जहां भारत ने पश्चिम एशियाई खरीदारों पर बहुत अधिक निर्भरता बना ली है.
2025 में, भारत ने इस इलाके में 2810 लाख डॉलर के डेयरी प्रोडक्ट भेजे, जो इसके कुल ग्लोबल डेयरी एक्सपोर्ट का लगभग 29% है. बेवरेज सेक्टर पर असर और भी ज्यादा है. अल्कोहलिक और नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स का एक्सपोर्ट 197.5 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो इस कैटेगरी में भारत के कुल एक्सपोर्ट का 43% से ज्यादा है.
पिछले साल, भारत ने पश्चिम एशिया के देशों में 1.81 अरब डॉलर के मीट और प्रोसेस्ड मछली प्रोडक्ट्स के साथ-साथ 1.35 अरब डॉलर के चीनी और कोको से बने प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट किए.
मसालों का व्यापार भी उतना ही कमजोर है. अदरक, हल्दी, जायफल और इलायची जैसे मुख्य एक्सपोर्ट, जिनका कुल मूल्य करोड़ों डॉलर है, अभी परिवहन की कमी की वजह से मुश्किल में हैं.
केले (396.5 मिलियन डॉलर) और प्याज (111 मिलियन डॉलर) जैसे जल्दी खराब होने वाले सामान भी खतरे में हैं क्योंकि शिपिंग में देरी से इन प्रोडक्ट्स के निर्यात पर खतरा है.
पिछले दस सालों में “वेस्ट एशिया फैक्टर” भारत की एक्सपोर्ट पॉलिसी का एक अहम हिस्सा बन गया है. जैसे-जैसे शिपिंग रूट ज्यादा खतरनाक होते जा रहे हैं और इंश्योरेंस की लागत बढ़ती जा रही है, भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए अपना मार्जिन बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है.