
ग्लोबल मंचों पर जब 'श्री अन्न' का गुणगान हो रहा था, तब दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठे साहबों को लगा होगा कि देश के मोटे अनाज उगाने वाले किसानों की तकदीर बदल गई. लेकिन चमकीले पर्दे को जैसे ही आप हटाएंगे, मंडियों की कड़वी हकीकत मुंह पर तमाचा मारेगी. अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष बीत गया, त्योहार खत्म हो गए, लेकिन किसान का दर्द वहीं खड़ा है. सरकार ने जिन फसलों को 'सुपरफूड' कहकर प्रचारित किया, आज वही फसलें मंडियों में सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को भी तरस रही हैं. किसान से 'श्री अन्न' उगवाने के लिए भाषण देना आसान है, लेकिन उसकी लागत का सही मूल्य देना असली परीक्षा.
यह कृषि क्षेत्र का बड़ा विरोधाभास है. शहरों के मॉल और सुपरमार्केट्स में मिलेट्स के आटे, बिस्कुट और पास्ता पर 'हेल्थ' और 'ऑर्गेनिक' का ठप्पा लगाकर 200 से 300 फीसदी महंगे दामों पर बेचा जा रहा है. अमीर तबका इसे शौक से खरीद रहा है. लेकिन इस पूरी चेन की सबसे कमजोर कड़ी वही किसान है जिसने इसे उगाया. किसानों ने मोटे अनाजों को उगाने के लिए पसीना बहाया, लेकिन मुनाफा कंपनियों ने कमाया.
साल 2023 को दुनिया भर में 'अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष' के रूप में धूमधाम से मनाया गया. सरकार ने बाजरा, ज्वार और रागी जैसी फसलों को 'श्री अन्न' का नाम देकर सुपरफूड घोषित कर दिया. लेकिन इस प्रचार का असली फायदा किसे मिला? कंपनियों को या फिर जमीन पर पसीना बहाने वाले किसानों को? मिलेट वर्ष का शोर आज भी गूंज रहा है. फाइव-स्टार होटलों के मेन्यू से लेकर बड़े-बड़े सरकारी विज्ञापनों तक में बाजरा, ज्वार और रागी यानी श्री अन्न का प्रचार तो जोरदार ढंग से किया गया. लेकिन जब बात इन फसलों की खेती करने वाले किसानों को बाजार में उचित दाम दिलाने की आई, तो धरातल पर नीतियां फेल साबित होती हुई दिखाई दे रही हैं.
हाल ही में आए 29 मई 2026 की मंडी रिपोर्ट के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि सरकारों ने मोटे अनाजों का नाम बदलकर श्रीअन्न तो कर दिया, ब्रांडिंग तो चमका दी, लेकिन किसान को उसकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) दिलाने के लिए कोई पुख्ता बाजार तंत्र तैयार नहीं किया. नतीजतन, आज मिलेट्स उगाने वाला किसान मंडियों में औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर है.
एमएसपी से कम कीमत पर बेचने का मतलब घाटा सहना है. मई 2026 के अंतिम सप्ताह में कृषि मंत्रालय ने प्रमुख फसलों के दाम की जो स्थिति बताई है वह आंख खोलने वाली है. किसानों को मिलेट्स की कीमत एमएसपी से 30 फीसदी तक कम मिली. यानी बिचौलिये और कंपनियां कमा रहे हैं, जबकि किसान के हाथ खाली हैं. कृषि मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रमुख मिलेट्स की कीमतें मंडी में बुरी तरह धराशायी हुई हैं. रागी का सबसे बुरा हाल है. सरकार ने इसका MSP 4,886 प्रति क्विंटल तय किया था, लेकिन मंडियों में यह 3,406 के भाव पर बिक रहा है. यानी किसानों को रागी पर सीधा 30.29 फीसदी का भारी नुकसान हो रहा है.
मक्के का एमएसपी 2,400 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि मंडी में दाम महज 1,900 मिल रहा है. यह 20.83 फीसदी की गिरावट है. मिलेट वर्ष के मुख्य चेहरे 'बाजरा' का एमएसपी 2,775 है, लेकिन किसान इसे 2,288 में बेचने पर मजबूर हैं, जो एमएसपी से17.55 फीसदी कम है. ज्वार की कीमत भी उसकी MSP 3,699 के मुकाबले 3,603 पर चल रही है, जो सरकारी दाम से 2.60 फीसदी की कमी दिखाता है.
मई के पहले सप्ताह में भी मोटे अनाजों का मंडी भाव एमएसपी से कम ही था. कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 8 मई 2026 को खत्म हुए सप्ताह में देश के प्रमुख मोटे अनाजों के मंडी भाव MSP से काफी नीचे दर्ज किए गए. जिसमें बाजरा का भाव अपनी 2,775 रुपये प्रति क्विंटल की MSP से 25.55 फीसदी की भारी गिरावट के साथ 2,066 प्रति क्विंटल पर आ गया था. मक्का भी 2,400 रुपये प्रति क्विंटल की MSP के मुकाबले 21.29 परसेंट घटकर 1,889 रुपये प्रति क्विंटल पर बिका था. वहीं ज्वार अपनी 3,699 रुपये प्रति क्विंटल की MSP से 12.71 फीसदी नीचे रहकर 3,229 रुपये प्रति क्विंटल पर बिका था.
सरकार ढोल पीटती हैं कि वो मोटे अनाज को बढ़ावा दे रही है, लेकिन नीतियां केवल कागजों पर 'हरी' दिखती हैं, मंडियों में नहीं. सरकार कुल उत्पादन का महज 1 से 3 फीसदी मोटा अनाज ही खरीदती है. जिसकी वजह से बाजार पर किसानों को अच्छा दाम देने का दबाव नहीं बनता. इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) की रिपोर्ट "फार्म टू फोर्क: एन ओवरव्यू ऑफ मिलेट सप्लाई चेन्स इन इंडिया" के अनुसार, भारत में बाजरा और ज्वार की सरकारी खरीद उनके कुल उत्पादन का केवल 1 से 3% है. यह आंकड़ा धान और गेहूं के लिए 45 से 70 फीसदी सरकारी खरीद की तुलना में काफी कम है.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मिलेट ईयर के दौरान शहरी उपभोक्ताओं के बीच रागी के बिस्कुट और बाजरे के पास्ता का चलन तो बढ़ा, लेकिन ग्रामीण स्तर पर सरकारी खरीद तंत्र मजबूत नहीं हो सका. जब तक सरकारें मंडियों में इन फसलों की MSP पर 100 फीसदी खरीद सुनिश्चित नहीं करेंगी, तब तक किसानों के लिए 'श्री अन्न' श्री यानी 'लक्ष्मी' के रूप में बदल नहीं पाएगा. सपना केवल कागजों और भाषणों तक ही सीमित रहेगा. किसान का दर्द यही है कि जब वह बाजार की मांग देखकर फसल उगाता है, तो पॉलिसी की मार ऐसी पड़ती है कि अंत में उसे लागत निकालने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है.