River Pollution: उत्‍तराखंड में 12 नदियां प्रदूषण का शिकार, सुसवा के गंदे पानी से हो रही है खेती

River Pollution: उत्‍तराखंड में 12 नदियां प्रदूषण का शिकार, सुसवा के गंदे पानी से हो रही है खेती

उत्तराखंड की सुसवा नदी कभी जीवनरेखा थी, आज वही गंदे पानी और सीवेज का रास्ता बन चुकी है. CPCB रिपोर्ट ने 12 नदियों के प्रदूषित होने की पुष्टि की है. खेतों तक पहुंच रहा यह पानी खेती और किसानों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

Suswa River Pollution Suswa River Pollution
अंक‍ित शर्मा
  • Dehradun,
  • Feb 20, 2026,
  • Updated Feb 20, 2026, 2:05 PM IST

जिस सुसवा नदी को कभी देहरादून की जीवनरेखा कहा जाता था, आज उस नदी से सरकार और प्रशासन रुसवा नजर आ रहे है. सरकार के दावों से उलट सुसवा नदी गंदे नाले में तब्‍दील होती दिख रही है. काला पड़ता पानी, प्लास्टिक, झाग की परतें और बदबू अब सुसवा की पहचान बन चुके हैं. हिमालय की गोद में बसे देहरादून जैसे शहर में अगर नदी का यह हाल है तो हालात केवल पर्यावरण संकट तक सीमित नहीं रह जाते, बल्कि खेती और आजीविका पर भी सीधा खतरा बन जाते हैं.

12 नदियों में बढ़ रहा पॉल्‍यूशन लेवल

सेंट्रल पॉल्‍यूशन कंट्रोल बोर्ड की ताजा वाटर क्‍वालिटी रिपोर्ट इस खतरे की पुष्टि कर रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड की 17 नदियों में से 12 नदियां तय मानकों पर खरी नहीं उतर रहीं. कई जगहों पर बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी BOD का स्तर बेहद खतरनाक हद तक पहुंच चुका है, जो साफ बताता है कि नदियों में भारी मात्रा में बिना शोधन का गंदा पानी और जैविक कचरा मिल रहा है.

नाला बनती सुसवा नदी

देहरादून के बीचोंबीच बहने वाली सुसवा नदी अब घरेलू सीवेज, प्लास्टिक कचरे और छोटे उद्योगों के अपशिष्ट का रास्ता बन चुकी है. नदी किनारे रहने वाले लोग बीते दिनों को याद करते हैं, जब सुसवा साफ पानी और मछलियों के लिए जानी जाती थी.

स्थानीय निवासी धीराम चेतत्री बताते हैं कि बचपन में वे इसी नदी में नहाया करते थे और मछलियां पकड़ते थे. आज हाल यह है कि गर्मियों में जलस्तर घटते ही बदबू असहनीय हो जाती है और मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है.

एक अन्य निवासी भूपेंद्र लिम्बू कहते हैं कि यह अब नदी नहीं, नाला बन चुकी है. हर चुनाव में सफाई के वादे होते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती. एक समय यह इलाका पिकनिक स्पॉट हुआ करता था, आज लोग यहां रुकना भी नहीं चाहते.

जंगल से खेत तक फैल रहा प्रदूषण

सुसवा नदी केवल देहरादून तक सीमित नहीं है. यह आगे जाकर सोंग नदी में मिलती है और फिर गंगा बेसिन का हिस्सा बनती है. खास बात यह है कि इसका एक हिस्सा राजाजी टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है. ऐसे में प्रदूषित पानी का असर केवल इंसानों तक नहीं, बल्कि वन्यजीवों और जंगल के पूरे इकोसिस्टम पर पड़ रहा है.

नदी के निचले इलाकों जैसे डोईवाला, चांदमारी और प्रेमनगर में किसान इसी पानी से सिंचाई करते हैं. इन इलाकों में गेहूं, सरसों, सब्जियां, गन्ना और मशहूर कस्तूरी बासमती धान की खेती होती है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक गंदे पानी से सिंचाई होने पर मिट्टी की उर्वरता घटती है और फसलों की क्‍वालिटी और पैदावार पर बुरा असर पड़ता है.

इन नदियों में प्रदूषण चिंताजनक स्‍तर पर

BOD वह पैमाना है, जिससे पानी में मौजूद जैविक गंदगी का स्तर मापा जाता है. 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से ऊपर का स्तर प्रदूषण की चेतावनी माना जाता है. उत्तराखंड की कुछ नदियों में यह स्तर 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी ज्यादा रिकॉर्ड किया गया है, जो सबसे गंभीर श्रेणी में आता है. सुसवा, बंगंगा, भेल्ला, ढेला और कल्याणी जैसी नदियां कई हिस्सों में सबसे खराब स्थिति में हैं. टोंस, किच्छा और कोसी जैसी नदियों में भी प्रदूषण चिंताजनक स्तर पर है.

सवालों के घेरे में सिस्टम

देहरादून को हिमालय का प्रवेश द्वार और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील शहर के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन सुसवा की हालत सरकार और सिस्टम दोनों पर सवाल खड़े करती है. क्या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट सही तरीके से काम कर रहे हैं? औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले गंदे पानी की प्रभावी निगरानी क्यों नहीं हो पा रही?

नदी पुनर्जीवन की योजनाएं फाइलों से बाहर जमीन पर क्यों नहीं दिखतीं? नदियां केवल पानी की धाराएं नहीं होतीं, वे खेती, पर्यावरण और जीवन का आधार होती हैं. अगर देहरादून जैसे हिमालयी शहर अपनी नदी नहीं बचा पा रहे हैं तो इसका असर अंततः गंगा और उससे जुड़े करोड़ों लोगों तक पहुंचेगा.

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