
बिहार के मक्का किसान गोदाम की लचर व्यवस्था से जूझ रहे हैं. मक्के की जो भी दुर्गति है, उसमें एक बड़ा कारण गोदामों की भ्रष्ट व्यवस्था है. बिहार के कोसी बेल्ट में जहां मक्का भरपूर होता है, वहां प्राइवेट गोदामों ने अपना मकड़जाल बना रखा है. इन प्राइवेट गोदामों के मालिक बड़े-बड़े व्यापारी हैं जो किसानों को मजबूर कर सस्ते में मक्का खरीद लेते हैं और बाद में महंगे दामों पर बाहर भेज देते हैं. किसानों का कहना है कि कोसी के अधिकतर क्षेत्रों में न तो सरकारी गोदाम हैं और न ही उपज खरीदने के लिए कोई सरकारी एजेंसी. प्राइवेट व्यापारी और गोदाम मालिक इस कमी का फायदा उठाते हैं जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है. दिन-रात की मेहनत के बावजूद मक्के का भाव 1700-1800 रुपये क्विंटल से ज्यादा नहीं मिल रहा है.
बिहार का कटिहार और पूर्णिया जिला मक्का और मखाना की खेती के लिए जाना जाता है. किसानों की शिकायत है कि मखाना तो ग्लोबल हो गया, लेकिन मक्का लोकल होकर रह गया. इसकी वजह है-मखाना पर सरकार का अधिक ध्यान जबकि मक्का की अनदेखी. यह अनदेखी अभी तक चल रही है जिसका नुकसान किसान भुगत रहे हैं. मखाना के लिए मखाना बोर्ड तक गठित हो गया, लेकिन मक्का किसी बड़े प्रोसेसिंग प्लांट के लिए जूझ रहा है.
हालात इसलिए भी अधिक खराब हो गए क्योंकि किसान आज प्राइवेट व्यापारियों के हाथों बंधक बनने को मजबूर हैं. कटिहार के कई किसान बताते हैं कि मक्का कटाई के वक्त व्यापारी बाजार की ऐसी हालत बना देते हैं कि रेट में 200 से 400 रुपये तक गिरावट आ जाती है.
किसान अपनी उपज को बहुत दिनों तक नहीं रख सकते क्योंकि उन्हें तुरंत बेचकर पैसा चाहिए होता है. उपज रखने के लिए किसानों के पास जगह भी नहीं होती, खराब होने का भी डर होता है.
दूसरी ओर, प्राइवेट व्यापारियों और कॉरपोरेट्स ने पूरे इलाके में अपने बड़े-बड़े गोदाम बना रखे हैं. ये व्यापारी सस्ते में मक्का खरीद कर उसे स्टॉक करते हैं और दाम चढ़ते ही उसे बेच देते हैं. यह पूरा मामला एक तरह से होर्डिंग का है, लेकिन इस पर सरकार का ध्यान नहीं है.
किसानों का कहना है कि कोसी इलाके में सरकार गोदाम बनवाए और सरकारी एजेंसियों से खरीद कराए तो उनका भला होगा. उनके मक्के को सही रेट मिलेगा क्योंकि सरकारी एजेंसियां मक्का का दाम गिराने के लिए कोई हथकंडा नहीं अपनाएंगी. साथ ही, सरकारी गोदाम बनने से जमाखोरी की समस्या भी खत्म होगी.
कटिहार जिले में लक्ष्मीपुर गांव के बड़े मक्का किसान दीपक कुमार ने मक्के के रेट की पूरी कहानी बताई. रेट में गिरावट के लिए वे दो मुख्य कारणों को जिम्मेदार बताते हैं. पहला-बांग्लादेश में तनाव और दूसरा, पैक्स में मक्के की खरीद नहीं होना.
दीपक कुमार ने कहा, 'बांग्लादेश हमारे मक्के का बड़ा खरीदार था. यहां के लोकल बॉर्डर के जरिये मक्के की बड़ी सप्लाई होती थी. इसमें अवैध ढंग से भी मक्का भेजा जाता था. इससे किसानों की अच्छी कमाई चल रही थी. उनका मक्का बांग्लादेश में पूरी तरह से खप रहा था. लेकिन जब से वहां तनाव बढ़ा है, यूनुस ने जब से कमान संभाली है, मक्के का धंधा पूरी तरह चौपट हो गया है. कोसी बेल्ट में मक्के का भाव गिरने का यह बहुत बड़ा मुद्दा है.' वे कहते हैं कि जब तक बांग्लादेश और भारत के रिश्ते नहीं सुधरेंगे, कोसी बेल्ट के किसानों की रोजी-रोटी नहीं सुधरेगी.
किसान दीपक कुमार के मुताबिक, मक्के का भाव गिरने के पीछे पैक्स भी जिम्मेदार है. वे सवाल उठाते हैं कि जब पैक्स में धान की खरीदारी हो सकती है तो मक्के की क्यों नहीं. उनका कहना है कि पैक्स मक्का इसलिए नहीं खरीदता क्योंकि उसे बड़े-बड़े गोदाम बनाने होंगे. गोदाम बनने से किसानों को एमएसपी का भाव देना होगा. पैक्स इससे मुंह मोड़ रहा है. इसलिए अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पैक्स में मक्का खरीद का सिस्टम नहीं बन पा रहा है.
दीपक ने सुझाव दिया कि पैक्स को कृषि उपज खरीद का पूरा अनुभव है. इसलिए सरकार को इसके जरिये मक्का खरीदने पर फोकस करना चाहिए. जिस दिन यह काम शुरू हो जाएगा, बिहार में मक्के के रेट का झंझट खत्म हो जाएगा. गोदामों की व्यवस्था सुधर जाएगी और किसानों को प्राइवेट गोदामों का बंधक नहीं बनना पड़ेगा.