Farmers distress: मैंने गांव जाकर खेती करने का इरादा क्यों छोड़ा?

Farmers distress: मैंने गांव जाकर खेती करने का इरादा क्यों छोड़ा?

Kushinagar के एक किसान ने इंटरनेट पर पढ़कर केले की खेती शुरू की, लेकिन तीन साल में भारी नुकसान झेलने के बाद खेती छोड़ने का फैसला करना पड़ा. यह कहानी खेती की वास्तविक चुनौतियों को उजागर करती है.

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ब‍िपुल पांडेय
  • New Delhi ,
  • Apr 06, 2026,
  • Updated Apr 06, 2026, 5:34 PM IST

आज के दौर में सोशल मीडिया और इंटरनेट हमारे प्रश्नों का उत्तर देने वाला सबसे सशक्त माध्यम है. मैंने और मेरे छोटे भाई ने एक वेबसाइट पर पढ़ा कि एक एकड़ केले की खेती से साल में 6 से 7 लाख रुपये तक की कमाई संभव है. पढ़कर लगा कि हमने अब तक निरर्थक ही खेती की है. पिछले तीन दशक से हम गेहूं और धान की पारंपरिक करते आ रहे हैं. खेती में कमाई घटते घटते माइनस में चली गई है. अब हम करीब तीन एकड़ की खेती में साल भर में दस-बीस हजार रुपये का घाटा उठाते हैं. लेकिन आर्टिकल पढ़ने के बाद मैंने और मेरे भाई ने वर्ष 2022 में दो एकड़ में केले की फसल लगा दी. इस उम्मीद से कि एक साल में हम लोगों के पास 12 से 14 लाख रुपये होंगे. चूंकि एक फसल तीन साल तक चलती है, तो फायदा इससे भी ज्यादा होने की उम्मीद थी. लेकिन तीन साल में केले की खेती का जो परिणाम निकला, उसने हम दोनों का साहस तोड़ दिया. मैंने गांव जाकर खेती करने का इरादा छोड़ दिया. क्यों छोड़ दिया? ये आप हमारी खेती के अनुभव से समझ सकते हैं.

खेती के नए प्रयोग का ऐसे हुआ श्रीगणेश

अनुभव साझा करने से पहले थोड़ा काल और परिस्थितियों के बारे में समझ लीजिए. मैं उत्तर प्रदेश के कुशीनगर का रहने वाला हूं. उत्तर प्रदेश के चंद दरिद्र जनपदों में से एक. मैं स्वयं गाजियाबाद में नौकरी करता हूं. मेरे छोटे भाई गोरखपुर में बैंक में अफसर हैं. हम दोनों ही अपने पैतृक गांव से दूर रहते हैं. गांव में नथुनी राजभर हमारी खेती का काम देखते हैं. हमारी केले की खेती, हमारा मिला जुला प्रयास था.

वर्ष 2022 में गेहूं की फसल कट जाने के बाद हमने 2 एकड़ जमीन में धान की खेती नहीं की. दो महीने तक खेत तैयार करने में लगे रहे. चूंकि हम इस तरह की खेती में नए थे, इसलिए कृषि विभाग के एक कर्मचारी से संपर्क किया. विभाग के उस कर्मचारी ने हमें प्राइवेट एडवाइस देना स्वीकार किया. उनके बताए रास्ते पर चलकर हम खेती करने लगे. हमने दो एकड़ खेत में पहले गोबर डाला. गोबर खरीदने में कुल 10600 रुपये लगे. गोबर को खेत में फैलाने के लिए 6500 रुपये की मजदूरी दी. इसके बाद खेत की जुताई कराई. तीन-चार तरह से खेत की जुताई कराई गई. पहले हल से जुताई हुई, फिर तवा से जुताई और फिर रोटा से जुताई. केले की खेती में नियमित पानी की आवश्यकता होती है. उसके लिए नहर के पानी या बारिश के पानी पर निर्भर नहीं रहा जा सकता, इसलिए हमें बोरिंग भी करानी पड़ी. बोरिंग कराने में कुल 22000 रुपये लगे. खेत तैयार करने में हम थककर चूर हो गए. इस तरह हमारा खेत तैयार हो गया. हमने खेत तैयार करने में कुल 55 हजार रुपये खर्च किए. इसके बाद जुलाई की बारिश का हम इंतजार करने लगे.

सर मुंड़ाते ओले पड़े, हमें खेती के लिए फ्री पौधे नहीं मिले

जब हमने केले की खेती की पूरी प्रक्रिया समझी और सरकारी स्कीम के बारे में पता किया तो हमें बताया गया कि उत्तर प्रदेश सरकार केले की खेती को प्रोत्साहित कर रही है. किसानों को फ्री में ड्रिप इरिगेशन का सिस्टम लगाने के अलावा केले का फ्री पौधा दिया जा रहा है. हमने ड्रिप इरिगेशन के लिए अप्लाई कर दिया. हम सरकारी मशीनरी की तेजी देखकर हतप्रभ थे. कुछ ही समय में हमारे खेत में पानी का पाइप बिछ गया. सरकारी कर्मचारियों ने जितनी पाइप बिछाई, उतनी पाइप छत पर भी फेंक गए. कुल 55 हजार रुपये मेरे अकाउंट में आ गए और मैंने अकाउंट टू अकाउंट वो रकम सरकारी कर्मचारी के कहे के हिसाब से ट्रांसफर कर दिया. हमें इस प्रक्रिया में मजदूरी का भार उठाना पड़ा. वो रकम कितनी थी, ये ना तो मुझे याद है, ना मेरे भाई को. सच ये है कि उस ड्रिप इरिगेशन का आज तक उपयोग नहीं हो सका, क्योंकि वह पंपिंग सेट के पानी का फोर्स बर्दाश्त नहीं कर सकता था.

वर्ष 2022 की जुलाई में हमें खेत में पौधे लगाने थे. पौधा गवर्नमेंट स्कीम प्लांटेशन का था. हमें बताया गया था कि पौधा फ्री में दिया जाएगा. ऐन वक्त पर हमें पता चला कि सरकार की स्कीम चेंज हो गई है. पौधा फ्री में नहीं मिलेगा. हमने अपनी समझ और हैसियत से ज्यादा ही करने की कोशिश की. हमें बताया गया कि जी-9 केले की डिमांड इंटरनेशनल मार्केट में है. जी-9 केले की मेडिशिनल वैल्यू बहुत ज्यादा है. मुंबई वाले व्यापारी ट्रक लेकर जी-9 केला ढूंढते रहते हैं और पता चलते ही मुंहमांगी कीमत पर खेत खरीद लेते हैं. 

खैर वो तो बाद की बात थी. हमने दो एकड़ खेत के लिए कुल 2800 पौधे खरीदे. एक एकड़ में 1300 पौधे लगते हैं. दो एकड़ में 200 अतिरिक्त पौधे मंगाए जाते हैं, क्योंकि कुछ पौधे खराब भी निकल जाते हैं. पौधे खरीदने में हमारे 41600 रुपये लगे. अगर सरकारी स्कीम से पौधे फ्री मिल गए होते तो हम बड़ी रकम बचा सकते थे. खैर, खेती में इतना चलता है. खेती में सिर्फ स्कीम्स ही नहीं, ईश्वर भी परीक्षा लेते हैं.

ईश्वर हमारी बार-बार परीक्षा लेते रहे

हर वर्ष जून के आखिरी हफ्ते में या जुलाई के पहले हफ्ते में कुशीनगर में मॉनसून आ जाता है. बारिश होने लगती है. धान की रोपाई होने लगती है. लेकिन वर्ष 2022 में इंद्र देव भी आसमान में ही अड़ गए. उस बार जुलाई में काफी देर से बारिश शुरू हुई. इतनी देरी कि हम केले के पौधे लगाने के लिए इंतजार नहीं कर सकते थे. जी-9 पौधों की डिलिवरी हो चुकी थी. आसमान में बादल के नामोनिशान ना थे. बोरिंग से पानी चलाकर हमने पौधों की रोपाई कराई. पांच फीट बाई छह फीट के फॉर्मेशन में क्यारी बनी. पौधे लगाए. बरसात ना होने तक दो दिन गैप पर पानी चलाना था. हमने हफ्ते में कम से कम दो बार पानी चलवाया. एक बार पानी पटवने में 1500-2000 रुपये का डीजल लगता था. उस साल अक्टूबर में जाकर अच्छी बारिश हुई थी. तब तक हर महीने में हमने 8-8 बार पानी पटाया. अब फसल को हमें अपने बच्चे की तरह बढ़ते देखना था. फल लगते देखना था. फसल के तैयार होने तक इंतजार करना था.

14 महीने में पहली फसल तैयार हुई

केले के 2800 पौधे लाने के बाद से ही मजदूरों की समस्या बनी रही. इतने पौधों को उतारने और लगाने के लिए मजदूर जुटाना बहुत मुश्किल था. मजदूर जुट भी गए तो उनके लिए आवश्यक परिश्रम करना कठिन था. पूरी खेती के दौरान हमारे सामने ये समस्या बनी रही. प्लांटेशन के बाद हम फ्री नहीं बैठ सकते थे. हर डेढ़ महीने पर पूरे खेत की जुताई होती थी. फसल लग जाने के बाद उसमें ट्रैक्टर नहीं चल सकते थे, इसलिए छोटा ट्रैक्टर मंगाना पड़ता था. ये हाथ से चलने वाला ट्रैक्टर था. इससे हर डेढ़ महीने पर एक बार जुताई करानी ही पड़ती थी. इसमें मोटा मोटी 5000 रुपये लगते थे. इसके अलावा खेत की सोहाई करानी पड़ी, जिसमें 7000 रुपये लगे.

केले की खेती में ग्रास राउंडर पावडर, इनसेक्टिसाइड, खाद हर दो महीने पर लगता है. यूरिया, डीएपी, पोटास, जिंक, सल्फेट मिलाकर 4 से 4.5 हजार रुपये हर दो महीने पर खर्च होते हैं. उदाहरण के तौर पर इनसेक्टिसाइड छिड़कने के लिए 1500 रुपये सिर्फ मजदूरी लग जाती है. खेत में केले के पत्ते की छंटाई कराते थे. एक बार में सात हजार रुपये लगते थे. फल बड़ा करने के लिए दवा दी गई. फल बड़ा होने पर घवद भारी हो गया तो एक अलग मुसीबत खड़ी हो गई. घवद को रस्सी से बांधना पड़ा, ताकि केले का पेड़ ना ढह जाए. रस्सी से सभी पेड़ को एक-दूसरे से बांधकर सहारा देना पड़ा. फल बड़ा हो जाने पर नथुनी रात में भी खेत में ही सोने लगे. तभी वो अनहोनी भी हुई. एक रात नीलगाय के झुंड ने हमारे खेत पर धावा बोल दिया. नथुनी जब तक रोक पाते, तब तक करीब 15-20 पेड़ों को नीलगाय नुकसान पहुंचा चुके थे. कुल मिलाकर 14 महीने पर पहली फसल तैयार हो गई.

आखिर कर्म का फल मिलने का समय आ ही गया

हमारी डायरी बताती है कि 26 अगस्त, 2023 तक हमने केले की खेती पर कुल 269000 रुपये खर्च किए. इसके एक महीने बाद 24 सितंबर, 2023 को हमारी फसल की पहली बिक्री हुई. तब हमने चालाकी दिखाई. छठ का पर्व आने ही वाला था. उससे पहले हमने सिर्फ उन केलों को ही उतारा, जिन्हें बेचना अत्यंत आवश्यक था. एक ट्रॉली केला लेकर हम फाजिलनगर की मंडी में बेचने पहुंचे. मंडी में हमें बताया गया कि सितंबर में केले की डिमांड कम होती है, हमें उस दिन 19000 रुपये की पहली कमाई हुई.

इसके बाद का सारा ब्योरा बहीखाते में दर्ज है. 2 अक्टूबर, 2023 तक हमने 295540 रुपये खर्च किए थे. 8 दिसंबर, 2023 तक हमारा खर्च बढ़कर 336900 रुपये हो चुके थे. इस बीच में 4 बार केला बिका. 3 अक्टूबर, 2023 को 15870 रुपये का केला बिका. फिर 14 नवंबर 2023 को 49530 रुपये का केला बिका. ये छठ का समय था. हमें केले का अच्छा मूल्य मिला. 10 दिसंबर 2023 को 45196 रुपये का केला बिका. केले की फसल में ये दोनों सौदा सबसे बड़ा था. इसके बाद हमारी उम्मीदों पर पानी फिरता चला गया.

10 जनवरी, 2024 को हमने 26371 रुपये का केला बेचा. 28 जनवरी, 2024 को 20160 रुपये का केला बिका. 28 जनवरी तक कुल 363100 रुपये खर्च हो चुके थे. हमें उम्मीद थी कि पहले सीजन के बाद खर्च कम होता जाएगा, मुनाफा बढ़ता जाएगा. लेकिन हर डेढ़ महीने पर छोटा ट्रैक्टर, हर दो महीने पर खाद, खेत में उग आए घास की सोहनी. पैसे लगते रहे और फसल से आमदनी घटती रही. 11 फरवरी, 2024 को जब 5500 रुपये का ही केला बिका को हम दोनों भाइयों का फ्रस्ट्रेशन आसमान पर पहुंच गया था. हर बार की तरह 1000 रुपये किराया, 500 रुपये मंडी में केला उतारने की मजदूरी, आढ़तिया का 5 या 7 परसेंट कमीशन. मेरे भाई को गोरखपुर से इसी काम के लिए समय और पेट्रोल फूंककर गांव जाना खलने लगा.

पौधों ने फल देने की क्षमता खो दिया, हमारी खेती की क्षमता चुक गई

इंटरनेट पर आर्टिकल पढ़ने के बाद हमने खेती शुरू की. हमें उम्मीद थी कि दिल्ली के किसान आंदोलन में शामिल होने वाले किसानों की तरह ही हम भी अमीर हो जाएंगे. दोनों भाई एक-एक आईफोन लेकर घूमेंगे. लेकिन हमारी डायरी में दर्ज आखिरी सौदा 7 अप्रैल, 2024 का है. उस दिन 5108 रुपये में केला बिका. तब तक 396800 रुपये खर्च हो चुके थे. 21 जुलाई, 2024 तक हम 459400 खर्च कर चुके थे. अब तक हमने 186735 रुपये का केला बेचा था. 272665 रुपये का नुकसान करा चुके थे. इसमें भी फसल को खेत से मंडी तक ले जाने का खर्च, मजदूरी, आढ़तिए का कमीशन शामिल नहीं है. अंत अंत तक हम फसल को खेत में ही छोड़ चुके थे. जिसे केले चाहिए, वो काटे और ले जाए. हमें इस फसल से अब कुछ नहीं चाहिए था.

आखिर कमी कहां रह गई?

केले की खेती हमारे लिए बुरा सपना था. मैं और मेरे भाई इस बारे में बात भी नहीं करते. जब अनुभव लिखने की बात आई तो मैंने अपने भाई से पूछा, इसे क्या समझा जाए? फसल का मूल्य सही नहीं मिला, एक्ट ऑफ गॉड था या कुछ और? मेरे भाई के हिसाब से पता नहीं क्या था. मूल्य तो जितना बाजार में मिलता है उतना ही मिला. लेकिन हिसाब लगाने पर पता चलता है कि हमें केले का सर्वाधिक मूल्य 175 रुपये घवद मिला था. एक घवद में 250 केले भी मान लें तो हमने 50 पैसे का एक केला बेचा, जो हम शहरों में 7 रुपये का खरीदते हैं. खेत से आम जनता तक आने में ये अंतर बहुत बड़ा है.

खेती के दौरान हमें एक बार भीषण बारिश का सामना करना पड़ा, जिससे केले की फसल को नुकसान हुआ. एक बार नहर टूट गई और इससे फसल पानी में डूब गई. लेकिन क्या ये नहीं हुआ होता तो हम काफी अच्छी स्थिति में होते? ये कहा नहीं जा सकता. इस खेती में हमारे तीन साल चले गए, आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा. आखिर में खेत को वापस धान-गेहूं की खेती के लायक बनाने में भी हमें 40 हजार रुपये खर्च करने पड़े. ऐसे कौन अन्नदाता बना रह सकता है? बस एक बात समझ में आती है कि देश की सरकारों को 70 परसेंट आबादी के बारे में सोचने की अत्यंत आवश्यकता है.

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