पारंपरिक किस्मों को पीछे छोड़ रहा 'स्वर्ण अनमोल', कम लागत में बंपर मुनाफा कमा रहे टमाटर किसान

पारंपरिक किस्मों को पीछे छोड़ रहा 'स्वर्ण अनमोल', कम लागत में बंपर मुनाफा कमा रहे टमाटर किसान

त्रिपुरा के धलाई जिले में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के मार्गदर्शन और 'स्वर्ण अनमोल' रोग-प्रतिरोधी हाइब्रिड टमाटर की बदौलत किसानों की आय में बड़ी वृद्धि हुई है. बैक्टीरियल विल्ट (जीवाणु जनित मुरझा रोग) जैसी गंभीर चुनौती से निपटने के बाद, किसानों को पैदावार में लगभग 30% की वृद्धि और भारी मुनाफा मिला है.

Tripura tomato farmingTripura tomato farming
क‍िसान तक
  • नई दिल्ली,
  • Nov 05, 2026,
  • Updated Nov 05, 2026, 5:10 PM IST

त्रिपुरा के धलाई जिले के उत्तरी कचुचेरा गांव के टमाटर किसान श्री कृष्ण गोपाल दास के लिए 'बैक्टीरियल विल्ट' (जीवाणु जनित मुरझा रोग) लंबे समय से एक बड़ी चुनौती बना हुआ था. इससे न केवल उनकी फसल के अस्तित्व पर खतरा मंडराता था, बल्कि खेती से होने वाली कमाई भी घट जाती थी. इस समस्या के समाधान के लिए कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), धलाई ने ICAR-एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट (ATARI), जोन VII, उमियम, मेघालय की तकनीकी देखरेख और ICAR-RCER, पटना द्वारा विकसित 'स्वर्ण अनमोल' हाइब्रिड किस्म को पेश किया.

धलाई जिले में टमाटर एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक सब्जी फसल है. यहां की अनुकूल सर्दी, पारिवारिक श्रम की उपलब्धता और स्थानीय बाजारों में इसकी लगातार मांग इसे बढ़ावा देती है. हालांकि, इसकी खेती में अक्सर कई बाधाएं आती हैं, जैसे कि बैक्टीरियल विल्ट (जीवाणु जनित मुरझाना), टमाटर लीफ कर्ल रोग, अर्ली और लेट ब्लाइट, फ्रूट बोरर (फल छेदक कीट) का प्रकोप, जलभराव और पोषक तत्वों का असंतुलित प्रबंधन. 

इन चुनौतियों में, बैक्टीरियल विल्ट विशेष रूप से विनाशकारी है. इससे संक्रमित पौधे बहुत तेजी से मुरझाकर मर सकते हैं, जिससे पौधों की संख्या कम हो जाती है और पैदावार में भारी नुकसान होता है. एक ही खेत में बार-बार ऐसी किस्मों को उगाना, जो इन रोगों के प्रति संवेदनशील हैं, समस्या को और गंभीर बना सकता है. इसलिए, टमाटर के सफल उत्पादन के लिए रोगों का सही प्रबंधन एक बहुत महत्वपूर्ण फैक्टर बन जाता है.

पारंपरिक किस्म 'NS 962' से क्यों बेहतर है 'स्वर्ण अनमोल'?

पहले किसान 'NS 962' नामक व्यावसायिक हाइब्रिड किस्म की खेती करते थे. हालांकि इसके फल बड़े होते थे, लेकिन गर्म और उमस भरे मौसम में बैक्टीरियल विल्ट के कारण पौधे तेजी से सूख जाते थे. इसके विपरीत, 'स्वर्ण अनमोल' ने कई मामलों में बेहतर रिजल्ट दिया. 

पौधों का जीवन: रोपाई के बाद पौधों के जीवित रहने की दर 94.6% रही (जबकि पुरानी किस्म में यह 84.8% थी).

रोग नियंत्रण: बैक्टीरियल विल्ट का प्रकोप घटकर मात्र 1.8% रह गया. इसके अलावा टमाटर लीफ कर्ल और झुलसा रोग (Early & Late Blight) का प्रकोप भी काफी कम रहा.

फलों की संख्या: हालांकि इसके फल का औसत वजन 68.4 ग्राम था, लेकिन प्रति पौधा अधिक फल (औसत 47.2 फल) लगने से कुल उत्पादकता में जबरदस्त इजाफा हुआ.

किसानों की आय में शानदार वृद्धि

वैज्ञानिक फसल-प्रबंधन (जैसे- नर्सरी प्रबंधन, उठी हुई क्यारियों पर रोपाई, संतुलित पोषण, स्टेकिंग और उचित जल निकासी) अपनाने से किसानों को बेहतरीन आर्थिक लाभ मिले. 'स्वर्ण अनमोल' किस्म की पैदावार 58.60 टन प्रति हेक्टेयर (586 क्विंटल) रही, जो 'NS 962' (45.20 टन प्रति हेक्टेयर) से काफी अधिक है.

मुनाफे की बात करें तो लगभग 0.16 हेक्टेयर ('कानी' जमीन) के छोटे से क्षेत्र से ही किसान गोपाल दास को 1,09,280 रुपये का शुद्ध रिटर्न हासिल हुआ, जिससे उन्हें पुरानी किस्म की तुलना में लगभग 30,880 रुपये की अतिरिक्त शुद्ध आय हुई.

इस सफलता से न केवल कृष्ण गोपाल दास का आत्मविश्वास बढ़ा है, बल्कि उत्तरी कचुचेरा और आस-पास के अन्य किसान भी रोग-प्रतिरोधी हाइब्रिड किस्मों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं.

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