
गुजरात के आदिवासी बाहुल्य डांग जिले के अंदरूनी गांव मोटामालुंगा में कक्षा 10 तक पढ़े एक युवा किसान ने आधुनिक ढंग से स्ट्रॉबेरी की खेती कर अतिरिक्त आय अर्जित करना शुरू कर दिया है. अपने परदादा के समय से चली आ रही पारंपरिक खेती के साथ-साथ, इस युवक ने सरकारी योजना का लाभ उठाते हुए स्ट्रॉबेरी की खेती से प्रति वर्ष 20 से 25 लाख रुपये की आय अर्जित की है. डांग जिले के किसान वर्षों से नागली, ज्वार, वराई और धान जैसी पारंपरिक खेती से जुड़े रहे हैं, लेकिन वर्तमान पीढ़ी अपने पूर्वजों की पुरानी पारंपरिक खेती को आधुनिक खेती के साथ मिलाकर अतिरिक्त आय कमा रही है.
मोटामालुंगा में पारंपरिक खेती करने वाले परिवार के युवा- जिग्नेश भोये ने बताया कि वर्षों से पारंपरिक खेती से हमारे जीवन में कोई बदलाव नहीं आया था, इसलिए मैंने कुछ नया करने का सोचा. हमारे डांग में स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए आब-ओ-हवा अनुकूल है.
इसलिए मैंने सरकारी सब्सिडी के बारे में जानकारी लेने के लिए अधिकारियों से मुलाकात की, उसके बाद पिछले चार-पांच वर्षों से मैं आधुनिक विधि से स्ट्रॉबेरी, टमाटर और सफेद मूसली की खेती कर रहा हूं, लेकिन पिछले दो सालों से सरकारी सबसिडी का लाभ भी ले रहा हूं.
वर्तमान में जिग्नेश ने दो एकड़ जमीन में 40,000 स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए है, जिनसे पहली बार करीब 15 लाख और साल भर में 20 से 25 लाख रुपये की आय की उम्मीद है. गांव में तैयार स्ट्रॉबेरी अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत और राजकोट जैसे जिलों और बड़े शहरों में भेजी जाती हैं. इससे अच्छी आय होती है.
जिग्नेश से प्रभावित किसान विठ्ठल भोये ने कहा कि जिग्नेश को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देख आसपास के गांव वाले भी अब उससे प्रेरित हुए हैं और स्ट्रॉबेरी की खेती की तालीम लेने फॉर्म की मुलाकात ले रहे है. गांव के कुछ किसानों स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू भी कर दी है.
डांग के बागवानी अधिकारी तुषार गामित ने बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए सरकार पौधों के लिए 75 प्रतिशत और मल्चिंग पेपर के लिए 75 प्रतिशत सब्सिडी देती है. ड्रिप सिंचाई और पैकिंग बॉक्स के लिए भी 75 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है. जिले में युवक सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते हुए अच्छी कमाई कर रहे हैं. (रौनक जानी की रिपोर्ट)