गेहूं की बालियों का काला पड़ना भारी नुकसान की वजह, करनाल बंट रोग से बचाव जरूरी

गेहूं की बालियों का काला पड़ना भारी नुकसान की वजह, करनाल बंट रोग से बचाव जरूरी

यदि गेहूं की बालियों में कालापन दिख रहा है तो सावधान हो जाएं. यह करनाल बंट (Karnal Bunt) नामक खतरनाक फफूंदजनित रोग हो सकता है, जो पैदावार को 40–50% तक घटा सकता है. जानें इसके लक्षण, कारण और प्रभावी नियंत्रण उपाय.

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क‍िसान तक
  • New Delhi ,
  • Feb 09, 2026,
  • Updated Feb 09, 2026, 1:02 PM IST

गेहूं की बालियों में कालापन दिख रहा है तो सावधान हो जाएं. यह कालापन बालियों को बर्बाद कर सकता है और पैदावार खत्म हो सकती है. बालियों का कालापन करनाल बंट (Karnal Bunt) बीमारी की वजह से होता है. यह गेहूं की बहुत खतरनाक बीमारी है. करनाल बंट एक प्रमुख फफूंदजनित (टिलेशिया इंडिका) रोग है, जो मुख्य रूप से दानों को काला करके सड़ी मछली जैसी गंध पैदा करता है.

यह बीज और मिट्टी जनित रोग है, जो नम मौसम में फैलता है. इस बीमारी को खत्म करने के लिए सबसे जरूरी है प्रमाणित बीजों का उपयोग करना. इसके अलावा 5 साल का फसल चक्र, और खड़ी फसल में फूल आते समय प्रोपिकोनाजोल (Propiconazole 25% EC) का छिड़काव जरूरी है. किसान इन उपायों को अपनाएं तो गेहूं की फसल करनाल बंट रोग से बच सकता है.

रोग के लक्षण और पहचान:-

दाने का रंग: दानों के आंशिक रूप से काले और पाउडरी (चूर्ण) हो जाना.
गंध: संक्रमित दाने से सड़ी हुई मछली जैसी तीखी गंध आना.
पहचान: यह रोग मुख्य रूप से थ्रेसिंग (कटाई के बाद) के समय पहचाना जाता है.
पौधे की स्थिति: दाना पूरी तरह से न भरकर, उसके अंदर का हिस्सा काले पाउडर में बदल जाता है. 

करनाल बंट फैलने के कारण

मौसम 

गेहूं में फूल आने की अवस्था में 8-23°C तापमान और उच्च आर्द्रता (बादल, हल्की बारिश) रोग के लिए अनुकूल है. अगर ये दोनों परिस्थितियां बनती हैं तो गेहूं में करनाल बंट बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है. किसानों को फसल पर होने वाले मौसम के प्रभाव की निगरानी करनी चाहिए.

बीज/मिट्टी 

अगर बीज में करनाल बंट बीमारी का संक्रमण पहले से फैला है तो उससे बीमारी के आगे बढ़ने का खतरा बहुत अधिक रहेगा. इसलिए बुवाई से पहले संक्रमित बीज को ठीक करने के लिए बीज का उपचार जरूर करें. मिट्टी के बीजाणु (टेलिओस्पोर्स) भी इस बीमारी को बढ़ाते हैं जिसके लिए मिट्टी की जांच के बाद उसका समाधान जरूरी है. 

एकीकृत प्रबंधन और उपचार

प्रमाणित बीजों का प्रयोग करें. बीज खरीदते वक्त सावधानी बरतें और विश्वसनीय स्रोतों से रोग-प्रतिरोधी बीज ही खरीदें और बोएं. नकली और दोयम दर्जे के बीज से बचें. 

बीज उपचार 

गेहूं की बुवाई से पहले बीजों को उचित फफूंदनाशक से उपचारित करें. यह सबसे जरूरी काम है क्योंकि इसके बिना बीमारी फैलने का खतरा बहुत अधिक रहेगा.

फसल चक्र 

खेत में 5 साल तक गैर-मेजबान (गेहूं की जगह अन्य) फसलें उगाएं. देखा गया है कि खेत में लगातार कई साल से गेहूं ही बोते रहें तो बीमारी का प्रकोप बढ़ने की आशंका अधिक रहती है. इसलिए फसल चक्र को जरूर अपनाएं.

रासायनिक छिड़काव 

गेहूं की बाली निकलने की अवस्था में (बूट अवस्था) 200 मिली प्रोपिकोनाजोल (Propiconazole 25% EC) को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें.

सिंचाई प्रबंधन 

फसल में फूल आते समय खेत में बहुत अधिक नमी न रखें. अगर हल्की बारिश भी तो खेत में पानी निकालने का इंतजाम रखें. किसी भी स्थिति में खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए. 

रोग का आर्थिक नुकसान

करनाल बंट यानी बालियों का काला पड़ना, सीधे तौर पर उपज में 40-50% तक कमी ला सकता है और अनाज की क्वालिटी खराब होने से बाजार मूल्य कम मिलता है. इसके अलावा, यह एक क्वारंटाइन (संगरोध) कीट है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करता है. अगर गेहूं में इस बीमारी का जरा भी अवशेष मिल जाए तो निर्यात की पूरी खेत कैंसिल हो सकती है या निर्यात लायक नहीं मानी जा सकती.

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