Urea Subsidy: यूरिया सब्सिडी पर होगा बड़ा खेल? Economic Survey में कीमत बढ़ाने का सुझाव

Urea Subsidy: यूरिया सब्सिडी पर होगा बड़ा खेल? Economic Survey में कीमत बढ़ाने का सुझाव

Urea Price Hike Suggestion: Economic Survey 2025-26 में सरकार ने यूरिया सब्सिडी को लेकर बड़ा संकेत दिया है. किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे मिट्टी और पैदावार पर असर पड़ रहा है. समाधान के तौर पर कीमत और सब्सिडी सिस्टम में बदलाव का सुझाव दिया गया है.

Urea Price Hike and Subidy Pattern Change SuggestionUrea Price Hike and Subidy Pattern Change Suggestion
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Jan 29, 2026,
  • Updated Jan 29, 2026, 6:19 PM IST

Economic Survey Report 2025-26: भारतीय कृषि में बीते कुछ वर्षों के दौरान तकनीक, उत्पादन और सरकारी योजनाओं के स्तर पर कई अहम फैसले लिए गए हैं. इसके बावजूद खेती की उत्पादकता और किसानों की आय से जुड़ी कुछ बुनियादी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं. इन्हीं समस्याओं में एक बड़ा कारण उर्वरकों का असंतुलित इस्तेमाल है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूरिया का जरूरत से कहीं ज्यादा और धड़ल्ले से किया जा रहा इस्‍तेमाल है. आम बजट से पहले गुरुवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में सरकार ने इस प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है.

यूरिया का अति में हो रहा इस्‍तेमाल

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि किसानों द्वारा यूरिया का अत्यधिक इस्तेमाल मिट्टी की सेहत, फसल की पैदावार और लंबे समय में खेती की टिकाऊ व्यवस्था के लिए नुकसानदेह बनता जा रहा है. इसी को देखते हुए आर्थिक सर्वेक्षण में यूरिया सब्सिडी की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव का सुझाव दिया गया है. आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, सरकार ने यूरिया की खुदरा कीमत में एक सीमित या मामूली बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा है.

2018 से नहीं बढ़ें यूरिया के दाम

फिलहाल यूरिया की कीमत मार्च 2018 से स्थिर बनी हुई है और 45 किलो की एक बोरी 242 रुपये में मिल रही है. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अगर यूरिया की कीमत बढ़ाई जाती है तो बढ़ी हुई रकम के बराबर पैसा किसानों को प्रति एकड़ के हिसाब से सीधे उनके खाते में ट्रांसफर किया जाए. इसका मकसद यह है कि किसान की कुल क्रय शक्ति पर कोई असर न पड़े, लेकिन खाद खरीदते समय सही आर्थिक संकेत मिले.

पोषक तत्‍वों का संंतुलन बिगड़ा

रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में यूरिया सस्ता होने के कारण किसान नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके मुकाबले फास्फोरस और पोटाश जैसे अन्य पोषक तत्व महंगे हैं. यही वजह है कि खेती में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है. 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2009-10 में किसानों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला N:P:K अनुपात 4:3.2:1 था, जो उस समय संतुलित माना जाता था. लेकिन 2019-20 तक यह अनुपात 7:2.8:1 हो गया और 2023-24 में बढ़कर लगभग 10.9:4.1:1 तक पहुंच गया. जबकि कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, अधिकतर फसलों और मिट्टी के लिए सही अनुपात करीब 4:2:1 होना चाहिए.

मिट्टी में ऑर्गेनिक मैटर घट रहा

सर्वेक्षण रिपेार्ट में कहा गया है कि यह समस्या उर्वरकों की कमी की नहीं, बल्कि उनके गलत इस्तेमाल की है. जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन डालने से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता कमजोर हो रही है. मिट्टी में ऑर्गेनिक मैटर घट रहा है, सूक्ष्म पोषक तत्व तेजी से खत्म हो रहे हैं और मिट्टी की संरचना खराब हो रही है. इसके साथ ही भूजल में नाइट्रेट का रिसाव भी बढ़ रहा है.

सरकार ने सुधार के लिए ये कदम उठाए

कई सिंचित इलाकों में यह स्थिति सामने आई है कि उर्वरकों की मात्रा बढ़ाने के बावजूद फसल की पैदावार में उम्मीद के मुताबिक बढ़ोतरी नहीं हो रही है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सरकार ने अब तक उर्वरक प्रबंधन सुधारने के लिए कई कदम उठाए हैं.

इनमें न्यूट्रिएंट बेस्ड प्राइसिंग, नीम कोटेड यूरिया, आधार से जुड़ा पॉइंट ऑफ सेल सिस्टम और इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम शामिल हैं. इन उपायों से निगरानी और पारदर्शिता में सुधार हुआ है, लेकिन किसान के खाद चुनने के फैसले पर इनका सीमित असर पड़ा है.

उर्वरक सब्सिडी में बदलाव का सुझाव

इसी वजह से आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया है कि उर्वरक सब्सिडी को धीरे-धीरे इनपुट आधारित सहायता से आय आधारित सहायता में बदला जाए. अगर किसानों को प्रति एकड़ सीधा ट्रांसफर मिलेगा तो जो किसान पहले से संतुलित मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें फायदा होगा. 

वहीं, जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने वाले किसानों को पोषक तत्वों के संतुलन की ओर जाने का आर्थिक संकेत मिलेगा. इससे मिट्टी परीक्षण, नैनो यूरिया, तरल उर्वरक और जैविक खाद के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह ट्रांसफर सभी किसानों के लिए एक समान नहीं होनी चाहिए. 

फसल और क्षेत्र के हिसाब से बनेंगी जोन

उर्वरकों की जरूरत फसल और इलाके के अनुसार अलग-अलग होती है. धान-गेहूं और गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में नाइट्रोजन की जरूरत ज्यादा होती है, जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में मोटे अनाज और दलहन की खेती में इसकी जरूरत कम होती है. इसलिए ट्रांसफर को एग्रो क्लाइमेटिक जोन और फसल पैटर्न से जोड़ने की सिफारिश की गई है.

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, आधार से जुड़े उर्वरक बिक्री रिकॉर्ड, रियल टाइम ट्रैकिंग सिस्टम और पीएम किसान जैसे प्लेटफॉर्म इस तरह के बदलाव को लागू करने के लिए तैयार हैं. हालांकि, किरायेदारी वाली (बटाईदार) खेती को एक चुनौती माना गया है, जिसके समाधान के लिए पहले पायलट प्रोजेक्ट चलाने की बात कही गई है.

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