
देश के कई हिस्से ऐसे भी हैं जहां अभी धान की खेती हुई है. ऐसे इलाके के किसानों को फसल को लेकर खास ध्यान रखना चाहिए. धान के नए पौधों को जड़ सूत्रकृमि बहुत नुकसान पहुंचाते हैं. इससे पनपने वाला रोग बहुत खतरनाक होता है. धान उगाए जाने वाले लगभग सभी क्षेत्रों में इस सूत्रकृमि की समस्या देखी जाती है. सेम वाले इलाके में इसकी समस्या अधिक है. यह स्थान बदलने वाला अंतः परजीवी सूत्रकृमि है जो जड़ों के अंदर घुसकर पूरी बढ़वार के समय तक फसल को हानि पहुंचाता है.
ऐसे में इस सूत्रकृमि से किसानों को सावधान रहना चाहिए क्योंकि यह पौधे को बढ़ने नहीं देता और छोटी अवस्था में ही चौपट कर देता है. आइए सबसे पहले इस सूत्रकृमि के लक्षण जान लेते हैं ताकि इसके रोग को पकड़ने और फिर इलाज करने में आसानी होगी.
धान में यह सूत्रकृमि क्यारियों और ऊपरी मिट्टी में पाया जाता है. यह धान के लिए बड़ी समस्या है. यह भारत के कई राज्यों में गहरे पानी में सिंचित धान में बड़े पैमाने पर पाया जाता है. इसके छोटे जीवनचक्र और विस्तृत परजीवी शृंखला कई खरपतवार प्रजातियों सहित जो धान के खेतों में आम हैं, इस प्रजाति को नियंत्रित करना मुश्किल बनाते हैं. इससे बचाव के लिए उपाय में कहा जाता है कि स्वस्थ पनीरी का ही प्रयोग करें. पनीरी लगाने वाले स्थान को हर बार बदलते रहें. इससे सूत्रकृमि लगने का खतरा कम होता है.