
रबी सीजन की बुआई से पहले भारत को खाद के मोर्चे पर बड़ी राहत मिली है. देश की सरकारी उर्वरक आयातक कंपनी इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) के हालिया यूरिया आयात टेंडर में कीमतें अगस्त की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत तक कम दर्ज की गई हैं. इससे संकेत मिल रहे हैं कि वैश्विक नाइट्रोजन उर्वरक बाजार में दबाव कम हुआ है और आपूर्ति बेहतर होने के कारण कीमतों में नरमी आ रही है.
IPL ने 23 सितंबर को 17 लाख टन यूरिया आयात के लिए टेंडर जारी किया था, जिसमें पश्चिमी तट के लिए 10 लाख टन और पूर्वी तट के लिए 7 लाख टन यूरिया खरीदने की योजना थी. 7 अक्टूबर को बंद हुए इस टेंडर में पश्चिमी तट के लिए 356.25 डॉलर से 416.50 डॉलर प्रति टन और पूर्वी तट के लिए 352.10 डॉलर से 465 डॉलर प्रति टन तक के ऑफर मिले. खास बात यह रही कि कुल प्राप्त ऑफर भारत की जरूरत से दोगुने से भी अधिक रहे, जिससे स्पष्ट है कि वैश्विक बाजार में पर्याप्त आपूर्ति मौजूद है और निर्यातक भारत को माल बेचने के लिए तैयार हैं.
भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक देश है. ऐसे में IPL का यह टेंडर केवल घरेलू जरूरतों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक उर्वरक बाजार के लिए भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर माना जाता है. कई देश भारतीय खरीद कीमतों को आधार बनाकर अपने आयात सौदे तय करते हैं.
दरअसल, वर्ष 2026 में यूरिया बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. साल की शुरुआत में पश्चिम एशिया में टेंशन और सप्लाई चेन बाधित होने से अप्रैल में भारत के लिए यूरिया की आयात कीमत 959 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थी. इसके बाद स्थिति सामान्य होने लगी और चीन के निर्यातकों की बाजार में वापसी से कीमतों में लगातार गिरावट आई. जून के टेंडर में कीमतें 445 से 449 डॉलर प्रति टन रहीं, जबकि अगस्त में यह घटकर करीब 390 से 394 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई थीं.
हालांकि सितंबर के अंत में वैश्विक बाजार में फिर से तेजी के संकेत मिले थे और मध्य पूर्व और ब्राजील के बाजारों में यूरिया के भाव बढ़ने लगे थे. इसके बावजूद भारत के अक्टूबर टेंडर में कुछ कम कीमतें मिलना राहत देने वाला संकेत माना जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयात लागत इसी तरह नियंत्रित रहती है तो सरकार के उर्वरक सब्सिडी बिल पर दबाव कम होगा. भारत में किसानों को यूरिया अत्यधिक सब्सिडी वाले निर्धारित मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है और वास्तविक लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर सरकार वहन करती है.
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर में किसान गेहूं, सरसों, चना और अन्य रबी फसलों की बुआई की तैयारी कर रहे हैं. इन फसलों की शुरुआती वृद्धि के लिए नाइट्रोजन की जरूरत अधिक होती है, जिसके कारण नवंबर और दिसंबर में यूरिया की मांग बढ़ना लगभग तय है. हालांकि व्यापारिक सूत्रों का कहना है कि वैश्विक कीमतों में कमी का लाभ किसानों तक सीधे पहुंचने में समय लग सकता है, क्योंकि मौजूदा समय में सिंचाई और डीजल जैसी अन्य कृषि लागतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं.