
छत्तीसगढ़ को देशभर में ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है. राज्य में धान की हजारों पारंपरिक किस्में आज भी किसानों द्वारा उगाई जाती हैं. इनमें कई किस्में प्रोटीन और खनिज तत्वों से भरपूर हैं, तो कुछ अपने औषधीय गुणों और विशिष्ट सुगंध के लिए जानी जाती हैं.ऐसी ही कई पारंपरिक किस्में अपनी अधिक लंबाई के कारण किसानों के लिए चुनौती भी बनी हुई थीं.
धान की कुछ पारंपरिक किस्मों की ऊंचाई 140 से 160 सेंटीमीटर तक होती थी.अधिक लंबाई के कारण तेज हवा या बारिश में फसल के गिरने यानी लॉजिंग की समस्या होती थी. इससे दानों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित होता था और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था.
इसी समस्या को देखते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिकों ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के सहयोग से पारंपरिक धान की चुनिंदा लंबी किस्मों पर अनुसंधान किया. वैज्ञानिकों ने इन किस्मों की विशेषताओं को बरकरार रखते हुए उनकी ऊंचाई कम करने में सफलता हासिल की.
अनुसंधान के बाद धान की कई पारंपरिक किस्मों को बौने स्वरूप में विकसित किया गया. इनमें बौनी सफरी, बौनी लुचई, बौनी जावा फूल, बौनी दुबराज और बौनी सोनागाछी जैसी किस्में शामिल हैं.
जहां मूल किस्मों की ऊंचाई लगभग 140 से 160 सेंटीमीटर तक होती थी, वहीं वैज्ञानिकों ने इनकी ऊंचाई को घटाकर करीब 110 सेंटीमीटर तक करने में सफलता प्राप्त की. इससे फसल के गिरने की समस्या काफी कम हुई और किसानों के लिए इन पारंपरिक किस्मों की खेती आसान हुई.
इन विकसित किस्मों में विक्रम टीसीआर बौनी सफरी किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है.यह किस्म लगभग 125 दिनों में तैयार हो जाती है और इससे करीब 55 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा रहा है.
इसी तरह बौनी जावा फूल की ऊंचाई करीब 125 सेंटीमीटर तक रखी गई है. इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है. यह किस्म अपनी विशेष सुगंध के लिए जानी जाती है. वहीं बौनी दुबराज भी अपनी खुशबू के कारण किसानों और उपभोक्ताओं के बीच खास पहचान रखती है.
इन किस्मों को बौना करने का उद्देश्य केवल पौधे की ऊंचाई कम करना नहीं था, बल्कि पारंपरिक धान की खासियतों को बनाए रखना भी था. वैज्ञानिकों ने ऐसी किस्में विकसित करने पर जोर दिया, जिनमें मूल धान की सुगंध, गुणवत्ता और पारंपरिक विशेषताएं बरकरार रहें और साथ ही फसल गिरने की समस्या कम हो.
इससे किसानों को एक तरफ पारंपरिक और बाजार में पसंद की जाने वाली किस्में मिल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बेहतर उत्पादन और खेती में कम नुकसान का लाभ भी मिल रहा है.
धान की इन किस्मों के बौने स्वरूप में विकास से किसानों को कई फायदे मिल रहे हैं. कम ऊंचाई वाली फसल के गिरने की आशंका कम रहती है, जिससे उत्पादन का नुकसान घटता है. साथ ही बेहतर उत्पादन क्षमता के कारण किसानों की प्रति हेक्टेयर आय में भी बढ़ोतरी की संभावना बनी है.
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक अनुसंधान डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी के मुताबिक, बौनी किस्मों के विकास से पारंपरिक धान की खेती को नई दिशा मिली है. इन किस्मों का उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी मदद मिल रही है.
वहीं इस अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. परमेश्वर साहू बताते हैं कि कई पारंपरिक धान की किस्में किसानों के बीच पहले से लोकप्रिय थीं, लेकिन उनकी अधिक लंबाई के कारण फसल अक्सर गिर जाती थी. इससे उत्पादन प्रभावित होता था.इसी समस्या को देखते हुए इन किस्मों का चयन कर BARC के सहयोग से इन्हें बौना करने का प्रयास किया गया, जिसमें वैज्ञानिकों को सफलता मिली.
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक धान विरासत को आधुनिक कृषि विज्ञान से जोड़ने का यह प्रयास किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रहा है. वैज्ञानिकों ने ऐसी किस्में विकसित की हैं जिनमें पारंपरिक स्वाद और सुगंध के साथ आधुनिक खेती के लिए बेहतर पौध संरचना का मेल देखने को मिलता है.
धान की इन बौनी किस्मों के जरिए छत्तीसगढ़ की पारंपरिक धान संपदा को संरक्षित करने के साथ-साथ उसे अधिक उत्पादक और किसानों के लिए लाभकारी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है.