
सब्जियां हमारे आहार का अनिवार्य हिस्सा हैं. ये न केवल हमारे भोजन का स्वाद बढ़ाती हैं, बल्कि शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति, स्फूर्ति और वृद्धि के लिए आवश्यक कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज लवण भी प्रदान करती हैं. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, एक व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन लगभग 300 ग्राम सब्जी की जरूरत होती है, जिसमें 115 ग्राम हरी पत्तेदार सब्जियां, 115 ग्राम जड़ वाली सब्जियां और 70 ग्राम अन्य सब्जियां शामिल होनी चाहिए.
इस जरूरत को पूरा करने का सबसे सुरक्षित और सस्ता माध्यम है—'कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाए गए 'मॉडर्न हेल्दी किचन गार्डन यानी पोषण वाटिका. यह आधुनिक तरीका न केवल कम जगह में ज्यादा पैदावार देता है, बल्कि साल भर ताजी और ऑर्गेनिक सब्जियां मिलती रहती हैं. पोषण वाटिका से प्राप्त सब्जियां ताजी और स्वादिष्ट होती हैं.
कृषि विज्ञान केंद्र बेतिया के हेड और सब्जी विज्ञान विशेषज्ञ डॉ अभिषेक कुमार सिंह के अनुसार, वाटिका बनाने के लिए घर का पिछला हिस्सा सबसे उत्तम होता है, जहां पर्याप्त समय के लिए धूप आती हो. एक औसत परिवार के लिए साल भर की सब्जी आपूर्ति के लिए 200 से 250 वर्ग मीटर का क्षेत्र पर्याप्त माना जाता है. अगर स्थान कम हो, तो बिखरी हुई वाटिका भी बनाई जा सकती है.
वाटिका की योजना बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि बड़े पेड़ों की छाया सब्जियों की क्यारियों पर न पड़े. फलदार वृक्ष जैसे नींबू, अमरूद, केला और अनार को एक तरफ लगाना चाहिए ताकि क्यारियों की जुताई में कोई बाधा न आए. अधिक पानी चाहने वाली सब्जियां जैसे पालक और चौलाई को मुख्य नाली के पास लगाना बेहतर होता है.
डॉ अभिषेक कुमार सिंह बताया कि अपनी वाटिका से साल भर भरपूर पैदावार लेने के लिए वैज्ञानिक फसल चक्र अपनाना बहुत जरूरी है. आप अपनी क्यारियों को अलग-अलग नंबरों में बांटकर बुवाई कर सकते हैं. जैसे, पहले प्लॉट में नवंबर से मार्च तक पत्तागोभी और लेटस लगाने के बाद मार्च से अक्टूबर तक ग्वार और फ्रास्बीन लगाई जा सकती है. इसी तरह अन्य क्यारियों में फूलगोभी, मूली, प्याज, आलू और बैंगन को समय के अनुसार बदलकर लगाना चाहिए.
क्यारियों के अलावा मेड़ों का उपयोग भी बहुत प्रभावी होता है. जैसे मेड़ नंबर 1 से 3 पर शलजम के बाद मूली लगाई जा सकती है, और अन्य मेड़ों पर गाजर या चुकंदर के बाद अरबी, वंडा या गडेरी जैसी जड़ वाली फसलें उगाई जा सकती हैं. ध्यान रहे कि बुवाई का सही समय स्थानीय जलवायु के आधार पर थोड़ा बदल सकता है.
सब्जियों के साथ-साथ पोषण वाटिका के एक हिस्से में बहुवर्षीय यानी कई सालों तक फल देने वाले पौधों को लगाना भी फायदेमंद होता है. इसके लिए एक व्यवस्थित तरीका अपनाना चाहिए ताकि पौधों को बढ़ने के लिए सही जगह मिले. उदाहरण के लिए, एक लाइन में सहजन और करी पत्ता का एक-एक पौधा लगाया जा सकता है.
केला और पपीता जैसे फलों के लिए एक लाइन में पांच-पांच पौधों का क्रम रखना सही रहता है, जबकि करोंदा और एस्पेरस जैसे पौधों को दो-दो की संख्या में छोटी लाइनों में लगाया जा सकता है. इस तरह की योजनाबद्ध रोपाई से न केवल जगह का सही उपयोग होता है, बल्कि परिवार को लंबे समय तक फल और पौष्टिक पत्तियां भी मिलती रहती हैं.
सब्जी की बेहतर पैदावार के लिए हमेशा विश्वसनीय संस्थानों जैसे कृषि विज्ञान केंद्रों से ही बीज और पौधे खरीदने चाहिए. पोषण वाटिका में रासायनिक उर्वरकों के बजाय गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट का उपयोग करना चाहिए. इसके लिए वाटिका के किसी कोने में कंपोस्ट के गड्ढे बनाए जा सकते हैं.
सिंचाई के लिए रसोई से निकलने वाले बेकार पानी का उपयोग करना एक अच्छा विकल्प है. फसलों की सुरक्षा के लिए जैविक कीटनाशकों, नीम युक्त दवाओं, लाइट ट्रैप और स्टिकी ट्रैप का ही प्रयोग करना चाहिए ताकि सब्जियां विष रहित और शुद्ध रहें.
डॉ अभिषेक कुमार सिंह का कहना है, पोषण वाटिका केवल सब्जी उगाने का स्थान नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार के लिए मनोरंजन का एक साधन भी है. इससे घर के पास पड़ी खाली भूमि और कूड़े-करकट का सही प्रबंधन हो जाता है. आर्थिक दृष्टि से देखें तो ताजी सब्जियां घर में ही उपलब्ध होने से घर के बजट में अच्छी बचत होती है. बच्चों में भी श्रम के प्रति सम्मान और अच्छी आदतों का विकास होता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घर के सदस्यों को हर समय ताजी, विष रहित और पौष्टिक सब्जियां मिलती हैं, जिससे परिवार का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है और मन को संतोष मिलता है.